डॉ. दुलीचंद जिंदगी जीने का हुनर जानते थे। देह की तकलीफ ने उनका आना-जाना थाम लिया था। घर ही सिमट कर उनका स्थायी ठिकाना बन गया था। लेकिन डॉ. साहब ’जिंदगी कैसे काटी नहीं… जी जाती है’ इसके भी कुशल चिकित्सक थे। वे खुश होने और रहने का व्याकरण जानते थे। हमारी मंडली जब अक्सर उनसे मिलती तो लगता हम हँसते हुए और हँसाने वाले किसी बड़े से बागीचे में बैठे हैं! खुशियाँ उनके पास आकर खुद खुश हो जातीं। जैसे हँसी ने डॉ. साहब के नाम-ठिकाने को अपना स्थायी पता घोषित कर दिया था। उनका चले जाना हम सब के मन को दुखा गया है। शब्द पसर कर यही कह रहे हैं नमन… नमन… डॉ. साहब।
सुन्दर गौरवर्णी मुखाकृति, गम्भीर आँखों पर चश्मा और दंत-चिकित्सा के क्षेत्र में दक्षता और संवेदना से दिप-दिप करती आँखें। बातचीत मे सौम्य लेकिन अपनी आत्मीय मंडली में, लक्षणा और व्यंजना तो जैसे उनकी स्टाफ नर्स की मानिन्द हमेशा मौजूद होतीं। ये सब उस अनुपम व्यक्तित्व की वे दमकीली रेखाएँ हैं जो मिल कर एक नाम रचती हैं- डॉ. दुलीचंद अग्रवाल। इन शब्द-रेखाओं को रायगढ़ के विशाल अग्रवाल समाज के प्रथम दंत चिकित्सक डॉ. दुलीचंद अग्रवाल के नाम से जुडऩे का गौरव प्राप्त है! अंचल के विख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, प्रखर समाजवादी, जल-जंगल और जमीन की लड़ाई के अप्रतिम योद्धा, कीर्तिशेष, जननायक रामकुमार अग्रवाल के काबिल बेटे दुलीचंद ने मेडिकल की राह चुनी और रायगढ़ जिले के सर्व प्रथम बी.डी.एस. डॉक्टर होने का गौरव अपने समाज को प्रदान किया। वे 1965 में शास. डेंटल कालेज इंदौर के टॉपर रहे।
पूज्य बाबाश्री प्रियदर्शी रामजी के संवेदना-शब्द दीप
पूज्यपाद बाबाश्री ने डॉ. दुलीचंद भाई की आत्मषांति के लिए प्रार्थना करते हुए कहा-वर्तमान समय में स्वयं के स्वास्थ्य को स्वस्थ रखना बड़ी चुनौती है। पूज्यपाद के शब्द-मंत्र थे… आज उपभोग के दौरान मात्रा के संतुलन पर ध्यान देना आवश्यक है। किसी भी वस्तु की मात्रा से अधिक उपभोग विष-तुल्य है। इस संसार में जन्मा हर व्यक्ति अपनी साँसे लेकर विदा हो जाता है, लेकिन संयमित जीवन जीने वाला दीर्घायु होता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन रायगढ़ के अध्यक्ष डॉ. संजीव पुरकायस्थ और सचिव डॉ. पीयूष अग्रवाल अपने वरिष्ठ साहबान डॉ बैस, डॉ.एम.एम श्रीवास्तव, डॉ मनीष बेरीवाल, डॉ. अजय गुप्ता, डॉ.राजू गुप्ता, डॉ. प्रशांत मिश्रा, डॉ. अँशुल श्रीवास्तव आदि की उपस्थिति में निवास स्थान जाकर डॉ. दुलीचंद को श्रद्धांजलि अर्पित की। रायगढ़ के विधायक एवं प्रदेश के वित्तमंत्री जन-गण प्रिय श्री ओ.पी.चौधरी ने अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि में इसे एक अपूरणीय क्षति निरूपित किया। अधिवक्ता संघ के लालमणि त्रिपाठी और एडवोकेट जय जायसवाल, श्री गुरुसिंह सभा रायगढ़ के भाई महेन्द्रपाल सहित बी.जे.पी. सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजन अनुपम पाल सहित अनेक समाज, समुदाय एवं संगठनों ने डॉ. साहब को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। शहीद नंदकुमार पटेल विवि के कुलपति डॉ. एल. पी पटेरिया, पूर्व विधायक कृष्ण कुमार गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री म.प्र. अर्जुन सिंह के सुपुत्र अजय सिंह सहित लोकभा नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गाँधी ने प्रेषित शोक संदेश पत्र में डॉ. दुलीचंद जी के चिकित्सकीय एवं सामाजिक योगदान का उल्लेख करते हुए अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
नये पाखियों की उड़ान…छुआ उपलब्धियों के नये शिखरों को!
