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सारंगढ़

जिला कांग्रेस कमेटी ने अयोध्या राम मंदिर चंदा चोरी को लेकर रखी प्रेस वार्ता

lochan Gupta
Last updated: July 18, 2026 11:41 pm
By lochan Gupta July 18, 2026
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8 Min Read

सारंगढ़। प्रदेश कार्यालय से आए वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अनिल शुक्ला जिला कांग्रेस कमेटी ने अयोध्या चंदा चोरी को लेकर प्रेस वार्ता रखी जिसमें पत्रकारों के द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर नेता जी ने तोल मोल कर दिया।जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष ताराचंद देवांगन, पूर्व जिला अध्यक्ष अरुण मालाकार, बिनोद भारद्वाज, सूरज तिवारी, संजय दुबे, राकेश पटेल, रविन्द्र नंदे, उमेश केशरबानी, राधेश्याम जायसवाल, मितेन्द यादव राजकमल अग्रवाल के साथ ही साथ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की उपस्थिति रही पत्रकारों के पूछे प्रश्नों का उत्तर देते हुई नेताजी ने बताया कि आस्था के नाम पर राजनीति, चढ़ावे के नाम पर लूट अब भगवान राम के नाम पर जुटाया गया चंदा भी बीजेपी-आरएसएस की राजनीतिक लूट का शिकार हो गया है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम करोडों भारतीयों की आस्था, संस्कृति और नैतिक चेतना के प्रतीक है। देश के कोने-कोने से गरीब, किसान, मजदूर, महिलाएं और श्रद्धालु अपनी मेहनत की कमाई, अपने गहने, अपनी बचत और अपनी श्रद्धा लेकर राम मंदिर निर्माण के लिए आगे आए। भाजपा, आरएस एस, विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार संगठनों ने लगभग तीन दशकों तक राम के नाम पर राजनीति की, देश के गरीब व मध्यम वर्ग से राम के नाम पर चंदा एकत्र किया और इसी आंदोलन के आधार पर सत्ता प्राप्त की। आज वही करोड़ों राम भक्त यह पूछने को मजबूर हैं कि भगवान राम के नाम पर जुटाया गया चंदा और चढ़ावा आखिर किसके संरक्षण में लूटा गया?
क्या यह आर्थिक घोटाला है? यह केवल आर्थिक घोटाला नहीं है। यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और भावनाओं के साथ किया गया घोर विश्वास घात है। भाजपा राम द्रोही है, उसने पहले चंदा में हेराफेरी करवाया अब चढ़ावा में चोरी। भाजपा ने राम मंदिर के निर्माण समय रामशिला पूजन के नाम से जो 14 हजार करोड रू. से अधिक राशि एकत्रित हुआ था। उसका जवाब आरएसएस एवं भाजपा के लोग नहीं दे पाये। उन के ही सहयोगी नेताओं ने ही राम मंदिर निर्माण के समय एकत्रित किये चंदे का आरोप लगाया था। जिन लोगों ने मंदिर बनाने के नाम पर चंदा में हेराफेरी किया था वही लोग मंदिर बनने के बाद चढावे में हेराफेरी करने लगे, इन सबकी पृष्ठ भूमि आरएसएस और भाजपा की रही है। कहा जा सकता है इन घोटालों को आरएसएस भाजपा का संरक्षण रहा है। भाजपा ने देवद्रव्य चोरी करने के महापाप का संरक्षण किया है। राम मंदिर न्यास ट्रस्ट का गठन गृहमंत्री अमित शाह ने किया था इसलिए वहां पर घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी मोदी और शाह की बनती है। जब ट्रस्ट का गठन प्रधानमंत्री की देखरेख में हुआ, तो इस घोटाले की जवाबदेही कौन लेगा? अगर सब कुछ ठीक था, तो चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे क्यों हुए? अगर कुछ गलत नहीं हुआ, तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र जांच से डर किस बात का है? क्या डबल इंजन सरकार दोषियों को बचा रही है? क्या केंद्र सरकार सच्चाई सामने आने से डर रही है? अगर सब कुछ पारदर्शी था, तो इस्तीफे क्यों हुए? गिरफ्तारियां शीर्ष स्तर पर क्यों नहीं हुई?
कांग्रेस पार्टी की मांगें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सामने जवाब दें.
