खरसिया। भारतीय धर्म-दर्शन का आधार अत्यंत गहन, तार्किक और कर्म-प्रधान रहा है। परंतु, समय-समय पर मौलिक शास्त्रों के अध्ययन के अभाव, मीडिया के अति-रंजित प्रस्तुतीकरण और जनमानस में फैले अनजाने भय के कारण धर्म का व्यावहारिक स्वरूप अपनी मूल दिशा से भटकता हुआ प्रतीत होता है। आज यह समस्या और भी गंभीर रूप ले चुकी है, जहाँ सिनेमा, टीवी धारावाहिक और व्यावसायिक कथावाचक कृष्ण के ‘कर्मयोगी’ रूप को दरकिनार कर केवल ‘रसिया’ या चमत्कारी आवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। वेद, पुराण और शास्त्रीय आधार ‘राधा’ नाम का ऐतिहासिक व दार्शनिक सच भारतीय वैदिक साहित्य और सनातन परंपरा के प्रामाणिक ग्रंथों का यदि गहन अनुशीलन किया जाए, तो कृष्ण-चरित्र और राधा के उल्लेख को लेकर निम्नलिखित शास्त्रीय तथ्य स्पष्ट होते हैं।
चारों वेद और उपनिषद- ऋ ग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद- इन चारों वेदों में राधा नाम की किसी देवी या स्त्री पात्र का कोई उल्लेख नहीं है। वेदों में ‘राधा’ या ‘राधास’ शब्द कई स्थानों पर आया है, लेकिन वहाँ इसका अर्थ ‘समृद्धि’, ‘आलोक’, ‘सफलता’ या ‘दान’ होता है, न कि कोई व्यक्ति या पात्र।
महर्षि वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत
भारत के दो सबसे प्रामाणिक इतिहास-ग्रंथों में राधा का नाम कहीं नहीं मिलता। महाभारत में केवल कर्ण की पालक माता का नाम राधा था (जिसके कारण कर्ण को ‘राधेय’ कहा गया)। प्राचीन पुराण (श्रीमद्भागवत एवं विष्णु पुराण) कृष्ण-चरित्र का सबसे विस्तृत विवरण ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ में मिलता है। संपूर्ण भागवत पुराण में राधा नाम का एक बार भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है। वहाँ केवल ‘एक विशेष गोपी’ (अनया आराधितो नूनं) का सांकेतिक जिक्र आता है, जिससे केवल यह स्पष्ट होता है कि उस गोपी ने ईश्वर की आराधना (आराधना से ही राधा शब्द निष्पन्न माना गया) की थी। विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में भी राधा नाम का कोई चरित्र मौजूद नहीं है।
राधा चरित्र का उदय कब और कैसे हुआ?
राधा पात्र का वर्णन बहुत बाद के ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ और 12वीं शताब्दी के कवि जयदेव की कृति ‘गीतगोविंद’ में प्रमुखता से मिलता है। मध्यकाल (16वीं-17वीं शताब्दी) में हित हरिवंश (राधावल्लभ संप्रदाय), रूप गोस्वामी और गौड़ीय वैष्णव संप्रदायों ने राधा को भक्ति और कृष्ण की ‘ह्लादिनी शक्ति’ (आनंददायिनी ऊर्जा) के रूप में केंद्र में स्थापित किया। दार्शनिक निष्कर्ष- वैष्णव दर्शन में ‘राधा और कृष्ण’ कोई दो अलग-अलग भौतिक मनुष्य नहीं हैं, बल्कि ‘जीवात्मा और ‘परमात्मा’ अथवा ‘शक्ति और शक्तिमान’ के मिलन का एक दार्शनिक रूपक हैं। किंतु, मध्यकालीन कवियों के अति-श्रृंगारिक वर्णन और आधुनिक धारावाहिकों ने इस दार्शनिक रूपक को एक लौकिक और देह-स्तरीय प्रेम-कहानी में बदल दिया। योगेश्वर कृष्ण बनाम टीवी-सिनेमा का ‘रसिया’? भगवान श्री कृष्ण का मूल चरित्र ‘कर्मयोग और विवेक’ का पर्याय है। ऐतिहासिक आयु का सत्य- शास्त्रीय गणनाओं के अनुसार, जब कृष्ण गोकुल छोडक़र मथुरा आए, तब उनकी आयु मात्र 10 वर्ष 2 महीने थी। इस अल्पायु में गोपियों के साथ जिस प्रकार के संबंधों का चित्रण आज टीवी धारावाहिकों और फिल्मों में