खरसिया। राज्य की विष्णुदेव साय सरकार भले ही भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपना रही है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सहकारिता विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के हौसले बुलंद हैं। एफआईआर और जेल की हवा खाने के बाद भी दागी प्रबंधकों की पुनर्बहाली और सहकारिता में अपनों को ‘रेवड़ी’ बांटने का खेल बदस्तूर जारी है। ताजा मामला आदिम जाति सेवा सहकारी समिति टीएसएस बानीपाथर का है, जहां नियमों को ताक पर रखकर चहेते को बैकडेट में नियुक्ति देने और सरकारी खजाने से वेतन लुटाने का बड़ा कारनामा सामने आया है।
शिकायत के अनुसार, अपने करीबी चंद्रकुमार को दिसंबर 2024 से लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी फंड से मासिक वेतन की बंदरबांट की जा रही थी। जब स्थानीय निवासी प्रदीप वैष्णव ने मामले की शिकायत एसडीएम से की, तो फर्जीवाड़े को छिपाने के लिए आनन-फानन में बैठक रजिस्टर में हेरफेर की गई। पुराने बैठक रजिस्टर में पारित तीन प्रस्तावों और अध्यक्ष, प्रबंधक व सहायक प्रबंधक के हस्ताक्षरों के बीच जो दो लाइनें खाली छूटी थीं, उसी में चंद्रकुमार की नियुक्ति दर्ज कर दी गई। कलम की लिखावट और स्याही का अंतर साफ बयां करता है कि यह प्रविष्टि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अधिकारी, प्रभारी प्रबंधक, सहायक प्रबंधक के हस्ताक्षरों के ऊपर तक बाद में घुसेड़ी गई है।
रजिस्टर की लिपापोती रजिस्टर के अन्य पन्नों पर बैठकों के बाद 3-4 लाइनें छोडक़र सील-साइन किए गए हैं, लेकिन इस विवादित पन्ने पर अधिकारी और प्रभारी प्रबंधक, सहायक प्रबंधक के हस्ताक्षरों के ऊपर हुई लिखावट ही फर्जीवाड़े की चुगली कर रही है।
जांच के नाम पर ‘खानापूर्ति’
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब जांच की कमान प्र-उपयुक्त (सहकारिता) रायगढ़ के पास पहुंचती है। आरोप है कि जांच के दौरान अधिकारियों ने सामने पेश किए गए इस संदेहास्पद रजिस्टर की निष्पक्ष पड़ताल करने के बजाय, आरोपी प्रभारी प्रबंधक सहायक प्रबंधक के बयानों को ही अंतिम सत्य मान लिया। सहकारिता विभाग के द्वारा जांच करने के बाद हद तो तब हो गई जब रजिस्टर में तीसरी बार छेड़छाड़ करते हुए 15 हजार प्रतिमाह देने की एक और पंक्ति अधिकारी, प्रबंधक की सील और साइन के ऊपर तक ठूंस दी गई। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने इस लीपापोती को ‘मान्य’ करते हुए फाइल नस्तीबद्ध कर दी और शिकायतकर्ता को प्रति भेजकर औपचारिकता पूरी कर ली।
क्या जांच सिर्फ पन्नों को दबाने के लिए होती है?
साफ नजर आ रही दोहरी लिखावट अधिकारी और प्रभारी प्रबंधक, सहायक प्रबंधक हस्ताक्षरों के ऊपर चढ़ी स्याही जांच अधिकारी की नजरों से कैसे ओझल हो गई? सरकारी धन की बर्बादी का जिम्मेदार कौन? बिना वैध प्रक्रिया के बैकडेट में नियुक्ति दिखाकर मानदेय बांटने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? जीरो टॉलरेंस का क्या हुआ? जेल जा चुके और दागी कर्मचारियों को दोबारा उन्हीं केंद्रों की कमान सौंपना सहकारिता विभाग की किस नीति का हिस्सा है?
निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग
शिकायतकर्ता प्रदीप वैष्णव एवं स्थानीय ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि उप-आयुक्त सहकारिता एवं उप-पंजीयक सहकारी संस्थाएं द्वारा इस पूरे प्रकरण की एफएसएल (फॉरेंसिक) जांच या निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, तो न केवल बानीपाथर बल्कि क्षेत्र की अन्य समितियों में फल-फूल रहे बड़े भ्रष्टाचार के सिंडिकेट का भंडाफोड़ हो सकता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस खुले फर्जीवाड़े पर कड़ा रुख अपनाता है या फाइल बंद कर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देना जारी रखता है। अब सवाल यह उठता है कि कार्यवाही करते हुए दिए गए वेतन की रिकवरी किससे की जाएगी, या फिर जांच ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी।
इस संबंध में तत्कालीन प्रभारी प्रबंधक से बात करने पर उन्होंने चंद्रकुमार का नाम बाद में दर्ज किए जाने की स्वीकृति देते हुए कहा कि तीन प्रस्ताव पास करने के बाद, शिकायत होने के बाद चौथे प्रस्ताव के रूप में बाद में चंद्र कुमार पटेल की नियुक्ति की गई है। जिसकी जांच की गई और कलेक्टर को भी शिकायत की गई है। 15 हजार रुपये वेतन देने की लाइन मेरे कार्यकाल में दर्ज नहीं की गई है। कब और किसके द्वारा दर्ज की गई है मुझे पता नहीं।



