रायगढ़। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर ‘प्रेमचंद और युवा समय’ विषय पर विचार संगोष्ठी का आयोजन शहर के कालीबाड़ी स्थित शिवानी संस्कृति कक्ष में किया गया। कार्यक्रम का संयुक्त आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा रायगढ़ एवं शिवानी कृति द्वारा किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्याम नारायण श्रीवास्तव ने की, जबकि संचालन इप्टा के साथी रविंद्र चौबे ने किया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य, उनके सामाजिक सरोकारों तथा वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की शुरुआत में रविंद्र चौबे ने ‘प्रेमचंद और युवा समय’ विषय की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्य केवल समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसका मार्गदर्शक भी होता है। उन्होंने प्रेमचंद के साहित्य की महत्ता और समकालीन संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता स्वतंत्र पत्रकार विनय पाण्डेय ने अपने संबोधन में प्रेमचंद की तुलना रूसी साहित्यकार लियो टॉल्स्टॉय से करते हुए कहा कि भारत में प्रेमचंद पहले ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने किसानों, मजदूरों, गरीबों, वंचितों और शोषितों को अपनी कहानियों का नायक बनाया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि ऐसे लेखक हैं जिन्होंने भारत की आत्मा को शब्द दिए। उन्होंने महलों और राजाओं की नहीं, बल्कि कजऱ् में डूबे किसान, शोषित मजदूर, अधिकारों से वंचित स्त्री और उपेक्षित दलित की पीड़ा को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रेमचंद केवल इतिहास का हिस्सा हैं या आज भी हमारे समय की आवश्यकता हैं। शिक्षा में असमानता, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिकता, किसानों और मजदूरों का शोषण जैसी समस्याएँ आज भी भारतीय समाज में मौजूद हैं, जिन्हें प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में डेढ़ सौ वर्ष पहले ही रेखांकित कर दिया था। वक्ता डॉ. हेमचंद पाण्डेय ने प्रेमचंद के अंतिम लेख ‘महाजनी व्यवस्था’ की चर्चा करते हुए उसे शास्त्रीय मार्क्सवाद की अवधारणा से जोडक़र देखा। उन्होंने कहा कि इस लेख में आर्थिक आधार और सामाजिक अधिरचना के संबंध को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। उन्होंने विभिन्न लेखकों के उद्धरणों के माध्यम से प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक आयामों पर प्रकाश डाला। युवा वक्ता हर्ष सिंह ने वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में प्रेमचंद की प्रासंगिकता पर विचार रखते हुए कहा कि उनका साहित्य आज भी युवाओं को सामाजिक संवेदना, समानता और न्याय के मूल्यों के प्रति प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ग्रामीण सामाजिक जीवन की गहरी समझ रखते थे और उनकी रचनाओं में भारतीय समाज का यथार्थ पूरी संवेदनशीलता के साथ उभरकर सामने आता है। प्रगतिशील लेखक संघ, बिलासपुर के भूतपूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कथाकार शीतेंद्र नाथ चौधरी ने कहा कि प्रेमचंद पर चर्चा के लिए समय हमेशा कम पड़ जाता है। उनकी प्रत्येक रचना अपने भीतर अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय आयाम समेटे हुए है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य पढऩे से वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच का विकास होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्याम नारायण श्रीवास्तव ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियों ‘नमक का दरोगा’ और ‘मंत्र’ का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी रचनाएँ केवल सामाजिक यथार्थ का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि उनमें मानवीय संवेदना, नैतिकता, संघर्ष और जीवन-दर्शन के अनेक रंग समाहित हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य हर दौर में नई पीढ़ी को दिशा देने की क्षमता रखता है।संगोष्ठी में साहित्यप्रेमियों, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। अंत में वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी तक और अधिक व्यापक रूप से पहुँचाने की आवश्यकता है, ताकि सामाजिक चेतना, समानता और मानवीय मूल्यों का प्रसार हो सके।
प्रेमचंद और युवा समय पर संगोष्ठी आयोजित, वक्ताओं ने बताई साहित्यकार की समकालीन प्रासंगिकता



