एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने इस संसार से विदाई तो ले ली लेकिन मृत्यु के बाद भी रोशनी बाँट गए। 12 सितंबर 1948 को हरियाणा के पैतृक ग्राम खांडा खेड़ी में जन्मे प्रेम सुख की कर्मभूमि रायगढ़, छत्तीसगढ़ रही। ‘अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल ज़माने के लिये’ ये पंक्तियाँ उनके लिए गीत की पंक्तियां नहीं थी , बल्कि स्वर्गीय श्री प्रेमसुख बंसल जी के जीवन का सार भी यही था। उन्होंने जीवनभर दूसरों के लिए जीने को ही सच्ची सार्थकता माना और जाते-जाते भी नेत्र दान का पुण्य कार्य कर गए, जो उनके जीवन की अंतिम और सबसे सुंदर पहचान बन गया। श्री प्रेमसुख बंसल जी का जन्म 12 सितंबर 1948 को हरियाणा के खांडा खेड़ी स्थित अपने पैतृक गांव में हुआ। जन्म के समय सूप में लिए जाने के कारण बचपन में उनका मुंहबोला नाम ‘छाजूराम’ पड़ गया।
जीवन ने बचपन में ही उनकी कठिन परीक्षा शुरू कर दी। मात्र डेढ़ वर्ष की अवस्था में उनके पिता स्व. श्री ताराचंद जी का एक दुर्घटना में निधन हो गया। पिता की छत्रछाया से वंचित इस बालक का पालन-पोषण उनकी माता श्रीमती चंद्रावली जी और दादा श्री जमुना दास जी ने किया। तीन बहनों और दो भाइयों में वे सबसे छोटे थे। उनका बचपन और युवावस्था सरगुजा जिले के प्रतापगढ़ में बीता। उनके बड़े भाई स्व. श्री बजरंग लाल बंसल जी ने स्वयं अनेक संघर्षों के बीच रहते हुए छोटे भाई की शिक्षा-दीक्षा का पूरा दायित्व निभाया। उन्होंने प्रेमसुख जी को केवल पढ़ाया-लिखाया ही नहीं, बल्कि उन्हें संस्कारों की ऐसी मजबूत नींव दी, जिस पर आगे चलकर एक आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। उन्होंने जीवनभर छोटे भाई को पिता का स्नेह और संरक्षण दिया और कभी उन्हें पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। धर्म, संस्कार और संवेदनशीलता के संस्कार
प्रेमसुख जी बचपन से ही अत्यंत धार्मिक, मेधावी और संवेदनशील प्रवृत्ति के थे। वे अपनी माता को गीता और रामायण का पाठ पढक़र सुनाया करते थे। सरल स्वभाव और मधुर व्यवहार के कारण गांव-समाज के लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे।
उनके व्यक्तित्व में धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, बल्कि वह उनके व्यवहार और जीवन-दृष्टि में दिखाई देता था। जरूरतमंद की सहायता करना, अपने परिचितों और रिश्तेदारों के सुख-दु:ख में खड़ा रहना और हर व्यक्ति से समान भाव से व्यवहार करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। 13 मार्च 1969 को उनका विवाह अंबिकापुर निवासी श्री बैजनाथ बासिया जी की सुपुत्री श्रीमती रामरती जी के साथ हुआ। उनके परिवार में दो पुत्रियाँ और दो पुत्र हुए। विवाह के लगभग दस वर्ष बाद उनकी पत्नी एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना में गंभीर रूप से जल गईं। उस कठिन समय में प्रेमसुख जी ने उन्हें बचाने के लिए अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य लगा दी। उनके इलाज में कोई कमी न रहे, इसके लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया और अंतत: अपनी पत्नी को जीवनदान दिलाने में सफल रहे। जीवन में कठिनाइयाँ और उतार-चढ़ाव लगातार आते रहे, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने अपने परिश्रम, ईमानदारी और व्यवहार से समाज एवं बाजार में अपनी एक मजबूत साख और सम्मान बनाया।
व्यवसाय में शुचिता और ईमानदारी की मिसाल
प्रेमसुख जी ने व्यापार को केवल आजीविका का साधन नहीं माना, बल्कि उसे अपने सिद्धांतों और संस्कारों को जीने का माध्यम बनाया। उन्होंने अपने व्यवसाय में शुचिता, ईमानदारी,पारदर्शिता और विश्वसनीयता को सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता दी।सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने अपने परिश्रम, मधुर व्यवहार और सच्चाई के बल पर बाजार में ऐसी साख बनाई, जो उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई। उनके लिए व्यापार में लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था विश्वास अर्जित करना और उसे जीवनभर बनाए रखना। यही कारण था कि व्यवसाय के क्षेत्र में भी उन्होंने एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसे उनके संपर्क में आने वाले लोग आज भी सम्मान के साथ याद करते हैं।