हिंदी दिवस आते ही हिंदी को लेकर बहसों का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। कहीं हिंदी के गौरव का उद्घोष होता है, कहीं उसके सामने अंग्रेज़ी की चुनौती पर चिंता व्यक्त की जाती है, कहीं हिंदी को राष्ट्र की अस्मिता से जोडक़र देखा जाता है और कहीं उसके नाम पर दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति असहजता पैदा करने की कोशिश होती है। कुछ विमर्श सामाजिक चेतना और प्रगतिशीलता के पक्ष में होते हैं, तो कुछ अनजाने या जानबूझकर भाषा को सांप्रदायिक पहचान का औजार बनाने लगते हैं। 6ऐसे समय में शायद सबसे जरूरी प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी कितनी महान है, बल्कि यह है कि हिंदी महान बनी कैसे? इस प्रश्न का उत्तर हिंदी के इतिहास में ही छिपा है। हिंदी किसी एक दिन, किसी एक व्यक्ति या किसी एक समुदाय द्वारा बनाई गई भाषा नहीं है। वह भारतीय उपमहाद्वीप की दीर्घ सामाजिक-सांस्कृतिक यात्राओं, लोकजीवन, व्यापार, तीर्थ, साहित्य, सत्ता, संघर्ष और परस्पर संपर्क से धीरे-धीरे निर्मित हुई है। उसमें अनेक भाषाओं और बोलियों की आवाजें सुनाई देती हैं। संस्कृत और प्राकृत की परंपरा से लेकर अपभ्रंश, मध्यकालीन लोकभाषाओं, फारसी-अरबी, तुर्की, द्रविड़ भाषाओं और आधुनिक काल में अंग्रेज़ी तक—अनेक स्रोतों ने उसके शब्द-संसार और अभिव्यक्ति को प्रभावित किया है। इसलिए हिंदी को समझना हो तो उसे किसी बंद कमरे में रखी हुई शुद्ध भाषा की तरह नहीं, बल्कि बहती हुई नदी की तरह समझना होगा।
हिंदी का जन्म किसी एक क्षण की घटना नहीं
भाषाएँ जन्म प्रमाणपत्र लेकर संसार में नहीं आतीं। उनका निर्माण सदियों की सामाजिक प्रक्रिया में होता है। आधुनिक हिंदी भारतीय आर्य भाषाओं की उस दीर्घ परंपरा का हिस्सा है जिसकी जड़ें प्राचीन इंडो-आर्य भाषिक परंपरा में जाती हैं। संस्कृत से विकसित प्राकृतों और फिर विभिन्न अपभ्रंश रूपों के लंबे विकासक्रम ने उत्तर भारत की अनेक नई आर्य भाषाओं और बोलियों के निर्माण की जमीन तैयार की। हिंदी भी इसी व्यापक भाषिक परिवार के भीतर विकसित हुई। इस विकास को एक सीधी रेखा मानना भी ठीक नहीं होगा मानो संस्कृत से प्राकृत, फिर अपभ्रंश और फिर सीधे हिंदी पैदा हो गई। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। अलग-अलग क्षेत्रों में भाषिक परिवर्तन समान गति से नहीं हुए। अनेक बोलियाँ और भाषाएँ समानांतर विकसित होती रहीं और एक-दूसरे को प्रभावित करती रहीं। मध्यकालीन उत्तर भारत में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, बुंदेली, बघेली, हरियाणवी, मैथिली, मगही आदि अनेक भाषिक रूपों का अपना समृद्ध संसार था। हिंदी का आधुनिक मानक रूप बाद में विशेष रूप से पश्चिमी हिंदी क्षेत्र की खड़ी बोली के आधार पर विकसित हुआ। अर्थात जिसे आज हम मानक हिंदी कहते हैं, वह हिंदी की संपूर्ण ऐतिहासिक और भाषिक विविधता का पर्याय नहीं है।यही अंतर समझना जरूरी है।
हिंदी केवल खड़ी बोली नहीं है
