अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर जब दुनियाके करोड़ों लोग एक बार फिर योग के माध्यम से स्वास्थ्य, संतुलन और आत्मिक शांति का उत्सव मनाने की तैयारी कर रहेहैं, तब यह अवसर केवल एक वार्षिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि मानवता को भारत की उस अमूल्य धरोहर की याददिलाने का अवसर भी है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य के शरीर, मन और चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने का मार्ग दिखायाहै। आज जब आधुनिक जीवन अभूतपूर्व सुविधाओं केसाथ-साथ तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवन-शैली, प्रदूषणऔर अनेक जीवन-शैली-जनित रोगों की चुनौतियाँ भी लेकरआया है, तब योग पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक औरआवश्यक दिखाई देता है। यह केवल व्यायाम नहीं है, न हीकेवल शरीर को लचीला बनाने की कोई तकनीक है; योगवास्तव में जीवन को समग्रता में समझने और जीने की एक ऐसीपद्धति है जो व्यक्ति को स्वयं से, समाज से और प्रकृति सेजोड़ती है।
योग की यात्रा जितनी प्राचीन है, उतनी ही प्रेरणादायकभी। भारतीय सभ्यता के विकास के साथ-साथ योग का भीविकास हुआ। वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता तथाअनेक दार्शनिक परंपराओं में योग का उल्लेख मिलता है।भारतीय चिंतन में योग का अर्थ -केवल आसन करना नहीं रहाहै। संस्कृत धातु ‘युज्’ से बने ‘योग’ शब्द का मूल अर्थ है- जोडऩा या एकत्व स्थापित करना। शरीर और मन का, मन औरबुद्धि का, व्यक्ति और प्रकृति का तथा अंतत: आत्मा और परमचेतना का समन्वय ही योग का मूल भाव है। यही कारण है किभारतीय मनीषियों ने योग को केवल शारीरिक स्वास्थ्य कासाधन नहीं, बल्कि आत्म-विकास और आत्म-साक्षात्कार कामार्ग माना। कालांतर में महर्षि पतंजलि ने योग के सिद्धांतों कोव्यवस्थित रूप दिया और योगसूत्रों के माध्यम से उसे एकसुव्यवस्थित दर्शन के रूप में स्थापित किया। आज भी पतंजलिके अष्टांग योग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि- योग की व्यापक अवधारणा कोसमझने की आधारशिला माने जाते हैं।
भारत में योग सदियों तक आश्रमों, गुरुकुलों औरआध्यात्मिक परंपराओं का अभिन्न अंग रहा। विभिन्न युगों मेंअनेक संतों, योगियों और दार्शनिकों ने इसे समृद्ध किया। समयके साथ योग केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन को संतुलित और स्वस्थ बनाने की व्यावहारिकपद्धति के रूप में भी विकसित हुआ। आधुनिक काल में अनेकभारतीय योगाचार्यों ने इसे विश्व समुदाय तक पहुँचाने कामहत्वपूर्ण कार्य किया। परिणामस्वरूप आज योग विश्व केलगभग सभी देशों में किसी न किसी रूप में अपनाया जा चुकाहै और लाखों लोग इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना चुकेहैं।
योग की वैश्विक स्वीकृति का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव तबआया जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसंबर, 2014 कोसर्वसम्मति से 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषितकिया। इस प्रस्ताव को रिकॉर्ड संख्या में सदस्य देशों कासमर्थन प्राप्त हुआ और 2015 से पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय योगदिवस मनाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र ने योग को भारत सेउत्पन्न एक प्राचीन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिकपरंपरा के रूप में स्वीकार करते हुए इसके सार्वभौमिक महत्वको मान्यता दी। इस दिवस का उद्देश्य विश्वभर के लोगों कोयोग के बहुआयामी लाभों के प्रति जागरूक करना है।
21 जून को योग दिवस के लिए चुने जाने का भी विशेषमहत्व है। यह उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है, जिसेग्रीष्म अयनांत कहा जाता है। भारतीय योग परंपरा में यह दिनऊर्जा, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति के प्रतीक के रूप मेंदेखा जाता है। इसलिए यह तिथि योग के संदेश को वैश्विकस्तर पर प्रसारित करने के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी गई।
आज योग की सबसे बड़ी विशेषता उसका बहुआयामीस्वरूप है। योग शरीर, मन और आत्मा- तीनों के विकास कीबात करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यह स्वीकार कररहा है कि अनेक शारीरिक और मानसिक समस्याओं केसमाधान में योग सहायक भूमिका निभा सकता है। नियमितयोगाभ्यास से शरीर की लचक बढ़ती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़होती हैं, श्वसन क्षमता में सुधार होता है और संतुलन तथासमन्वय की क्षमता विकसित होती है। साथ ही प्राणायाम औरध्यान जैसी विधियाँ तनाव कम करने, मानसिक एकाग्रता बढ़ानेऔर भावनात्मक संतुलन स्थापित करने में सहायक सिद्ध होतीहैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी योग को स्वास्थ्य और कल्याणको प्रोत्साहित करने वाली एक महत्वपूर्ण पद्धति के रूप मेंरेखांकित किया है।
