रायगढ़। ताप विद्युत संयंत्र देश के विकास और प्रगति की रीढ़ माने जाते हैं, क्योंकि वे रोजगार के अवसर सृजित करने के साथ-साथ ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति भी करते हैं। हालांकि, इनके संचालन से उत्पन्न उत्सर्जन तथा स्थानीय ताप प्रभावों के कारण पर्यावरण पर पडऩे वाले प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में उद्योगों की दोहरी जिम्मेदारी बनती है- एक ओर देश की ऊर्जा मांग को पूरा करना और दूसरी ओर पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखते हुए सतत विकास को बढ़ावा देना। संयंत्रों के आसपास हरित क्षेत्र का विस्तार धूल नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण तथा प्राकृतिक आवास निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन्हीं दायित्वों को समझते हुए एनटीपीसी लिमिटेड जैसे ताप विद्युत संयंत्र उन्नत वनीकरण मॉडल अपनाकर हरित आवरण को बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में स्थित लारा सुपर थर्मल पावर स्टेशन, एनटीपीसी लिमिटेड की एक प्रमुख इकाई है। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाते हुए एनटीपीसी लारा आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ जैव विविधता संवर्धन के लिए नवीन तकनीकों का उपयोग कर रहा है। इन्हीं आधुनिक उपायों में ‘मियावाकी वृक्षारोपण पद्धति’ एक वैज्ञानिक एवं प्रभावी मॉडल के रूप में उभरकर सामने आई है, जो सीमित भूमि क्षेत्र में घना और सघन हरित क्षेत्र विकसित करने में सक्षम है।
यह तकनीक जापानी वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में तेजी से घने जंगल विकसित करना है। जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा प्राकृतिक आवासों को पुनर्स्थापित करने की क्षमता के कारण यह पद्धति विश्वभर में प्रसिद्ध है। इस लेख में एनटीपीसी लारा द्वारा विकसित मियावाकी परियोजना, उसके लाभ तथा उससे जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं का विवरण प्रस्तुत किया गया है। यह उल्लेखनीय है कि एनटीपीसी लारा संयंत्र परिसर के आसपास हरित क्षेत्र बढ़ाने तथा उत्सर्जन के प्रभावों को कम करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। स्थापना काल से अब तक एनटीपीसी लारा द्वारा 6 लाख से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं, जबकि केवल वर्तमान वित्तीय वर्ष में ही 50 हजार से अधिक पौधों का रोपण किया गया है। यह संगठन की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है। एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में एनटीपीसी लारा ने मैत्री नगर टाउनशिप में लगभग 0.7 हेक्टेयर क्षेत्र में मियावाकी वन विकसित किया है, यह परियोजना छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम (ष्टत्रक्रङ्कङ्कहृ) लिमिटेड के सहयोग से विकसित की गई है।
मियावाकी परियोजना की विशेषताएँ
हरित क्षेत्र को सघन बनाने के उद्देश्य से एनटीपीसी लारा ने पहली बार मियावाकी पद्धति अपनाई, जिसके अंतर्गत लगभग 12,000 पौधों का रोपण विभिन्न स्तरों में किया गया जिसमें ऊँचे वृक्ष- जामुन, पीपल, आम आदि, मध्यम ऊँचाई वाले पौधे- आंवला, करंज, अशोक आदि, छोटे झाड़ीदार पौधे- गुड़हल, नींबू, अंजीर आदि पौधे लगाये गये। इस पद्धति में स्थानीय प्रजातियों को अत्यधिक घनत्व के साथ लगाया जाता है, सामान्यत: प्रति वर्गमीटर 3 से 5 पौधे। परिणामस्वरूप पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में कम समय में बहु-स्तरीय एवं घना हरित क्षेत्र विकसित हो जाता है। यह अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने के साथ-साथ धूल प्रदूषण को कम करने में भी सहायक है। इसके अतिरिक्त, यह कार्यस्थल की पर्यावरणीय गुणवत्ता में सुधार लाने और व्यावसायिक स्वास्थ्य मानकों के पालन में भी मदद करता है। चयनित पौधों की प्रजातियाँ कम रखरखाव वाली हैं, जो कठोर मौसम में भी तेजी से बढक़र घना वन तैयार करती हैं। यह हरित क्षेत्र तापमान नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा आसपास के तापमान को लगभग 5एष्ट से 7एष्ट तक कम करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सकारात्मक परिणाम
एनटीपीसी लारा की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता के अंतर्गत यह पहल वायु गुणवत्ता सुधारने में सकारात्मक परिणाम दे रही है। यह हरित क्षेत्र प्राकृतिक ‘बायो-फिल्टर’ की तरह कार्य करते हुए धूल कणों एवं गैसीय प्रदूषकों को अवशोषित करता है। यह पहल एनटीपीसी लारा की एक जिम्मेदार ऊर्जा उत्पादक के रूप में छवि को भी मजबूत करती है तथा स्थानीय समुदायों एवं नियामक संस्थाओं के साथ संबंधों को सुदृढ़ बनाती है। साथ ही यह संगठन की रेटिंग में सुधार कर हरित निवेशकों का विश्वास भी बढ़ाती है।
ऊर्जा और पर्यावरण के संतुलन की दिशा में एनटीपीसी लारा की मियावाकी पहल



