जशपुरनगर। जिले के कुनकुरी स्थित रोजरी की महारानी महागिरजाघर में प्रभु यीशु मसीह का जन्म पर्व क्रिसमस उल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। 24 दिसंबर की रात विशेष प्रार्थना अनुष्ठानों में शामिल होने के लिए मसीही समाज के लोग बड़ी संख्या में चर्चों में उमड़े। जिले की कुल 56 चर्चों में क्रिसमस को लेकर व्यापक तैयारियां की गई थीं। आधी रात को प्रभु यीशु के जन्म का संदेश सुनाए जाते ही चर्चों में घंटियों की गूंज और भक्ति गीतों के स्वर गूंज उठे। इसके बाद एक-दूसरे को बधाइयां देने का सिलसिला शुरू हो गया।
इस पावन अवसर पर कुनकुरी में स्थित रोजरी की महारानी महागिरजाघर आस्था का प्रमुख केंद्र बना। एशिया के दूसरे सबसे बड़े इस महागिरजाघर के विशाल सभागार में एक साथ करीब 10 हजार श्रद्धालु प्रार्थना कर सकते हैं। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति को देखते हुए प्रार्थना सभा कक्ष के बाहर भी भव्य पंडाल लगाए गए थे, जहां आधुनिक साउंड सिस्टम के माध्यम से प्रार्थना और प्रवचन की आवाज पहुंचाई गई। क्रिसमस पर्व के अवसर पर महागिरजाघर सहित जिलेभर के चर्चों को आकर्षक लाइटिंग, रंगीन झालरों और कैंडल से सजाया गया था। चर्च परिसर में सजी चरनी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही।
कुनकुरी महागिरजाघर में कई स्थानों पर भव्य और सुंदर चरनी सजाई गई थी। अनेक परिवारों ने अपने घरों में भी चरनी बनाई। मान्यता है कि प्रभु यीशु का जन्म गौशाला में हुआ था, इसी ऐतिहासिक दृश्य को चरनी के माध्यम से दर्शाया जाता है। क्रिसमस की मध्यरात्रि प्रार्थना सभा में बिशप स्वामी ने श्रद्धालुओं को आशीर्वचन प्रदान करते हुए प्रेम, शांति, करुणा और भाईचारे का संदेश दिया। पल्ली पुरोहितों ने बाइबल पाठ के माध्यम से प्रभु यीशु के आगमन का आध्यात्मिक अर्थ समझाया और मानवता की सेवा को ही सच्चा धर्म बताया। आधी रात के बाद महागिरजाघर परिसर में प्रभु यीशु के भक्ति गीत गूंजने लगे, जिनमें मसीही समाज के लोगों ने सामूहिक सहभागिता की।
कुनकुरी स्थित रोजरी की महारानी महागिरजाघर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि श्रद्धा, सहयोग और एकजुटता की जीवंत मिसाल है। चर्च के पल्ली पुरोहित फादर सुनिल कुजूर के अनुसार, इस महागिरजाघर का निर्माण कार्य वर्ष 1962 में आधारशिला रखे जाने के साथ प्रारंभ हुआ। स्थानीय पत्थरों से निर्मित इस चर्च का निर्माण चरणबद्ध तरीके से हुआ। वर्ष 1964 में चर्च के एक हिस्से का निर्माण पूरा हुआ, वर्ष 1979 में दूसरे हिस्से का निर्माण संपन्न हुआ और अंतत: वर्ष 1982 में इस भव्य महागिरजाघर का लोकार्पण किया गया।
करीब 17 सालों की सतत मेहनत के बाद यह ऐतिहासिक भवन आकार ले सका। फादर सुनिल कुजूर ने बताया कि चर्च के निर्माण में स्थानीय आदिवासी मजदूरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके लिए श्रद्धालुओं ने आपस में आर्थिक सहयोग एकत्र कर निर्माण कार्य को संभव बनाया। चर्च की बनावट बाइबिल में वर्णित तथ्यों और मसीही परंपराओं पर आधारित है। गिरजाघर का प्रार्थना एवं पूजा स्थल सात विशाल स्तंभों पर टिका हुआ है। ये सात स्तंभ मसीही समाज के सात संस्कारों के प्रतीक हैं- बपतिस्मा, परम प्रसाद, मेल-मिलाप, दृढ़ कर्म, विवाह, पुरोहिताई, रोगियों की सेवा। फादर सुनिल कुजूर ने यह भी जानकारी दी कि इस महागिरजाघर में अब तक चार बिशपों का अंतिम संस्कार किया जा चुका है, जिनमें विक्टोर किंडो, फ्रांसिस एक्का, इस्तानिलास तिग्गा और आस्क सेवरन शामिल हैं।
जशपुर के महागिरजाघर में गूंजे प्रभु यीशु के गीत



