मीनकेतन प्रधान ने लिखी भूमिका
रायगढ़, दिनांक 8 अगस्त 2026,
डॉ. मीनकेतन प्रधान पूर्व प्राध्यापक हिन्दी किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय रायगढ़, संस्थापक विश्व हिन्दी अधिष्ठान द्वारा देश- विदेश में प्रतिष्ठित लेखिका डॉ. वीणा विज उदित के कहानी संग्रह ‘ मौन की गूँज ‘ की भूमिका लिखी गई है। इस संग्रह का लोकार्पण गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर के हिन्दी विभाग एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद पंजाब के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 7 अगस्त 2026 को प्रतिष्ठित उपन्यासकार डॉ अजय शर्मा के मुख्य अतिथ्य एवं विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार की अध्यक्षता में प्राध्यापकों, शोधार्थियों सहित स्नातकोत्तर हिन्दी के अध्येताओं की व्यापक सहभागिता से सम्पन्न हुआ। यह गौरवशाली पल था कि लेखिका डॉ. वीणा विज ‘ उदित ‘ की प्रत्यक्ष उपस्थिति आयोजन स्थल में रही । लोकार्पण के इस महनीय साहित्यिक अनुष्ठान के आरंभ में विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुमार ने लेखिका के व्यक्तित्व एवं साहित्य प्रदेय का विस्तृत उल्लेख किया । उनके कुशल संयोजन में कृति के लोकार्पण के साथ ही लेखिका को शाल – श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया।
आयोजन में मुख्य अतिथि की आसंदी से डॉ. अजय शर्मा ने अपने विद्वतापूर्ण उद्बोधन में लोकार्पित कहानी संग्रह ‘ मौन की गूँज ‘ की कहानियों को मानवीय संवेदना और जीवन मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति निरूपित किया ।उन्होंने कथा शिल्प और घटना संयोजन की रोचकता को इनकी महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में स्थापित किया। डॉ .शर्मा ने कहानियों की मार्मिकता और प्रवाह पूर्ण भाषा- शिल्प को वर्तमान सामाजिक- पारिवारिक जीवन के संदर्भ में रचनाकार की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण बताया।जिससे पंजाब ही नहीं , समूचा हिन्दी जगत गौरवान्वित है। इस कड़ी में अध्यक्षता करते हुए डॉ. सुनील कुमार ने ‘मौन की गूंज ‘ संग्रह शीर्षक की कहानियों को उच्चतम वैचारिक धरातल पर ‘मौन और आत्मबोध ‘ की तरह एक सिक्के के दो पहलू के रूप में विश्लेषित कर कथा विन्यास के वैशिष्ट्य का रेखांकन किया। उन्होंने मानव जीवन की विकास यात्रा में आत्मबोध से विश्व बोध की अवधारणा को फलित करने वाली इन कहानियों को डॉ. वीणा विज उदित की साहित्यिक यात्रा का श्रेष्ठतम सोपान कहा । डॉ. सुनील कुमार ने वीणा जी के अध्यापक ओशो के दर्शन को संदर्भित करते हुए संग्रह की कहानियों को व्यावहारिक जीवन के हर पहलू से जोड़ा । लोकार्पण कार्यक्रम में प्रो. रमन ने कहा कि संग्रह का शीर्षक और कथा शिल्प धर्मवीर भारती के बहुचर्चित उपन्यास ‘गुनाहों के देवता का स्मरण कराता है। और पता चलता है कि यह दर्शनशास्त्र की ज्ञाता रही हैं । लेखिका ने “काण विवाह” में पत -पत्नी में प्रेम और समर्पण को पारंपरिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया है । उन्होंने यह भी कहा कि मानवीय संवेदनाओं की ज्ञाता, मूक पशुओं की संवेदनाओं को भी समझती हैं।