आधुनिक मानक हिंदी का व्याकरणिक आधार मुख्यत: खड़ी बोली है, लेकिन हिंदी का साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार इससे बहुत बड़ा है। कबीर की भाषा में अनेक लोकभाषिक रूपों का मेल दिखाई देता है। तुलसीदास ने अवधी को ऐसी साहित्यिक ऊँचाई दी कि वह भारतीय जनमानस की स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गई। सूरदास ने ब्रजभाषा को काव्य की अद्भुत संवेदनात्मक शक्ति प्रदान की। आगे चलकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, प्रसाद, पंत, महादेवी, दिनकर, नागार्जुन, मुक्तिबोध और असंख्य रचनाकारों ने आधुनिक हिंदी को निरंतर विस्तार दिया। इसलिए हिंदी का इतिहास केवल शब्दों और व्याकरण का इतिहास नहीं है; यह भारतीय समाज के बदलते अनुभवों का इतिहास भी है।
जिसे हम ‘शुद्ध हिंदी’ कहते हैं, वह भी अनेक स्रोतों की देन है भाषा के बारे में सबसे अधिक भ्रम ‘शुद्धता’ की अवधारणा को लेकर पैदा होता है। हिंदी में संस्कृत से आए शब्दों की बड़ी संख्या है। इनमें कुछ शब्द लंबे भाषिक परिवर्तन से गुजरकर हिंदी के सामान्य शब्द बन गए—जिन्हें भाषाविज्ञान की दृष्टि से तद्भव शब्द कहा जाता है। दूसरी ओर संस्कृत से अपेक्षाकृत सीधे लिए गए शब्द तत्सम कहलाते हैं। लेकिन हिंदी की शब्द-संपदा केवल संस्कृत से निर्मित नहीं हुई। मध्यकालीन भारत में फारसी प्रशासन, साहित्य और दरबारी संस्कृति की महत्वपूर्ण भाषा बनी। उसके साथ अरबी और तुर्की मूल के अनेक शब्द भारतीय भाषिक जीवन में आए। दुनिया, किताब, हिसाब, अदालत, बाजार, दरवाजा, रंग, मौसम, आदमी, खबर, जरूरत, तारीख, कानून जैसे अनेक शब्द आज हिंदी के सामान्य व्यवहार का हिस्सा हैं। इनमें से अनेक शब्दों को बोलते समय हिंदीभाषी यह विचार तक नहीं करता कि उनका मूल किस भाषा में है।यही किसी जीवंत भाषा की असली ताकत है। वह शब्दों की नागरिकता नहीं पूछती; उन्हें अपने व्याकरण और उच्चारण में ढालकर अपना बना लेती है।
हिंदी और उर्दू : साझा इतिहास को समझे बिना बहस अधूरी है हिंदी के इतिहास की चर्चा उर्दू से अलग करके करना ऐतिहासिक दृष्टि से अधूरा होगा। उत्तर भारत में विकसित हिंदुस्तानी भाषिक परंपरा ने अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परिस्थितियों में विभिन्न रूप ग्रहण किए। देवनागरी में लिखी जाने वाली आधुनिक मानक हिंदी और फारसी-अरबी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू ने आधुनिक काल में अलग साहित्यिक मानक विकसित किए, लेकिन उनके बोलचाल के आधार में व्यापक साझापन मौजूद है। समस्या तब पैदा होती है जब इस साझा इतिहास को भुलाकर दोनों भाषाओं को दो बिल्कुल अलग और परस्पर विरोधी सांस्कृतिक खेमों की भाषाएँ बना दिया जाता है। भाषा विज्ञान का इतिहास इस तरह की राजनीतिक सरलताओं को स्वीकार नहीं करता। ‘मोहब्बत’ और ‘प्रेम’, ‘इंसाफ’ और ‘न्याय’, ‘दुनिया’ और ‘जगत’, ‘सवाल’ और ‘प्रश्न’ इनमें से किसी शब्द की सामाजिक गरिमा उसके भाषाई मूल से तय नहीं होती। शब्द का अर्थ उसके प्रयोग और मनुष्य के अनुभव से बनता है।
