नारायणपुर। बादलखोल अभ्यारण्य के घने और समृद्ध जंगल इन दिनों लगातार आग की चपेट में आते जा रहे हैं। मार्च महीने के शुरुआत से ही अभ्यारण्य क्षेत्र के नारायणपुर, साहीडाँड़, सरबकोम्बो, वेन्द और बच्छरांव सर्किल के लगभग सभी बीट क्षेत्रों में आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं। हर दिन किसी न किसी हिस्से से धुआं उठता दिखाई दे रहा है, जिससे यह साफ हो गया है कि जंगल अब सुरक्षित नहीं रह गए हैं। ग्रामीणों द्वारा महुआ फूल, पुटु, तेंदूपत्ता और अन्य वनोपज संग्रह करने के लिए जंगलों में जानबूझकर आग लगाई जा रही है। कई मामलों में शिकार के उद्देश्य से भी आग लगाने की बात सामने आती है। छोटी-सी लापरवाही धीरे-धीरे विकराल रूप ले रही है और हजारों हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हो चुका है।
नारायणपुर सर्किल के बरडाँड़-नारायणपुर बीट के कक्ष क्रमांक 58 स्थित कारीडाँड़ जंगल में रविवार दोपहर लगभग 12 बजे अज्ञात लोगों द्वारा आग लगा दी गई। यह वही इलाका है जहां पहले भी आग लग चुकी है और जंगल का बड़ा हिस्सा जल चुका है। हैरानी की बात यह है कि पहले से प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद यहां कोई विशेष निगरानी नहीं रखी गई। परिणामस्वरूप एक बार फिर आग भडक़ उठी और देखते ही देखते जंगल के दूसरे हिस्से को भी अपनी चपेट में ले लिया।
सबसे गंभीर पहलू यह सामने आ रहा है कि वन विभाग के कर्मचारी और फायर वाचर समय पर मौके पर मौजूद नहीं रहते। जिस समय उन्हें जंगलों में निगरानी करनी चाहिए, उस समय वे नदारद पाए जाते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि कर्मचारी अपने घरों में आराम करते हैं और जब आग फैल जाती है तब मौके पर पहुंचते हैं। रविवार को भी आग दोपहर 12 बजे लगी, लेकिन विभाग को इसकी जानकारी करीब 3 बजे मिली। यानी तीन घंटे तक जंगल जलता रहा और जिम्मेदारों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इस देरी के पीछे विभाग और ग्रामीणों के बीच तालमेल की कमी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। ग्रामीण समय पर सूचना नहीं देते या उनकी सूचना विभाग तक समय पर नहीं पहुंचती, जिससे हालात और बिगड़ जाते हैं। अगर समय रहते सूचना और कार्रवाई हो, तो आग को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है, लेकिन यहां हर बार देर हो जाती है। जंगलों में लग रही आग का सबसे ज्यादा नुकसान छोटे-छोटे पौधों और नई वनस्पतियों को हो रहा है, जो पूरी तरह जलकर नष्ट हो जा रहे हैं। इसके साथ ही वन्यजीवों के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो गया है। आग के कारण उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है और वे इधर-उधर भटकने को मजबूर हो रहे हैं। कई छोटे जीव-जंतु तो आग में जलकर मर भी जाते हैं, जिसकी कोई गणना तक नहीं हो पाती। वन विभाग हर साल दावा करता है कि जंगलों में आग पर नियंत्रण के लिए पूरी तैयारी की गई है। फायर वाचरों की नियुक्ति, मोबाइल वाहन और उपकरण उपलब्ध कराने की बात कही जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। अभ्यारण्य के मुख्यालय के आसपास ही जंगल जल रहे हैं और विभाग को इसकी समय पर जानकारी तक नहीं मिल रही। नारायणपुर मुख्यालय के देवटोंगरी और कारीडाँड़ जैसे नजदीकी क्षेत्रों में भी रविवार को आग लगी रही, लेकिन स्थानीय अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी। जब उच्च अधिकारियों द्वारा सूचना दी गई तब जाकर कर्मचारी हरकत में आए। इससे यह साफ जाहिर होता है कि निगरानी व्यवस्था पूरी तरह कमजोर पड़ चुकी है।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि वन विभाग अब जंगलों की सुरक्षा से ज्यादा निर्माण कार्यों में रुचि ले रहा है। जहां कोई निर्माण कार्य चल रहा होता है, वहां कर्मचारी पूरी मुस्तैदी से तैनात रहते हैं, लेकिन जंगलों में गश्त करने की बात आती है तो वे नजर नहीं आते। यही कारण है कि अवैध लकड़ी कटाई भी लगातार बढ़ रही है और विभाग उस पर भी प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रहा है। लगातार लग रही आग से बादलखोल अभ्यारण्य की हरियाली धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में यह क्षेत्र बंजर होने की कगार पर पहुंच सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब संसाधन, कर्मचारी और योजनाएं सब मौजूद हैं, तो आखिर जंगलों को बचाने में चूक कहां हो रही है? क्या विभागीय लापरवाही इस अभ्यारण्य को तबाही की ओर धकेल रही है? यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, निगरानी मजबूत नहीं की गई और ग्रामीणों के साथ बेहतर तालमेल नहीं बनाया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब बादलखोल अभ्यारण्य सिर्फ कागजों में ही हरा-भरा नजर आएगा, जबकि हकीकत में वह राख का ढेर बन चुका होगा।
मुझे आपके द्वारा जंगल जलने की जानकारी मिल रही है मैं तत्काल नारायणपुर रेन्जर और स्टाफ को आग बुझाने मौके पर भेजता हु।
उप निदेशक एलिफेंट रिजर्व सरगुजा
महुआ के लालच में जल रहा बादलखोल अभ्यारण्य, विभाग को नहीं है खबर
जंगल, वन्यजीव पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, जंगल सुरक्षा छोड़ निर्माण कार्यों में उलझा विभाग, गश्त नदारद, अवैध कटाई जारी, और आग से बर्बाद हो रही प्राकृतिक संपदा



