खरसिया। कैलाश शर्मा। खरसिया नगर की धन्य धरा भक्ति रस में सराबोर है क्षेत्र में चहुंओर जय श्री कृष्ण और राधे राधे की गूंज सुनाई दे रही है। बहु झोलरी वाले गर्ग परिवार द्वारा अजीत सिंह नगर कन्या भवन के पास आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। परम पूज्य आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी महाराज के श्रीमुख से प्रस्फुटित कथा-अमृत का पान कर उपस्थित भक्तों का जनसमूह भाव-विभोर हो उठा। व्यासपीठ से बहती भगवद्?अनुराग की इस धारा ने हर श्रद्धालु के हृदय को हरि-प्रेम से आप्लावित कर दिया। ?कथा के सारगर्भित एवं दिव्य प्रसंग –
‘कैलाश’ से गोपी रूप में पधारे शिव, कृष्ण ही कृष्ण के अद्वैत में लीन खरसिया
आचार्य श्री ने रासलीला का अलौकिक मर्म समझाते हुए कहा कि रास कोई भौतिक क्रीड़ा नहीं, अपितु जीवात्मा का परमात्मा से विशुद्ध मिलन है। गोपी कोई शारीरिक संरचना नहीं, बल्कि भक्ति की पराकाष्ठा का भाव है। जब जीव भक्ति के तट पर आता है, तभी उसे ईश्वर की अनुभूति होती है। महारास की अलौकिकता का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि इस अलौकिक आनंद के दर्शन हेतु स्वयं कैलाशपति देवों के देव महादेव भी गोपी वेष धारण कर व्रज की भूमि पर उतर आए थे।
जब ब्रह्मा जी को मर्यादा का संशय हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त 16 हजार गोपियों को अपना ही स्वरूप दे दिया। सर्वत्र केवल कृष्ण ही कृष्ण दृष्टिगोचर होने लगे। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रेम विलास नहीं, अपितु धर्म और भक्ति का निष्काम फल है। मथुरा गमन के समय जब अक्रूर जी का रथ बढ़ा, तो गोपियों का विरह अश्रुधारा बनकर बह निकला। आचार्य श्री ने आह्वान किया कि जो भी साधक गोपी गीत का निष्ठापूर्वक पाठ करता है, उसे प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन और अनुकंपा की प्राप्ति अवश्य होती है। कंस वध व उद्धव-गोपी संवाद के उपरांत श्री रुक्मिणी-कृष्ण विवाह का पावन उत्सव मनाया गया। व्यासपीठ से गूंजा कि साक्षात् महालक्ष्मी स्वरूपा रुक्मिणी जी के हृदय में केवल और केवल द्वारकाधीश का वास था। यह तो प्रेम की बात है ऊधौ, बंदगी तेरे बस की नहीं है.. और तेरी वंशी पे जाऊं बलिहार रसिया… जैसे मर्मस्पर्शी भजनों की तान छिड़ते ही पांडाल में उपस्थित श्रद्धालु अपनी सुध-बुध खोकर झूम उठे। गर्ग परिवार सहित समूचा खरसिया नगर कन्हैया के रंग में रंगा नजर आया।
प्रेम, विरह, समर्पण, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अद्भुत संगम खरसिया में बही भक्तिरस की अजस्र धारा
जीव भक्ति के तट पर आता है, तभी उसे ईश्वर की अनुभूति होती है : श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री



