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NavinKadam > नई दिल्ली > धर्म बदलने वालों का एसटी का दर्जा खत्म करने की मांग
नई दिल्ली

धर्म बदलने वालों का एसटी का दर्जा खत्म करने की मांग

दिल्ली में आदिवासी समाज की हुंकार

lochan Gupta
Last updated: May 25, 2026 12:03 am
By lochan Gupta May 25, 2026
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5 Min Read

नई दिल्ली। धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी से बाहर करने की मांग अब राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा आंदोलन बनती दिखाई दे रही है। इसी मुद्दे को लेकर राजधानी दिल्ली में देशभर के आदिवासी समुदायों का विशाल महा समागम हो रहा है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में लाखों आदिवासियों के शामिल होने का दावा किया जा रहा है। दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में होने वाला यह आयोजन केवल सांस्कृतिक समागम नहीं, बल्कि जनजातीय पहचान, आरक्षण और धार्मिक परिवर्तन के मुद्दे पर निर्णायक राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। कार्यक्रम के केंद्र में लंबे समय से चर्चा में रहा डीलिस्टिंग बिल है।
जनजातीय संगठनों की मांग है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और पारंपरिक आदिवासी संस्कृति, रीति-रिवाज, देवी-देवताओं और सामाजिक व्यवस्था से अलग हो चुके हैं, उन्हें स्ञ्ज सूची से बाहर किया जाए। उनका कहना है कि संविधान में आदिवासी समाज को मिला आरक्षण और संरक्षण उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक जीवनशैली की रक्षा के लिए था, न कि धर्म बदलने के बाद भी स्थायी रूप से लाभ लेने के लिए। संगठनों का आरोप है कि बीते दशकों में मिशनरी गतिविधियों के जरिए आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया गया। गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन का फायदा उठाकर लोगों को उनकी जड़ों से दूर किया गया। अब आदिवासी समाज के भीतर यह भावना मजबूत हो रही है कि जो लोग अपनी मूल परंपराओं से अलग हो चुके हैं, उन्हें एसटी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इस महासमागम में शामिल होने के लिए गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों समेत देशभर से आदिवासी समुदायों के लोग दिल्ली पहुंचे हैं। कई जगहों पर पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ रैलियां निकालकर लोगों को दिल्ली रवाना किया गया। आयोजकों का दावा है कि यह हाल के वर्षों का सबसे बड़ा आदिवासी शक्ति प्रदर्शन साबित हो सकता है।

छत्तीसगढ़ से भी बड़ी भागीदारी

छत्तीसगढ़ से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय समेत कई प्रमुख आदिवासी नेता दिल्ली पहुंचे हैं। राज्य के कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं पर लंबे समय से व्यवस्थित हमला हुआ है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासनकाल में मिशनरी संस्थाओं को संरक्षण मिला, जिसके कारण आदिवासी समाज में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ। समाज की सरलता और आर्थिक कमजोरी का फायदा उठाकर लोगों की परंपराएं और मान्यताएं बदली गईं।रामविचार नेताम ने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज के भीतर एक स्पष्ट रेखा खींची जाए। जो लोग आदिवासी समाज की मूल परंपराओं और आस्था से अलग हो चुके हैं, उन्हें दोबारा स्ञ्ज आरक्षण का लाभ मिलना उचित नहीं है।

वैचारिक और राजनीतिक बहस तेज

हालांकि इस आंदोलन ने देश में नई वैचारिक बहस भी छेड़ दी है। समर्थक इसे आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आदिवासी समाज अपनी मूल पहचान खो देगा।

छत्तीसगढ़ में क्या हो सकता है असर?

बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा लुंड्रा विधानसभा सीट से प्रबोध मिंज को टिकट दी थी। लुंड्रा अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट है। टिकट वितरण के दौरान भी संगठन से जुड़े एक वर्ग में उन्हे टिकट दिए जाने का विरोध किया गया था। संगठन नेताओं ने कहा था कि मिंज धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, लिहाजा उन्हें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ाया जाना चाहिए। हालांकि भाजपा ने स्थानीय स्तर के समीकरण को देखते हुए प्रबोध मिंज को टिकट दी और उन्होंने जीत भी दर्ज की। आदिवासी समाज जिस डीलिस्टिंग बिल की मांग कर रहा है, अगर यह संसद में लाया गया और यह पास हो गया तो प्रबोध मिंज जैसे चेहरे प्रभावित हो सकते हैं।

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