किया जाता है, वह ऐतिहासिक और तार्किक दृष्टि से पूर्णत: अप्रामाणिक और भ्रामक है। श्रीमद्भगवद्गीता का निष्काम कर्मयोग- कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में कृष्ण अर्जुन को किसी भावुकता या अंधविश्वास का पाठ नहीं पढ़ाते, बल्कि वैज्ञानिक और व्यावहारिक ‘कर्मयोग’ (कर्मण्येवाधिकारस्ते…) का ज्ञान देते हैं। वे मोह का त्याग कर कर्तव्य-पालन का संदेश देते हैं। युवा पीढ़ी पर प्रभाव- जब धारावाहिक और पॉप-कल्चर कृष्ण के ज्ञान, कूटनीति, राज्य-रक्षा और चरित्र-बल को छोडक़र उन्हें केवल ‘रास रचाने वाले रसिया’ के रूप में चित्रित करते हैं, तो इसका सीधा कुप्रभाव युवा मानस पर पड़ता है। समाज बिना शास्त्रों को पढ़े इस विकृत चित्रण को ही धर्म मान बैठता है।
भजनों का फि़ल्मीकरण और कथा-आयोजनों का बाज़ारीकरण
आजकल आयोजित होने वाले विशाल धार्मिक कार्यक्रम, कथाएं और भजन-संध्याएं भक्ति-मार्ग के विचार और आत्म-मंथन से दूर होकर विशुद्ध मनोरंजन का साधन बनते जा रहे हैं। लाखों-करोड़ों का व्यावसायिक ढांचा- आज के बड़े-बड़े भागवत आयोजनों और भजन कार्यक्रमों में आयोजकों और कथावाचकों द्वारा लाखों-करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं। भव्य मंच, डिस्को जैसी लाइटें और साउंड सिस्टम धर्म के ‘आंतरिक चिंतन’ को बाहरी प्रदर्शन में बदल देते हैं। फिल्मी धुनों पर आधारित पैरोडी भजन- शास्त्रीय और प्रामाणिक भजनों, पदों व छंदों को किनारे कर दिया गया है। बॉलीवुड के हिट गानों और फूहड़ धुनों की तर्ज पर शब्द बदलकर भजन तैयार किए जाते हैं। जो संगीत मूलत: वासना या मनोरंजन के लिए बना था, उसी धुन पर ‘राधा-राधा’ रटवाया जाता है।
भीड़ नियंत्रण और भीड़ का मनोविज्ञान
मंच से जनता को विवेकपूर्ण बात बताने के बजाय ‘दोनों हाथ उठाओ’, ‘ताली बजाओ‘, ‘नाचो-झूमों’ जैसे निर्देशों के जरिए भीड़ में एक प्रकार का कृत्रिम उत्साह और भावावेश ( हिस्टीरिया) पैदा किया जाता है। जनता इस भावुकता में बहकर यह भूल जाती है कि व्यासपीठ से बोला जा रहा कथन शास्त्रों के अनुकूल है भी या नहीं। कथावाचकों के कुतर्क, समाज की सरलीकरण की भूल और उनके भयंकर परिणाम इस बाज़ारीकरण के पक्ष में अक्सर कथावाचकों और समाज द्वारा दो मुख्य तर्क दिए जाते हैं कथावाचकों का कुतर्क ‘जनता और श्रोता यही सुनना-देखना चाहते हैं, इसलिए हमारी मजबूरी है।’ सच्चाई – यह शुद्ध व्यावसायिक बहाना है। व्यासपीठ का दायित्व समाज की कुरीतियों को सुधारना और सत्य का दर्शन कराना होता है, न कि बाज़ार की माँग के अनुसार शास्त्रों से खिलवाड़ करना। यदि शिक्षक बच्चों की पसंद के नाम पर अनुशासन और पाठ्यक्रम छोड़ दे, तो वह शिक्षा का पतन है। समाज और अभिभावकों का सोचना – ‘चलो, किसी बहाने बच्चे और युवा पीढ़ी धर्म से जुड़ तो रहे हैं और आयोजनों में हिस्सेदारी निभा रहे हैं।’ सच्चाई – यह एक अत्यंत खतरनाक गलतफहमी है। किसी गलत या विकृत रूप के माध्यम से धर्म से जुडऩा, न जुडऩे से भी अधिक हानिकारक होता है।
इस स्थिति के दूरगामी परिणाम