दक्षिण और पूर्व की भाषाओं से भी संवाद
हिंदी का भाषिक संसार केवल संस्कृत और फारसी-अरबी संपर्क तक सीमित नहीं है। भारत की बहुभाषिकता ने हिंदी को लगातार प्रभावित किया है। द्रविड़ भाषाओं, मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी, असमिया, उडिय़ा, नेपाली तथा देश की अनेक आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के साथ हिंदी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क रहा है। आधुनिक भारत में शिक्षा, प्रशासन, सिनेमा, प्रवासन, बाजार, रेलवे, सेना, मीडिया और डिजिटल संचार ने इस संपर्क को और व्यापक किया है। इसीलिए हिंदी को किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में बंद करके नहीं देखा जा सकता। मुंबई की हिंदी, दिल्ली की हिंदी, बनारस की हिंदी, रायपुर की हिंदी, पटना की हिंदी, भोपाल की हिंदी, लखनऊ की हिंदी और देश के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाने वाली हिंदी अपने-अपने सामाजिक अनुभवों से शब्द और मुहावरे ग्रहण करती हैं। भाषा का यह क्षेत्रीय विस्तार उसकी कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण है।
अंग्रेज़ी से भी हिंदी ने बहुत कुछ ग्रहण किया
आज हिंदी को अंग्रेज़ी के प्रभाव से बचाने की चिंता व्यक्त करने वाले लोग भी रोजमर्रा की हिंदी में अंग्रेज़ी के अनेक शब्दों का सहज उपयोग करते हैं। रेल, स्टेशन, टिकट, डॉक्टर, अस्पताल, पुलिस, ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, बैंक, मोबाइल, इंटरनेट, ट्रेन, फाइल, कंप्यूटर जैसे शब्द भारतीय भाषिक व्यवहार का हिस्सा बन चुके हैं। नए तकनीकी और डिजिटल संसार में यह प्रक्रिया और तेज हुई है। भाषाएँ इस तरह बदलती हैं। यह परिवर्तन किसी भाषा की मृत्यु का प्रमाण नहीं होता। प्रश्न यह होता है कि भाषा नए अनुभवों और नई तकनीक के लिए अपने भीतर पर्याप्त जगह बना पा रही है या नहीं। यदि हिंदी विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, कानून, अर्थशास्त्र, दर्शन और डिजिटल दुनिया के नए विचारों को व्यक्त करने में सक्षम होती है, तो उसका भविष्य मजबूत होगा।
गंगा का रूपक केवल सुंदर नहीं, भाषिक रूप से भी अर्थपूर्ण है
हिंदी की तुलना गंगा से करना केवल काव्यात्मक उपमा नहीं है। गंगा अपने उद्गम से समुद्र तक पहुँचते हुए अनेक सहायक नदियों को अपने प्रवाह में समाहित करती है। उसकी विशालता,महानता और पवित्रता इस बात में नहीं है कि उसमें कोई दूसरी धारा नहीं मिली; उसकी विशालता इस बात में है कि अनेक धाराएँ मिलकर उसे विशाल बनाती हैं।
भाषा भी ऐसी ही होती है
