सारंगढ़। जिले में सिजेरियन प्रसव यानी रुस्ष्टस् की दर 30त्न से ऊपर पहुंच गई है, जो प्रदेश की 15-20त्न और देश की 25- 27त्न की दर से काफी अधिक है। इसके बावजूद मातृ मृत्यु दर 186 प्रति लाख है, जबकि प्रदेश की औसत दर 146 है। गत वर्ष जिले में 18 मातृ मृत्यु दर्ज की गईं। पूर्व ष्टरू॥ह्र डॉ. एफ. आर. निराला द्वारा की गई प्रसव एनालिसिस में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है।
कहां हो रहे प्रसव?
गत वर्ष जिले में 10611 गर्भवती महिलाएं पंजीकृत हुईं। इनमें से केवल 52त्न यानी 4365 प्रसव जिले के सरकारी संस्थानों में, 11त्न यानी 1170 प्रसव जिले निजी अस्पतालों में हुए। चिंता की बात यह है कि 37 प्रतिशत यानी 3941 प्रसव जिले के बाहरके संस्थानों में हुए। सारंगढ़ ब्लॉक से सर्वाधिक 1775 महिलाएं प्रसव के लिए जिले से बाहर गईं। एलएससीएस की स्थिति ब्लॉक एलएससीएस दर बरमकेला 36 प्रतिशत बिलाईगढ़ 30 प्रतिशत, सारंगढ 28 प्रतिशत कुल जिला 30 प्रतिशत जिले में कुल 2852 प्रसव ऑपरेशन से हुए। ऑपरेशन के बाद
भी मौत क्यों?
डॉ. निराला के अनुसार, एलएससीएस सुरक्षित मातृत्व के लिए की जाती है, लेकिन जिले में ज्यादातर ऑपरेशन के मामलों में मां को नहीं बचाया जा सका, जबकि बच्चे जीवित रहे। मातृ मृत्यु के मुख्य कारण पोस्ट पार्टम रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, एनीमिया और प्रसव उपरांत संक्रमण रहे। देरी बनी मौत की वजह*निर्णय में देरी परिवार द्वारा समय पर निर्णय न लेना, परिवहन में देरी समय पर उच्च संस्था न पहुंच पाना इलाज में देरी: उच्च संस्था पहुंचने के बाद उपचार में विलंब।
क्या हो समाधान
डॉ. निराला ने सुझाव दिया कि प्रथम तिमाही में 100त्न पंजीयन, 4 गुणवत्तापूर्ण एएनसी जांच, समय पर उच्च जोखिम वाली माताओं की पहचान, ईडीडी से पहले ही उच्च संस्था में भर्ती और बार-बार रेफरल सिस्टम बंद करना जरूरी है। बीपी और एनीमिया दो सबसे बड़े रोके जा सकने वाले कारण हैं। समय पर बीपी प्रबंधन से एक्लेम्पसिया रोका जा सकता है। ढ्ढस्न्र अनुपालन बढ़ाने से पीपीएच से होने वाली मौतें रुकेंगी उन्होंने कहा। नडेथ ऑडिट जरूरी उन्होंने कहा कि हर मातृ मृत्यु और अधिक मृत्यु वाले अस्पताल की डेथ ऑडिट अनिवार्य है। कमियों को चिन्हांकित कर योजनाबद्ध तरीके से काम करने से ही रूरूक्र कम होगी। सिस्टम को भी सुधारने होंगे।