‘सत्य और ज्ञान’ की जगह ‘मनोरंजन’ को धर्म मान लेना – युवा पीढ़ी यह समझ बैठती है कि ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना, फिल्मी धुनों पर नाचना और नारे लगाना ही धर्म है। इससे धर्म का बौद्धिक, नैतिक और दार्शनिक ढांचा पूरी तरह नष्ट हो जाता है। कर्तव्य-विमुख और भावुक युवा पीढ़ी का निर्माण- कृष्ण ने गीता में ‘कर्म और कर्तव्य’ की बात की थी। किंतु इस भावावेशी भक्ति का नतीजा यह निकल रहा है कि युवा वास्तविक जीवन की चुनौतियों, शिक्षा, रोजग़ार और राष्ट्र-निर्माण से भागकर केवल अंध-भावुकता और चमत्कारों के भरोसे जीने लगते हैं। तार्किक क्षमता (लॉजिकल थिंकिंग) का शून्य होना जब युवाओं को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि बिना सोचे-समझे केवल ‘ताकत से ताली बजाओ और रटो’, तो उनकी तर्क करने और सवाल पूछने की क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसा युवा आसानी से किसी भी पाखंडी बाबा या चरमपंथी विचारधारा का शिकार बन जाता है। सनातन धर्म की साख पर बट्टा- जब यह युवा पीढ़ी भविष्य में दुनिया के सामने अपने धर्म का प्रतिनिधित्व करेगी, तो उनके पास गीता का ज्ञान नहीं होगा, बल्कि केवल फिल्मी तर्ज वाले भजन और अप्रामाणिक कथाएं होंगी। इससे वैश्विक स्तर पर सनातन परंपरा की बौद्धिक गहराई का उपहास उड़ता है।
हिंदू समाज की मौलिक कमजोरी और धर्म-भीरुता
आज समाज में जो अंधविश्वास, चमत्कार-पूजा और आडंबर बढ़ा है, उसके पीछे मुख्य कारण यह है कि प्रामाणिक ग्रंथों का त्याग- जनता ने स्वयं वेद, उपनिषद और गीता को पढऩा छोड़ दिया और केवल कथावाचकों की सुनी-सुनामी बातों पर निर्भर हो गई। इसी का फायदा उठाकर अप्रामाणिक कथाएं और चमत्कारी आख्यान जोड़ दिए गए। भय से संचालित समाजसमाज का एक बड़ा वर्ग श्रद्धा से अधिक भय से संचालित होता है- ‘विरोध किया तो भगवान नाराज हो जाएंगे’, ‘अमुक बाबा का विरोध किया तो पाप लगेगा’। इस मानसिक डर के कारण आम जनता गलत परंपरा का विरोध करने से बचती है। संगठित वर्चस्व – यदि कोई विवेकशील व्यक्ति इन अप्रामाणिक दावों या भजनों के फि़ल्मीकरण पर सवाल उठाता है, तो धार्मिक ठेकेदार और संगठित गिरोह उसे ‘धर्म-विरोधी’ घोषित कर चुप कराने का प्रयास करते हैं।
समाधान का मार्ग विवेक और संवैधानिक चेतना
इस वैचारिक गिरावट से उबरने के लिए समाज को निम्नलिखित कदम उठाने होंगे – मूल शास्त्रों की ओर वापसी जनता को किसी कथावाचक या गायक के भावावेश में आने के बजाय स्वयं ‘श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत और उपनिषदों’ के प्रामाणिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। तर्क और विवेक को प्राथमिकता- जो बात तर्क, विज्ञान और नैतिकता की कसौटी पर खरी न उतरे, उसे धर्म का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। मनोरंजन और आध्यात्मिक साधना के अंतर को समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण आर्टिकल 51 एएच – भारतीय संविधान भी नागरिकों से यह अपेक्षा करता है कि वे ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना’ का विकास करें। निष्कर्ष- भगवान श्री कृष्ण का वास्तविक चरित्र हमें धर्म-भीरु (डरने वाला) नहीं, बल्कि धर्म-निष्ठ (न्याय और कर्तव्य पर चलने वाला) बनना सिखाता है। ‘बच्चे इसी बहाने धर्म से जुड़ रहे हैं’ का आत्मघाती संतोष छोडक़र समाज को यह समझना होगा कि युवाओं को धर्म से जोडऩे का अर्थ उन्हें ‘कर्मयोगी’ बनाना है, न कि फिल्मी धुनों पर नाचने वाला भावुक दर्शक। जब तक समाज कथावाचकों के व्यावसायिक कुतर्कों को खारिज कर कृष्ण के मूल ‘कर्मयोग और विवेक’ को नहीं अपनाएगा, तब तक अंधविश्वास और वैचारिक पतन का यह चक्र समाप्त नहीं होगा।