जो भाषा अपने चारों ओर दीवार खड़ी कर लेती है, वह धीरे-धीरे अपने ही संसार में सीमित हो जाती है। जो भाषा समाज के बदलते अनुभवों के प्रति खुली रहती है, वह विस्तृत होती जाती है। हिंदी की शक्ति उसकी ‘शुद्धता’ में नहीं, बल्कि उसकी ग्रहणशीलता में है। उसने संस्कृत से लिया, प्राकृत और अपभ्रंश की परंपराओं से विकसित हुई, लोकभाषाओं से रस और मुहावरे पाए, फारसी-अरबी से शब्द ग्रहण किए, उर्दू के साथ साझा भाषिक संसार बनाया, आधुनिक भारतीय भाषाओं से संपर्क किया और अंग्रेज़ी सहित विश्व की अन्य भाषाओं से भी नए शब्द और अवधारणाएँ ग्रहण कीं।
यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है।
भाषा को धर्म की दीवार में कैद करना उसके इतिहास के साथ अन्याय है आज जब भाषा को सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के कठोर खाँचों में रखने की कोशिश होती है, तब हिंदी का इतिहास स्वयं उसका प्रतिवाद करता है। हिंदी के निर्माण में जिन शब्दों, साहित्यिक परंपराओं और सामाजिक अनुभवों का योगदान है, उन्हें धर्म के आधार पर अलग-अलग करना संभव नहीं है। कबीर को केवल किसी एक धार्मिक पहचान में सीमित नहीं किया जा सकता। रहीम को हिंदी से अलग नहीं किया जा सकता। रसखान के बिना हिंदी कृष्णभक्ति साहित्य की कल्पना अधूरी है। जायसी के बिना हिंदी की मध्यकालीन साहित्यिक यात्रा अधूरी है। यह कैसी विडंबना होगी कि जिन कवियों और रचनाकारों ने भाषा की सीमाएँ तोड़ीं, उनके उत्तराधिकारी भाषा के नाम पर नई दीवारें खड़ी करने लगें! भाषा यदि मनुष्य को मनुष्य से जोडऩे के बजाय उसके बीच श्रेष्ठता और हीनता की दीवार खड़ी करने लगे तो समस्या भाषा में नहीं, भाषा के राजनीतिक उपयोग में है। यह भी समझना होगा कि भाषा अपने आप प्रेम, सद्भाव या हिंसा पैदा नहीं करती। भाषा एक अत्यंत शक्तिशाली मानवीय माध्यम है—उसके माध्यम से प्रेम भी व्यक्त किया जा सकता है और घृणा भी; संवाद भी स्थापित किया जा सकता है और हिंसा के लिए उकसाया भी जा सकता है। इसलिए भाषा की वास्तविक नैतिकता उसके शब्दों से अधिक उसके प्रयोगकर्ता की सामाजिक चेतना में निहित होती है।
हिंदी दिवस का अर्थ केवल हिंदी का गुणगान नहीं
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने संघ की राजभाषा के रूप में देवनागरी लिपि में हिंदी को स्वीकार किया। संविधान के अनुच्छेद 343 में भी संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी का प्रावधान है। बाद में राजभाषा अधिनियम, 1963 ने संघ के आधिकारिक कामकाज में हिंदी के साथ अंग्रेज़ी के प्रयोग से संबंधित वैधानिक व्यवस्था को स्पष्ट किया। इस संवैधानिक व्यवस्था को समझते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत का भाषिक जीवन केवल हिंदी तक सीमित नहीं है। संविधान की आठवीं अनुसूची में अनेक भारतीय भाषाओं को स्थान मिला है और भारतीय लोकतंत्र की शक्ति ही उसकी बहुभाषिकता में है। इसलिए हिंदी का सम्मान दूसरी भारतीय भाषाओं के सम्मान को कम करके नहीं, बल्कि उनके साथ सहअस्तित्व और संवाद के माध्यम से बढ़ सकता है।
हिंदी का भविष्य उसके भाषणों में नहीं, उसके व्यवहार में तय होगा