मेडिकल प्रोफेशन की जिस पारिजात-सुगंध ने पिता डॉ. दुलीचंद जी को महकाया था, नए पाखियों की ऊँची उड़ान के साथ वे अपने पिता के यश- पथ पर आगे बढ़ते रहे। डॉ. दुलीचंद के पौत्र और बेटे सुनील के पुत्र राघव डक्ै है। बेटे अनिल के पुत्र, डॉ. साहब की पौत्रियाँ – ख्याति और संस्कृति अपने दादाश्री की मेडिकल-परम्परा के अनुगमन में दोनों-एम.बी.बी.एस. फायनल में है। पौत्र अनुभव सातवीं कक्षा में है। बेटे निखिल और डॉ. साहब की पौत्री दिव्या, इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्ययनरत है। पौत्र ओम आठवी में है। सारी पंक्तियों मे डॉ दुलीचंद भाई की आकांक्षाओं और सपनों को धडक़ते हुए सुना-देखा जा सकता है और उनकी, हर्ष से छलछला आई आँखों की नमकीन नमी का एहसास भी किया जा सकता है।
सप्तपदी के सात फेरे और सफर नये जीवन का!
रायगढ़ के अग्रसमाज के प्रथम डॉक्टर होने के गौरव से मंडित युवा डॉ. दुलीचंद के संग परिणय के सात फेरे लेने का सौभाग्य मिला नगर के ख्यातिलब्ध एवं बड़े वस्त्र व्यवसायी श्रीरामपूनमचंद परिवार की सुपुत्री विमलादेवी को! कालान्तर में दोनों की जीवन-बगिया में वात्सल्य के फूल खिलते गए जिन्हें नाम दिया गया- सुनील, अनिल और निखिल! वक्त का पाखी पंख लगा कर उड़ता गया। बच्चे बड़े हुए। इनके विवाह हुए… फिर स्नेह की नयी टहनियों में पुन: वात्सल्य-पुष्य खिलखिला उठे। चि. सुनील-मनीषा के डॉ. राघव, अनिल-अंजना के ख्याति, संस्कृति और अनुभव तथा निखिल – सीता की दिव्या और फिलवक्त 8 वीं में अध्ययनरत ओम नये वात्सल्य-पुष्प की आमद हुई और डॉ. दुलीचंद जी तथा विमलाजी को दादा-दादी के गौरव-पद की खुशबू से महमहा गए! अग्रज अमीचंद भाई अनुज बाबूलाल, डॉ. रमेष, जयप्रकाष, कैलाष, डॉ. राजू अग्रवाल, एवं अजय अग्रवाल ने समवेत रूप से, अपने विषिष्ट योगदान से परिवार को निरंतर ऊँचाईयाँ प्रदान की। जननायक रामकुमार जी का यह विषाल परिवार अपने, अपनत्व, संवेदना और परस्पर सामंजस्य के लिए एक मिसाल है। यही गुण परिवार की अगली पीढ़ी में भी उसी घनत्व के साथ पसरे हुए हैं। इसी तरह इनके पुत्रों ने भी यष के आकाष को अपनी प्रतिभा से छुआ है।
विचारणा श्रीकृष्ण की….!
गीता गायक श्रीकृष्ण की आचारणा-विचारणा के संवाहक डॉ. दुलीचंद भाई ने जब रायगढ़ में अपनी क्लीनिक शुरू की तो पूरे शहर में, दंतचिकित्सा वे जाने-माने डाक्टर थे। अधिकांश पेषेंट से वे औपचारिक फीस भी नहीं लेते। चाहते तो कमाई के नोट की प्रिंटिंग प्रेस क्लीनिक में लग सकती थी। लेकिन उनकी क्लीनिक तो संवेदना की क्लीनिक थी। लेकिन इससे उन्होंने जो कमाया, बिरलों को ऐसी दुर्लभ कमाई नसीब होती है। वे अक्सर कहते कि इस दुनियां में जो केवल और केवल अपना भला देखता है-वह दुर्योधन है। … जो केवल अपनों का भला देखता है वह युधिष्ठिर है और जो सबका भला देखता है. वह श्रीकृष्ण है। उनके क्लीनिक में आये अक्सर और अधिकांश लोगों से उनके घने नेह-सम्बन्ध होते और पिताश्री रामकुमार जी के विराट ग्रामीण परिवार से आए ग्राम्यजन भी। यहाँ फीस का सवाल ही नहीं होता था। डॉ साहब ने जिंदगी भर रिश्तों की इस आँच की तपिश को जीवंत रखा।
फ लसफ ा जिंदगी का…!