नोना बेबी ‘पोपोव’-आरंभ में लगता है किसी बच्चे की कहानी होगी लेकिन एक जानवर की संवेदना का इन्होंने मानव व्यवहार के रूप में चित्रित किया है । इसी तरह कहानी ‘ पंछी का रुदन ‘में एक विधवा तीन बेटियों की मां होकर भी अकेली रही-क्योंकि किसी के पास समय नहीं है आज के युग में! यहां भी लेखिका अपने उद्देश्य में बहुत सफल हैं। कार्यक्रम में सक्रिय रूप से सहभागी डॉ . शैली जग्गी ने अपने वक्तव्य में ‘ मौन की गूँज ‘ कहानी संग्रह को युग जीवन और सामाजिक परिवेश का जीवंत दस्तावेज़ बताया। इन कहानियों के कारण अपने आसपास के वातावरण से गहरे जुड़ेसंस्मरणात्मक और दृश्यात्मक कथा विन्यास से पाठक बंध जाता है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर डाला कि डॉ. वीणा विज उदित की कहानियाँ पंजाब की आंचलिक संस्कृति को राष्ट्रीय – अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मुखरित करती हैं। लेखिका की भाषा का प्रवाह कथानक के सम्प्रेषण में अत्यंत प्रभावी है । इस क्रम में वक्ता मोहम्मद बिलाल ने हर कहानी को पाठकीय मनोभावों से सम्पृक्त बताया । जिनसे कहानियों के कथानक की विश्वसनीयता साबित होती है । डॉ संजय चौहान बरोह पत्रिका के संपादक ने कहा कि डॉ. वीणा विज जैसी उच्च स्तर की हिंदी कहानियों का पंजाब में विशेष महत्त्व है, जिनको पढ़ते हुए कथा की मूल भावना से पाठक का सीधे जुड़ाव हो जाता है ।
उक्त गरिमामय कार्यक्रम में हिन्दी के वरिष्ठ विद्वानों सहित शोधार्थियों की भी विशेष भागीदारी रही। शोधार्थी शशि कुमारी का यह मानना है कि यदि व्यक्ति स्वस्थ नहीं होगा तो समझ भी स्वस्थ नहीं होगी। उन्होंने निर्मल वर्मा की कहानियों से इन कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। यह भी कहा कि इलाचंद जोशी की मनोवैज्ञानिक भावभूमि से वीणा विज की कहानियों में काफी समानता है किन्तु आधुनिक जीवन संदर्भों की अपनी अलग पहचान है।
प्रो. सीमा जैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कहानी “शेष होकर अशेष”में बताया गया है कि दो पल्ले के दरवाजे होते थे। जब तक दोनों का साथ नहीं होता था दरवाजा बंद नहीं होता था । आज एक पल्ले के दरवाजे हैं दूसरे की जरूरत ही नहीं! यही आधुनिक समाज है।
संग्रह पर गहन विमर्श के उपरांत लेखिका डॉ. वीणा विज ने कहानियों की रचनात्मक पृष्ठभूमि पर अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया तथा अपनी कविता”मैं और मेरा मौन” का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।बहुमुखी कार्यक्रम का सफल संचालन मुकेश कुमार शोधार्थी ने किया तथा अंत में लवली यूनिवर्सिटी फगवाड़ा के डॉ विनोद कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उक्त आयोजन के लिए लेखिका डॉ. वीणा विज उदित ने गुरू नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर पंजाब के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग की अकादमिक गतिविधियों को राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय बताते हुए विभाग के विकास में सदैव सहभागी होने की वचनबद्धता दुहरायी जिससे समूचा आयोजन स्थल हर्ष और तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। विभाग एवं विश्वविद्यालय के अन्य विद्वानों ने इस आयोजन को ऐतिहासिक महत्त्व का सार्थक प्रयास बताया ।
उस अवसर पर विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास रायगढ़ ( छत्तीसगढ़) के समस्त अकादमिक- साहित्यिक आयोजनों एवं गतिविधियों से सम्बद्ध डॉ. वीणा विज ‘उदित’ जलंधर ( पंजाब)
प्रवासी साहित्यकार अमेरिका
को डॉ. विनय कुमार पाठक, लिंगम चिरंजीव राव, डॉ. बेठियार सिंह साहू, प्रो. आर. के . पटेल, डॉ. सौरभ सराफ,
डॉ. मौना कौशिक, मनीष कुमार पाण्डेय ‘मनु’, पंकज रथ शर्मा,अंजनी कुमार तिवारी ‘ सुधाकर ‘, सोनल , डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह, अमित सदावर्ती, लोचन गुप्ता, हरिशंकर गौराहा, जगदीश यादव , डॉ. सीमा प्रधान, जानकी साव , डॉ. विद्या प्रधान तथा अन्य साहित्यकारों ने बधाई दी है ।