हर वर्ष हिंदी दिवस पर हिंदी की महिमा में भाषण होते हैं। हिंदी के प्रति प्रेम की शपथें ली जाती हैं। हिंदी में काम करने का आग्रह किया जाता है। लेकिन असली सवाल वर्ष में एक दिन का नहीं है। क्या हिंदी में उच्च गुणवत्ता की वैज्ञानिक सामग्री उपलब्ध है? क्या विश्वविद्यालयों में आधुनिक ज्ञान का पर्याप्त साहित्य हिंदी में तैयार हो रहा है? क्या न्याय, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी और प्रशासन की भाषा आम नागरिक के लिए सहज हो रही है? क्या हिंदी डिजिटल युग की नई शब्दावली और ज्ञान-विज्ञान के साथ कदम मिला रही है? क्या हम हिंदी में मौलिक चिंतन और शोध को उतना ही सम्मान देते हैं जितना अंग्रेज़ी में लिखे गए काम को? और सबसे महत्वपूर्ण क्या हम हिंदी को ऐसी भाषा बना रहे हैं जिसमें देश की विविध भाषाओं और संस्कृतियों के लोग स्वयं को अपना समझ सकें? इन प्रश्नों के उत्तर ही हिंदी के भविष्य का वास्तविक निर्धारण करेंगे।
हिंदी की शक्ति उसके खुले द्वारों में है
किसी भाषा को महान बनाने के लिए उसे ‘सबसे महान’ घोषित करने की जरूरत नहीं होती। हिंदी को महान बनाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उसे इतना समावेशी, आधुनिक, वैज्ञानिक और मानवीय बनाया जाए कि वह अपने भीतर हर नए अनुभव के लिए जगह बना सके। हिंदी को संस्कृत से आए शब्दों पर गर्व होना चाहिए, लेकिन फारसी-अरबी मूल के शब्दों से संकोच नहीं होना चाहिए। उसे अपनी लोकभाषाओं पर गर्व होना चाहिए, लेकिन दूसरी भारतीय भाषाओं को छोटा करके नहीं। उसे अंग्रेज़ी से मुकाबला करने की चिंता से अधिक ज्ञान-विज्ञान की दुनिया में अपनी क्षमता बढ़ाने की चिंता करनी चाहिए। हिंदी की सबसे बड़ी पूँजी उसका लोकतांत्रिक चरित्र और ग्रहणशील स्वभाव है। वह खेतों से आई है, बाजारों से आई है, चौपालों से आई है, संतों और कवियों से आई है, शहरों और कस्बों से आई है। उसने राजदरबारों से भी शब्द लिए और गलियों से भी। उसने शास्त्र से भी ग्रहण किया और लोक से भी। उसने भारत के भीतर से भी सीखा और भारत के बाहर से आए भाषिक-सांस्कृतिक संपर्कों से भी। इसलिए हिंदी को बचाने की जरूरत नहीं है; हिंदी को संकीर्ण होने से बचाने की जरूरत है। उसे किसी धर्म, जाति, क्षेत्र या राजनीतिक विचारधारा की बपौती बनाने से बचाना होगा। क्योंकि हिंदी किसी एक समुदाय की भाषा नहीं है। वह उन करोड़ों लोगों की भाषा है जिन्होंने उसे अपने जीवन, श्रम, प्रेम, दुख, संघर्ष, हास्य, स्मृति और सपनों से बनाया है। और शायद हिंदी दिवस पर हिंदी के लिए इससे बड़ा सम्मान कोई नहीं हो सकता कि हम यह स्वीकार करें ‘हिंदी एक बंद सरोवर नहीं, बहती हुई नदी है।’ उसकी शक्ति इस बात में नहीं कि उसमें कोई दूसरी धारा न मिले; उसकी शक्ति इस बात में है कि वह अनेक धाराओं को अपने भीतर समेटकर भी अपना प्रवाह बनाए रखती है। गंगा की तरह।और गंगा की तरह ही उसकी पवित्रता किसी एक स्रोत में नहीं, बल्कि उस पूरे प्रवाह में है जो उसे विशाल,महान और पवित्र बनाता है।

गणेश कछवाहा
चिंतक, लेखक एवं समीक्षक
‘काशीधाम’ रायगढ़, छग



