जांजगीर-चांपा। बम्हनीडीह विकासखंड क्षेत्र के ग्राम मुड़पार में शनिवार सुबह वन विभाग द्वारा की गई अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने तीन गरीब परिवारों की जिंदगी को एक झटके में बदल दिया। जिन लोगों के सिर पर शुक्रवार तक छत थी, वे शनिवार रात खुले आसमान और यात्री प्रतीक्षालय में रात बिताने को मजबूर हो गए। किसी का सामान पेड़ के नीचे पड़ा रहा, तो किसी के घर पर वन विभाग का ताला लटक गया। बरसात के मौसम में बेघर हुए इन परिवारों की बेबसी पूरे गांव के सामने सवाल बनकर खड़ी है।
सबसे मार्मिक तस्वीर उस बुजुर्ग महिला की रही, जो अपने टूटे हुए घर के मलबे के सामने पेड़ के नीचे सामान रखकर बैठी रही। आंखों में आंसू और चेहरे पर बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। वहीं पीडि़ता सुनीता बाई अपने परिवार के साथ गांव के यात्री प्रतीक्षालय में रात गुजारने को मजबूर हो गई। रातभर परिवार को इस चिंता ने सताया कि आखिर अब अगली सुबह कहां जाएंगे और बच्चों को कहां रखेंगे। पीडि़त महिलाओं सुनीता बाई और जानकी देवी भारद्वाज ने बताया कि कार्रवाई से पहले उनकी बात तक नहीं सुनी गई। उनका कहना है कि अचानक घर उजाड़ दिए गए और अब उनके पास रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा है। उनका आरोप है कि प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना उन्हें बेघर कर दिया। फिलहाल, मुड़पार में उजड़े घरों का मलबा, पेड़ के नीचे रखा गृहस्थी का सामान और यात्री प्रतीक्षालय में रात गुजारते परिवार इस कार्रवाई की सबसे दर्दनाक तस्वीर बनकर सामने आए हैं। वहीं पूरे मामले में वन विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
छह माह का भरोसा, फि र अचानक कार्रवाई
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि 29 जून को भी वन विभाग की टीम अतिक्रमण हटाने पहुंची थी। उस समय अधिकारियों को परिवारों की स्थिति और बरसात का हवाला देकर छह महीने का समय देने की बात कही गई थी। आरोप है कि इसके बावजूद कुछ ही दिनों बाद वन विभाग दल-बल के साथ पहुंचा और कार्रवाई कर दी। इससे लोगों में भारी नाराजगी है।
राजनीतिक मुद्दा बनी वन विभाग की कार्रवाई
वन विभाग की कार्रवाई अब राजनीतिक मुद्दा बन गई है। जिला युवा कांग्रेस अध्यक्ष पंकज शुक्ला ने इसे डीएफओ की मनमानी और तानाशाही बताते हुए कहा कि बिना पुनर्वास किसी गरीब परिवार को बेघर करना अमानवीय है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पीडि़त परिवारों को न्याय नहीं मिला तो आंदोलन किया जाएगा। वहीं भाजपा के जिला पंचायत उपाध्यक्ष गगन जयपुरिया ने भी कार्रवाई को नियम विरुद्ध बताते हुए कहा कि जिन लोगों को पहले समय देने की बात कही गई थी, उन्हीं के घर अचानक तोड़ दिए गए। उन्होंने यात्री प्रतीक्षालय में रह रही महिला को उसके घर में रहने के लिए चाबी दिलाने का भरोसा भी दिलाया।
वन विभाग पर उठ रहे कई सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भूमि वन विभाग की थी, तो उसी जमीन पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकानों का निर्माण कैसे हुआ? यदि सरकारी योजना के तहत आवास बने थे, तो अब उन्हें अतिक्रमण बताकर तोडऩे की जिम्मेदारी किसकी है? यह भी बड़ा प्रश्न है कि जिन हितग्राहियों के प्रधानमंत्री आवास टूट गए, क्या उन्हें दोबारा योजना का लाभ मिलेगा या वे हमेशा के लिए बेघर हो जाएंगे? इन सवालों का जवाब अब तक स्पष्ट नहीं है।
मानवीय संवेदना या सिर्फ कार्रवाई?
वन विभाग की इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में भी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि कानून का पालन जरूरी है, लेकिन किसी गरीब परिवार को बिना पुनर्वास बरसात के बीच बेघर कर देना प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। लोगों का कहना है कि यदि अतिक्रमण हटाना ही था तो पहले वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए थी, ताकि किसी परिवार को खुले आसमान के नीचे रात न बितानी पड़ती।
अब बेघर होने की कगार पर ये परिवार
वन विभाग की कार्रवाई की जद में आए वे हितग्राही, जिन्होंने शासन की प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपना पक्का आशियाना बनाया है, उनमें शुक्रवारा बाई गोंड/सुन्दर गोंड, कृष्णा गोंड/सुन्दर गोंड, दतार गोंड/सुन्दर गोंड, खम्हन/सखाराम सूर्यवंशी, गया बाई/श्यामलाल सूर्यवंशी, पार्वती/भुवन सूर्यवंशी, द्वासा बाई/टेकचंद सूर्यवंशी और सुनीता सूर्यवंशी/संजय सूर्यवंशी (एक लाख किश्त जारी) का नाम शामिल है। बड़ा सवाल यह है कि इन सभी हितग्राहियों ने शासन की प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान का निर्माण कराया। अब यदि वन विभाग इन्हें अतिक्रमण बताकर तोडऩे की कार्रवाई करता है, तो सवाल यह उठता है कि वन भूमि पर पीएम आवास निर्माण की स्वीकृति कैसे मिली? जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं? जिन गरीब परिवारों के आवास टूटेंगे, क्या उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिलेगा? या फिर ये परिवार हमेशा के लिए बेघर हो जाएंगे?



