धरमजयगढ़। भारतमाला परियोजना में एक जर्जर मकान के मामले में कथित रूप से इकरारनामा या शपथपत्र के आधार पर प्रभावित व्यक्ति के बैंक खाते में मुआवजा राशि जमा किए जाने की जानकारी सामने आई है। यदि ऐसा हुआ है, तो पूरी मुआवजा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यही प्रक्रिया परियोजना से प्रभावित सभी लोगों के लिए अपनाई गई? बायसी और खडग़ांव क्षेत्र के अनेक किसानों का कहना है कि सडक़ निर्माण के दौरान उनके खेतों और फसलों को नुकसान पहुंचा, लेकिन उन्हें उसी प्रकार की त्वरित क्षतिपूर्ति या समान प्रक्रिया का लाभ नहीं मिला। यदि एक मामले में इकरारनामा तैयार कर बैंक खाते में भुगतान संभव था, तो किसानों के नुकसान के मामलों में यही व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई गई?
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न वैधानिक प्रक्रिया को लेकर है। यदि पंचनामा, इकरारनामा और शपथपत्र के आधार पर मुआवजा दिया जा सकता है, तो भूमि अधिग्रहण और क्षतिपूर्ति के लिए निर्धारित विस्तृत कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता फिर क्यों पड़ती है? यदि यह प्रक्रिया विधिसम्मत थी, तो क्या इसे सभी प्रभावितों पर समान रूप से लागू किया गया?
यदि प्रभावित संपत्ति वन अधिकार पट्टे के अंतर्गत थी, तो क्या वन अधिकार अधिनियम, 2006 के सभी प्रावधानों का पालन किया गया? और यदि नहीं, तो उसका कानूनी आधार क्या था?
अब सवाल केवल एक मकान के मुआवजे का नहीं है, बल्कि समानता, पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन का है। यदि एक प्रभावित को त्वरित भुगतान मिल सकता है, तो बायसी और खडग़ांव के खेतों एवं फसलों के नुकसान से प्रभावित किसानों को समान प्रक्रिया और समान राहत क्यों नहीं मिली? यही प्रश्न अब भारतमाला परियोजना की मुआवजा नीति के केंद्र में खड़े हैं।
भारतमाला प्रोजेक्ट में मुआवजे का दोहरा पैमाना?
एक के खाते में कंपनी ने सीधे डाला ‘मुआवजा’, प्रक्रिया पर सवाल