प्रधानमंत्री स्पष्ट करें कि ट्रस्ट के गठन, शीर्षनियुक्तिऔर प्रशासनिक निगरानी में उनकी सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय की क्या भूमिका रही है और इतने गंभीर आरोपों के बाद वे अब तक मौन क्यों हैं। तत्काल गिरफ्तारी चंपत राय, अनिल मिश्र और इस पूरे घोटाले में शामिल सभी प्रभावशाली व्यक्तियों के विरुद्ध तत्काल एफआईआर दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की जाए। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र न्यायिक जांच। पूरे प्रकरण की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में कराई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस कथित लूट के पीछे कौन लोग हैं और किसके संरक्षण में यह सब वर्षों तक चलता रहा।श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को तत्काल भंग करें। वर्तमान ट्रस्ट को भंगकर धर्माचार्यों प्रतिष्ठित नागरिक प्रशासनिक विशेषज्ञों और स्वतंत्र सदस्यों के साथ एक नया, पारदर्शी और जवाबदेह ट्रस्ट गठित किया जाए। चढ़ावे और चंदे का पूर्ण फॉरेंसिक ऑडिट राम मंदिर के लिए प्राप्त समस्त चंदे, चढ़ावे, भूमि खरीद, आयोजनों और व्ययों का स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
राम किसी राज नीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। वे करोडों भारतीयों की आस्था हैं। राम के नाम पर जुटाए गए धन की कथित लूट और उस पर पर्दा डालने की हर कोशिश देश की धार्मिक चेतना का अपमान है मर्यादा पुरुषोत्तम राम की आस्था पर डाका डालने वालों को बचाने की नहीं, बेनकाब करने और कानून के कठघरे में खड़ा करने की विशेष आवश्यकता है। अब तक सामने आए तथ्य अत्यंत गंभीर हैं- श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के तात्कालीन महा सचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार किए जा चुके हैं। यह स्वयं इस बात का संकेत है कि मामला सामान्य प्रशासनिक त्रुटि का नहीं, बल्कि एक बड़े घोटाले का है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से बयान दिए हैं, जबकि ट्रस्ट की वित्तीय निगरानी, पारदर्शिता और संपत्तियों की रक्षा की सर्वोच्च जिम्मे दारी उन्हीं की थी।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रस्ट के विशिष्ट आमंत्रित सदस्य गोपाल राव को हटाए जाने और उनकी स्थिति को लेकर भी गंभीर भ्रम, विरोधाभास सामने आए हैं। आरएसएस के पूर्वी उप्र प्रभारी कृष्ण मोहन को ट्रस्ट का नया महा सचिव बनाया गया है. जबकि – उन पर पूरे प्रकरण को दबाने और लीपापोती करने के आरोप सार्वजनिक रूप से लगाए जा चुके हैं। यह जग जाहिर है कि ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे व शीर्ष नियुक्तियों में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की भूमिका रही है। ऐसे में केंद्र सरकार अपनी जवाबदेही से स्वयं को अलग नहीं कर सकती एसआईटी अब राम मंदिर के बड़े आयोजनों के खर्चों की भी जांच कर रही है।
छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई की जा रही है, जब कि ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की जवाबदेही अब तक तय नहीं हुई है। यही नहीं, भाजपा-आरएसएस ने न प्रभु श्री राम के चंदे को छोड़ा और ना ही अब उत्तराखंड के बद्रीनाथ मंदिर से जुड़े हालिया दान घोटाले ने भी यह प्रश्न खड़ा किया है कि कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस इस सच्चाई पर पर्दा नहीं डाल सकती कि सीसीटीवी निगरानी, बहु स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था और प्रभावशाली लोगों के संरक्षण के बिना इतने बड़े स्तर पर घोटाला संभव नहीं हो सकता। टुकडों टुकडों में इस्तीफे, छोटे कर्मचारियों की गिरफ्तारी व सीमित कार्रवाई केवल लीपापोती का प्रयास प्रतीत होते हैं, ताकि बड़ी मछलियों तक आंच न पहुंचे देश जानना चाहता है प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे प्रकरण पर मौन क्यों हैं? क्या चंपत राय, अनिल मिश्रा, गोविंद देव गिरी, गोपाल राव और मेंबर्स ट्रस्ट के अन्य शीर्ष पदाधिकारी इस पूरे प्रकरण में अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं? जब पूरा ट्रस्ट कटघरे में है, तो केवल छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई क्यों?

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