योग का महत्व केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहींहै। आज पूरी दुनिया मानसिक स्वास्थ्य संकट, सामाजिकतनाव और जीवन-शैली संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहीहै। प्रतिस्पर्धा, भागदौड़ और डिजिटल निर्भरता ने मनुष्य केजीवन में बेचैनी और असंतुलन को बढ़ाया है। ऐसे समय में योगव्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। यह आत्म-नियंत्रण, धैर्य, संयम और सजगता का विकास करता है। योग हमेंसिखाता है कि वास्तविक स्वास्थ्य केवल रोगों की अनुपस्थितिनहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन कीअवस्था है। यही कारण है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों,विश्वविद्यालयों, कार्यालयों और सामुदायिक संस्थाओं में योगकी उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।
योग का एक महत्वपूर्ण आयाम सामाजिक और वैश्विकसद्भाव से भी जुड़ा है। योग किसी धर्म, संप्रदाय या राष्ट्रीयसीमा तक सीमित नहीं है। यह मानव कल्याण का सार्वभौमिकमार्ग है। दुनिया के विभिन्न देशों, संस्कृतियों और भाषाओं केलोग योग के माध्यम से एक साझा मानवीय अनुभव से जुड़तेहैं। यह योग की सबसे बड़ी शक्ति है कि वह विविधता के बीचएकता का संदेश देता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा योग दिवस कोस्वीकार किया जाना भी इसी सार्वभौमिकता का प्रमाण है।
वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकट और जलवायुपरिवर्तन जैसी चुनौतियाँ भी मानवता के सामने गंभीर प्रश्नबनकर खड़ी हैं। योग का दर्शन हमें प्रकृति के साथसामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। योग यह सिखाताहै कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है, बल्कि उसका अभिन्न अंगहै। जब व्यक्ति अपने भीतर संतुलन स्थापित करता है, तब वहअपने आस-पास के पर्यावरण के प्रति भी अधिक संवेदनशीलबनता है। इस दृष्टि से योग केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सतत और संतुलित जीवन का भी दर्शन है।
भारत के लिए योग केवल एक सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बन चुकाहै। जिस प्रकार दुनिया ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्थाके क्षेत्र में विभिन्न देशों के योगदान को स्वीकार किया है, उसीप्रकार योग के माध्यम से भारत ने विश्व को स्वास्थ्य, संतुलनऔर आत्मिक विकास का एक अनूठा मार्ग प्रदान किया है। यहभारत की उस प्राचीन ज्ञान परंपरा का प्रमाण है, जो मानवकल्याण को सीमाओं से परे जाकर देखती है। आज जब विश्वके अनेक देशों में योग केंद्र, शोध संस्थान और प्रशिक्षणकार्यक्रम संचालित हो रहे हैं, तब यह स्पष्ट है कि योग अबकेवल भारत की धरोहर नहीं रहा, बल्कि सम्पूर्ण मानवता कीसाझा विरासत बन चुका है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 केवल उत्सव का अवसरनहीं है; यह आत्म-मंथन का भी अवसर है। यह हमें याद दिलाताहै कि आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच स्वास्थ्य का अर्थकेवल दवाओं और उपचारों तक सीमित नहीं हो सकता। स्वस्थसमाज के निर्माण के लिए संतुलित जीवन-शैली, मानसिकशांति, आत्मानुशासन और प्रकृति के साथ सामंजस्य भी उतनेही आवश्यक हैं। योग इन सभी मूल्यों को एक सूत्र में पिरोताहै। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि योग को केवलएक दिन के सार्वजनिक आयोजन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनाया जाए।यदि ऐसा होता है तो योग दिवस का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगाऔर भारत की यह अमूल्य परंपरा आने वाली पीढिय़ों के लिएभी प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
इस वर्ष जब विश्व फिर से 21 जून को योग के माध्यम सेस्वास्थ्य और सद्भाव का संदेश दोहराएगा, तब यह स्मरण रखनाचाहिए कि योग का सबसे बड़ा संदेश बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्किआंतरिक परिवर्तन है। योग हमें स्वयं को जानने, स्वयं कोसँवारने और स्वयं से आगे बढक़र समस्त मानवता के कल्याणके बारे में सोचने की प्रेरणा देता है। यही उसकी शक्ति है, यहीउसकी प्रासंगिकता है और यही कारण है कि हजारों वर्ष पुरानीयह भारतीय परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत, उपयोगी औरआवश्यक है, जितनी अपने आरंभिक काल में थी।
प्रो. सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ आचार्य, हिंदीविभाग
मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय,
आईजोल – 796004
आईजोल में हिन्दी के वरिष्ठ आचार्य, प्रतिष्ठित समालोचक और बहुमुखी प्रतिभा के विद्वान हैं । इस लेख के लिए उन्हें डॉ. विनय कुमार पाठक, डॉ. बेठियार सिंह साहू , डॉ. सौरभ सराफ,चिरंजीव राव, डॉ. विद्या प्रधान, डॉ. वीणा विज उदित, डॉ, मैना कौशिक, प्रो. आर. के पटेल, डॉ. एस पी. गुप्ता, डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह, अमित सदावर्ती, पंकज रथ शर्मा, हरिशंकर गौराहा, लोचन गुप्ता एवं अन्य साहित्यकारों- बुद्धिजीवियों ने बधाई और शुभकामनाएँ दी हैं ।डॉ. मीनकेतन प्रधानपूर्व प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष – हिन्दी,
किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रायगढ़ (छ.ग.)भारत