वर्तमान में वे रायगढ़ की उड़ीसा रोड स्थित कृष्ण जनरल स्टोर्स के संचालक थे। यह प्रतिष्ठान उनके कर्मठ जीवन और सिद्धांतनिष्ठ व्यावसायिक सोच का परिचायक रहा। उनके पुत्र श्री सुशील बंसल एवं श्री कृष्ण बंसल आज अपने पिता द्वारा दिखाए गए ईमानदारी, परिश्रम, शुचिता और विश्वसनीयता के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। उनके लिए पिता की विरासत केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि व्यवसाय करने के संस्कार और जीवन जीने के सिद्धांत हैं। यही स्व. प्रेमसुख जी के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि और उनके संस्कारों की सबसे सुंदर निरंतरता है। रिश्ते निभाने की अनूठी कला प्रेमसुख जी का व्यक्तित्व जितना सरल था, उतना ही आत्मीय भी था। वे हर व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करते थे। उनके लिए रिश्ते केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं थे। अपनी दोनों पुत्रवधुओं को भी उन्होंने पुत्रियों से बढक़र स्नेह और सम्मान दिया।परिवार को जोडक़र रखना, सबके सुख-दु:ख में सहभागी बनना और रिश्तों में अपनापन बनाए रखना उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी। वे अपने निकट संबंधियों, मित्रों और परिचितों की आर्थिक एवं सामाजिक सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे। किसी की आवश्यकता में काम आना उनके लिए उपकार नहीं, बल्कि अपना कर्तव्य था। धार्मिक प्रवृत्ति के साथ-साथ प्रेमसुख जी को भजन और गीतों का भी विशेष शौक था। वे भजनों के साथ-साथ फिल्मी गीत भी बहुत मधुरता से गाते थे। उनके पसंदीदा गीतों में भी उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती थी-
‘‘अपने लिए जिए तो क्या जिए,
तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए’’
और
‘‘ना मुँह छुपा के जियो,
ना सर झुका के जियो’’
मानो ये गीत उनके जीवन-दर्शन की ही अभिव्यक्ति थे सम्मान से जियो, दूसरों के काम आओ और जीवन को समाज के लिए सार्थक बनाओ।
श्री प्रेमसुख बंसल जी का जीवन सेवा की भावना से भरा था, लेकिन उनके जीवन का सबसे प्रेरणादायी पक्ष था उनका नेत्रदान का संकल्प।
जिस दौर में आम लोगों के बीच नेत्रदान के प्रति जागरूकता बहुत कम थी, उसी समय उन्होंने आगे बढक़र जीते जी नेत्रदान का निर्णय लेकर समाज के समाने अनुकरणीय मिशाल पेश की। यह उनके दूरदर्शी और मानवीय सोच का प्रमाण था। जीवन के अंतिम समय में भी उन्होंने अपने नेत्रदान के संकल्प को कायम रखा। 01 सितंबर 2026 को उनके निधन के पश्चात उनके परिवार ने उनके संकल्प का सम्मान करते हुए उनका नेत्रदान कराया। छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान, बिलासपुर के नेत्र बैंक एवं नेत्र रोग विभाग द्वारा जारी अभिनंदन-पत्र इस महान कार्य का प्रमाण है। परिवार ने अपने प्रियजन को खोने के असहनीय दु:ख के बीच भी उनके अंतिम संकल्प को पूरा करके समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। मनुष्य अपने जीवन में क्या अर्जित करता है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उसके जाने के बाद लोग उसे किस रूप में याद करते हैं। प्रेमसुख जी अपने पीछे केवल स्मृतियाँ नहीं छोड़ गए, बल्कि सेवा और मानवता की एक जीवंत विरासत छोड़ गए। उनके नेत्रदान से दो जरूरतमंद व्यक्तियों के जीवन में दृष्टि का उजाला आने की संभावना बनी है। अर्थात् जिस दिन उनका अपना जीवन अंधकार में विलीन हुआ, उसी दिन उनके नेत्र किसी और के जीवन में प्रकाश का माध्यम बन गए। इससे सुंदर विदाई किसी जीवन की और क्या हो सकती है। स्व. श्री प्रेमसुख बंसल जी केवल अपने परिवार के प्रिय सदस्य ही नहीं थे, बल्कि वे समाज के उन सरल, सहज और सेवाभावी व्यक्तित्वों में से थे, जिनका जीवन स्वयं एक संदेश बन जाता है। उन्होंने अपने जीते जी यह प्रमाणित किया कि संघर्ष आए तो हिम्मत मत हारिए, संसाधन कम हों तो प्रयास मत छोडि़ए, व्यवसाय में ईमानदारी और शुचिता को कभी मत छोडि़ए, सुख मिले तो बाँटिए,किसी को जरूरत हो तो साथ खड़े रहिए,और जीवन के बाद भी किसी के काम आ सकेंतो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा। आज रायगढ़ की उड़ीसा रोड स्थित कृष्ण जनरल स्टोर्स से जुड़ा उनका कर्मशील जीवन भले ही थम गया हो, लेकिन उनके संस्कार, उनकी सरलता, उनकी मधुर आवाज, उनका सहयोगी स्वभाव, उनकी व्यावसायिक ईमानदारी और उनका नेत्रदान का संकल्प उन्हें सदैव जीवित रखेगा। शरीर चला गया, पर दृष्टि छोड़ गए.स्व. श्री प्रेमसुख बंसल जी का जीवन एक ऐसी कहानी है, जिसमें संघर्ष था लेकिन शिकायत नहीं, अभाव थे लेकिन हौसला था, जिम्मेदारियाँ थीं लेकिन मुस्कान थी, व्यापार था लेकिन सिद्धांतों से समझौता नहीं था और अंत में मृत्यु थी।लेकिन उसके बाद भी किसी के जीवन में प्रकाश देने का संकल्प था। उनका नेत्रदान केवल एक परिवार का पुण्य कार्य नहीं, बल्कि पूरे अग्रवाल समाज और समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक के लिए प्रेरणा का संदेश है।\
संसार से नश्वर शरीर चला गया, पर दिव्य दृष्टि छोड़ गए प्रेमसुख बंसल
संघर्षों में गढ़ा गया एक व्यक्तित्व, स्व. श्री प्रेमसुख बंसल जी



