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रायगढ़

पं. मोहन कृष्ण तिवारी के मुखारविंद से त्रिपुरासुर वध प्रसंग सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

शिव महापुराण कथा का हुआ भव्य विश्राम, व्यासपीठ पूजन और पारंपरिक ‘चढ़ोत्तरी’ के साथ हुआ कथा का समापन

lochan Gupta
Last updated: May 24, 2026 11:43 pm
By lochan Gupta May 24, 2026
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5 Min Read

रायगढ़। रायगढ़ के सेठी नगर स्थित दुर्गा मंदिर के पीछे आयोजित भव्य संगीतमय श्री शिव महापुराण कथा का रविवार, 24 मई 2026 को अत्यंत भावपूर्ण और दिव्य माहौल में आधिकारिक विश्राम हुआ। कथा के अंतिम दिन सेठी नगर और आसपास के क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं की उपस्थिति से पूरा पंडाल श्रद्धा एवं भक्ति के अद्भुत संगम में सराबोर नजर आया।
जब महादेव ने एक ही बाण से किया त्रिपुरासुर का अंत
कथा के विश्राम दिवस पर प्रख्यात कथा व्यास पं. श्री मोहन कृष्ण तिवारी जी महाराज ने अपने सुमधुर और ओजस्वी मुखारविंद से ‘त्रिपुरासुर वध’ के मुख्य प्रसंग का सजीव वर्णन किया। महाराज श्री ने कथा का विस्तार करते हुए बताया कि तारकासुर के तीन पुत्रों—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विदुन्माली ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर तीन अजेय पुरियों (सोने, चांदी और लोहे के उड़ते हुए नगरों) का वरदान प्राप्त कर लिया था। इन असुरों ने तीनों लोकों में अत्याचार कर देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। पं. श्री मोहन कृष्ण तिवारी जी ने शिव के अद्भुत रथ का वर्णन करते हुए कहा जब अत्याचार चरम पर पहुंचा, तब देवताओं की प्रार्थना पर स्वयं महादेव ने इस संहार के लिए एक अलौकिक रथ तैयार किया। इस युद्ध में स्वयं पृथ्वी रथ बनी, सूर्य और चंद्रमा पहिये बने, ब्रह्मा जी सारथी बने, सुमेरु पर्वत धनुष बना और स्वयं भगवान विष्णु उस धनुष का अमोघ बाण बने। जैसे ही तीनों पुरियां आकाश में एक सीधी रेखा में आईं, भगवान शिव ने ‘त्रिपुरारी’ रूप धारण कर एक ही बाण से त्रिपुरासुर का साम्राज्य भस्म कर दिया। इस प्रसंग के दौरान पंडाल में भगवान शिव की भव्य जीवंत झांकी सजाई गई, जिसे देखकर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए और पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ के नारों से गुंजायमान हो उठा।

शिव जी के विभिन्न कल्याणकारी अवतारों की महिमा

कथा को आगे बढ़ाते हुए पं. मोहन कृष्ण तिवारी ने शिवपुराण में वर्णित भगवान शिव के विभिन्न कल्याणकारी अवतारों की महिमा गाई। उन्होंने बताया कि महादेव केवल संहारक नहीं, बल्कि परम रक्षक हैं। सती के आत्मदाह के बाद दक्ष के अहंकार को तोडऩे के लिए वीरभद्र व महाकाल अवतार, काशी की रक्षा के लिए कालभैरव अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की सेवा के लिए रुद्रावतार हनुमान जी, और भगवान नृसिंह के उग्र क्रोध को शांत करने के लिए लिए गए शरभ अवतार (पक्षीराज रूप) के गूढ़ रहस्यों को महाराज श्री ने अपनी शैली में भक्तों के समक्ष रखा। इसके साथ ही पिप्पलाद, नंदी, और गृहपति अवतारों की कथा सुनाकर भक्तों को धर्म और भक्ति के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा दी।

सदाचार का संकल्प और महाआरती

इस दिव्य कथा का सार प्रस्तुत करते हुए व्यासपीठ से पं. श्री मोहन कृष्ण तिवारी ने उपस्थित सभी श्रोताओं को जीवन में सदाचार अपनाने, माता-पिता का आदर करने और पंचाक्षरी मंत्र ‘ऊॅ नम: शिवाय’ का निरंतर मानसिक जप करने का संकल्प दिलाया। कथा के अंतिम सत्र में मुख्य यजमानों सहित उपस्थित श्रद्धालुओं ने सजल नेत्रों से पवित्र शिवपुराण ग्रंथ और बाबा भोलेनाथ की भव्य महाआरती की। विदाई के इस क्षण में कई भक्तों के आंसू छलक उठे। कथा विश्राम के अवसर पर पारंपरिक ‘चढ़ोत्तरी’ (विदाई उत्सव) की रस्म निभाई गई। श्रद्धालुओं ने अपनी-अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्यासपीठ, पूज्य पं. मोहन कृष्ण तिवारी महाराज, भगवान की सुंदर झांकियों और पोथी जी पर नकद राशि, वस्त्र, फल एवं मिठाइयां स्वेच्छा से अर्पित कर आशीर्वाद लिया। आयोजन समिति ने बताया कि इस दान राशि का उपयोग धार्मिक, सामाजिक कार्यों और ब्राह्मणों के सत्कार के लिए किया जाएगा। आयोजन समिति ने कथा को पूरी भव्यता के साथ सफल बनाने के लिए रायगढ़ के सभी धर्मप्रेमी बंधुओं, सेवादारों, पुलिस प्रशासन और मीडिया का सहृदय आभार व्यक्त किया है।

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