डॉ. साहब से मिल कर…जुड़ कर मैंने जीवन और संसार का यथार्थ जाना। उनके कान्सेप्ट क्लियर होते। यही कि जिंदगी दिनों से नहीं, खुशियों की स्केल से मापी जाती है। कितनी तो आपको मिली और कितनी आपने बांटी। वे यही कहते कि खुशियाँ मेहंदी की तरह होती है जो पाने वाले हाथों को सजाती है और देने वाले हाथों को भी रंग जाती है। पारिवारिक रिश्तों, दोस्ती और पारस्परिक संबंधों को लेकर डॉ. साहब की बातें याद आती है। यही कि प्रेम सहित इन सब मामलों में केमेस्ट्री फिजिक्स और मेथेमेटिवस के बराबर- आयतन, बराबर- मात्रा वाले नियम लागू नही होते और जहाँ हमेशा दो और दो चार होते हैं न कम न ज्यादा । इसके बिलकुल विपरीत, रिश्तों, दोस्ती और प्रेम के मामलों में जितना आप देते हैं. शेयर करते हैं उसका कई गुना रिटर्न आपको मिलता है। वे कहते थे जिंदगी तो धरती की मानिन्द है। एक मु_ी बीज आप धरती में डालते हैं और धरती कई गुना लहलहाती फसल की हरीतिमा भरी खुशियों से आप को निहाल कर देती है। डॉ. साहब कहते-जिंदगी का फलसफा बहुत आसान और सादगी भरा है। जैसा बोओगे… वैसा काटोगे!
तीन धाराओं का निरंतर बहता-खिलखिलाता झरना!
जनकवि आनन्दी सहाय शुक्ल की चर्चा बिना डॉ. साहब की यादें आधी-अधूरी रहेंगी। डॉ. साहब की क्लीनिक, अक्सर शुक्ल जी के सोंधे सोंधे गीतों की आमद से रौशन रहती। सामने से हम शामिल हो जाते। इस बीच शुक्ल जी के लिए पान के दो बीडे मंगवा लिए जाते और आरम्भ होता रायगढ़ के कुछ चर्चित खास और बिल्कुल आम जन गण का रोचक चरित्र-चित्रण। पेशेंट देखने के बाद का यह समय डॉ. साहब के लिए रिलेक्स होने का वक्त होता। शुक्ल जी की बतकही और उनकी चरित्र चित्रण-शैली से डॉ. साहब और हम हंस हंस कर लोट-पोट होते। कविता से इतर, बोलने-बतियाने की अदभुत, अचूक और परिहास तथा व्यंग्य से भरपूर शैली, देवी सरस्वती ने उन्हें उदारता से प्रदान की थी। उनकी भाषा में, हिन्दी के सारे अलंकार मानो अड्डा जमा कर बैठ जाते और हंसी से लबरेज एक झरना बहने लगता। इन चरित्र-चित्रणों में, रायगढ़ के तमाम राजनैतिक धुरंधर, शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी, सेठ – महाजन सहित बन्नानाई जैसे आम आदमी भी शामिल होते। रोजाना आनन्द के इस शब्द-झरने में भीगने का आनन्द शब्दों से परे है। डॉ. साहब भिगोते रहे और हम भीगते रहे
वे नूर भरी हँसी की चाँदनी से सजी शामें!
आदरणीय रवि मिश्रा, भाई तरुण घोष, कमलेश सिन्हा, कमलेश जैन, जयनारायण पटेल और हम अक्सर माह में एक दो बार हमारी यह मित्र मंडली डॉ. साहब के निवास जरूर जाती। फुरसत से घंटो बैठक होती। हर संवादो के बीच खुशी भी हमारे बीच अपनी अदृश्य लेकिन पूरी तरलता के साथ बैठ जाती। शामें रातों में ढलती। चाय आती। स्वादिष्ट व्यंजन आते। आदरणीया भाभी जी के साथ छोटी बहुरानी सीता आतीं। इतने विविध नाश्ते और इतने मीठे आग्रह से हमे खिलाती कि बहुरानी का सुन्दर चेहरा और सुन्दर लगता। कैसे तो सीता बहुरानी के चेहरे पर मुझे अपनी माताजी के वात्सल्य की स्निग्धता दिखने लगती। खाने वाले से ज्यादा खुशी, खिलाने वाले को होती है उस खुशी से मेरी मुलाकात होती है जब हम भाभीजी एवं बहुरानी के चेहरों को देखता। वे नूर भरी हँसी की चाँदनी भरी शामें-और रातें असमय ही ढल गई हैं। डॉ. साहब के संग, भाभीजी एवं बहुओं का नेह व्यवहार बताता था कि परिवार का इतने स्नेह का घनत्व, कितना गरीयसी और अंतस को अशेष आनंद से भरने वाला अमृत-तत्व होता है। अब वह नूर भरी हँसी और उल्लास की चाँदनी सी सजी शामें खामोश हो गयी हैं। शास्त्र कहते हैं कि पिता की कभी मृत्यु नहीं होती। वे हमेशा अपनी संतानों की साँसों में धडक़ते रहते हैं। जब भी डॉ दुलीचंद जी के विशाल परिवार में अपने पिया के घर जाती सुहागन बेटियों की डोलियाँ उठेंगी….और जब भी सुहाग-गौरव की सिंदूरी आभा लिए, पायल छनकाती नववधू के मंगल-आगमन से तथा जब भी किसी नवजात की प्रथम किलकारी से घर का कोना-कोना हर्षित होगा.. तब उस दूर अनंत से… अपने दोनो हाथों में आशीर्वाद के पुष्प लिए डॉ. दुलीचंद भाई का स्नेह-आशीर्वाद सदा-झरता रहेगा।
अषेष नमन डॉ. साहब।




