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जशपुरनगर

नारायणपुर के अघोर आश्रम में विराजे हैं ओघड़ गणेश

80 के दशक में बाबा भगवान राम ने कराई थी प्रतिमा की स्थापना, गणेश चतुर्थी पर आश्रम में हुई विशेष पूजा-अर्चना

lochan Gupta
Last updated: September 15, 2026 11:43 pm
By lochan Gupta September 15, 2026
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4 Min Read

नारायणपुर। गणेश चतुर्थी के अवसर पर चिटकवाईन स्थित श्री सर्वेश्वरी अघोरेश्वर आश्रम में विराजमान ओघड़ गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की गई। अघोर परंपरा से जुड़े इस आश्रम में स्थापित गणेश की यह प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप और साधना परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। गणेश चतुर्थी पर आश्रम में विधि-विधान से पूजन, मंत्र जाप, हवन और महाआरती संपन्न हुई। पारंपरिक ढोल, मंजीरे और अन्य वाद्य यंत्रों की धुन के बीच श्रद्धालु गणपति की भक्ति में लीन नजर आए।
मिली जानकारी के अनुसार चिटकवाईन स्थित श्री सर्वेश्वरी अघोरेश्वर आश्रम में ओघड़ गणेश की प्रतिमा की स्थापना 1980 के दशक में अघोर परंपरा के प्रमुख संत बाबा भगवान राम द्वारा की गई थी। वर्षों से यह प्रतिमा आश्रम की विशिष्ट पहचान बनी हुई है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर प्रतिवर्ष यहां विशेष पूजा की परंपरा निभाई जाती है। इस वर्ष भी आश्रम के बाबा उत्साही राम जी द्वारा विधिपूर्वक पूजा-अर्चना संपन्न कराई गई। अघोर परंपरा में भगवान गणेश को केवल विघ्नहर्ता और शुभ कार्यों के आरंभकर्ता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि साधना के महत्वपूर्ण आधार और आध्यात्मिक मार्ग के प्रहरी के रूप में भी उनका विशेष महत्व माना जाता है। ओघड़ साधना परंपराओं में गणेश आराधना को साधक के मार्ग की बाधाओं, अज्ञान और भ्रम को दूर करने वाली आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है। इसी परंपरा में ओघड़ गणेश के स्वरूप को विशेष स्थान प्राप्त है।
नारायणपुर के इस आश्रम में स्थापित ओघड़ गणेश का स्वरूप सामान्य रूप से मंदिरों में दिखाई देने वाले शांत और सौम्य गणेश स्वरूप से अलग माना जाता है। अघोर दर्शन में गणेश के उग्र स्वरूप को भय पैदा करने के बजाय मनुष्य के भीतर मौजूद भय, मोह, अहंकार और भ्रम का सामना करने तथा उनसे ऊपर उठने की आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि आश्रम में विराजमान इस प्रतिमा को लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था बनी हुई है। अघोर परंपरा में श्मशान को भी केवल भय का स्थान नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता और सत्य के प्रत्यक्ष बोध का प्रतीक माना जाता है। इसी दृष्टि से ओघड़ गणेश के उग्र स्वरूप को बाहरी भय से अधिक आंतरिक भय और अज्ञान पर विजय का प्रतीक समझा जाता है। अघोर साधना की यह विशिष्ट विचारधारा ही इस गणेश प्रतिमा को सामान्य धार्मिक स्वरूपों से अलग पहचान देती है।
आश्रम से जुड़ी मान्यता के अनुसार श्रद्धालु यहां पहुंचकर ओघड़ गणेश के दर्शन करते हैं और तीन बार परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं। गणेश चतुर्थी पर विशेष पूजा के दौरान भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने दर्शन-पूजन कर भगवान गणेश का आशीर्वाद लिया। करीब चार दशक से अधिक समय से आश्रम में विराजमान यह प्रतिमा आज भी अघोर परंपरा, साधना और आस्था की विशिष्ट विरासत के रूप में श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

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