रायगढ़। मेडिकल कालेज अस्पताल में उपचार कराने आने वाले मरीज के परिजन भोजन पकाने के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। क्योंकि इतने बड़े अस्पताल में इनके लिए एक शेड की भी व्यवस्था नहीं है, ताकि वह भोजन पका सके। ऐसे में अब ग्रामीण क्षेत्र के गरीब तबके के लोग अस्पताल परिसर के बाहर खुले स्थान में भीषण गर्मी में भोजन पकाने को मजबूर है।
उल्लेखनीय है कि करोड़ों रुपए खर्च कर मेडिकल कालेज अस्पताल शुरू होने के बाद रायगढ़ जिला के अलावा अन्य जिलों से यहां हर दिन बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं, जिससे उनके साथ परिजन भी आते हैं, लेकिन इन परिजनों के लिए न तो यहां रुकने के लिए अलग से कोई स्थान बना है और न ही इनको भोजन पकाने की व्यवस्था है। इसके चलते परिजनों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि अस्पताल के बाहर कई छोटे-छोटे होटल भी शुरू हो गए हैं, लेकिन जिन मरीजों के पास पैसे हैं वे तो होटल में भेाजन कर ले रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के मरीज के परिजन जब अस्पताल आते हैं तो भोजन पकाने की पूरी व्यवस्था लेकर पहुंचते हैं, ताकि पका कर अराम से भेाजन कर सके, लेकिन इस अस्पताल परिसर में इनके लिए एक शेड की भी व्यवस्था नहीं है, हालांकि अस्पताल परिसर के अंदर जगह तो बहुत है, जिससे कई बार मरीज के परिजन अस्पताल परिसर में भोजन पकाने का प्रयास भी करते हैं तो इनको यहां से भगा दिया जाता है, जिससे अब परिसर के बाहर घांस-फुस के बीच भोजन पकाने को मजबूर है। परिजनों की मानें तो परिसर के बाहर भोजन पकाने पर कई बार नजर इधर-उधर होते ही पशुओं द्वारा नुकसान कर दिया जाता है, जिससे उनको दोबारा पकाना पड़ता है। हालांकि इन दिनों जहां पूरा जिला भीषण गर्मी व लू के चपेट में आ गया है तो वहीं परिजन इन सबके बीच भोजन पकाते नजर आ रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी अस्पताल प्रबंधन की तरफ से इनके लिए कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है, जिससे हर दिन परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
रुकने की नहीं है व्यवस्था
मेडिकल कालेज अस्पताल में मरीज के परिजनों को रुकने के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं है। ऐसे में वार्ड के बाहर जैसे-तैसे समय काटते नजर आते हैं। वहीं परिजनों की मानें तो अस्पताल के बरामदे में एक साथ 50-100 लोग रुकते हैं, हालांकि सबसे ज्यादा दिक्कत गायनिक विभाग व आर्थो मरीज के परिजनों को होता है, क्योंकि यहां आने वाले मरीजों को कई दिनों तक रुकना पड़ता है, इससे काफी समस्या होती है। ऐसे में अगर इनके लिए एक आश्रय की व्यवस्था होता तो अस्पताल में भीड़ तो कम होती ही साथ ही काफी राहत भी मिलती। साथ ही परिजनों का कहना है कि रात का भोजन पकाने के लिए मौसम ठंडा होने का इंतजार करते हैं, इससे कई बार भोजन पकाने में काफी रात हो जाता है, लेकिन यहां लाईट नहीं होने से मोबाइल के रौशनी से काम चलाना पड़ता है। हालांकि यह स्थिति हर दिन सुबह-शाम दर्जनभर से अधिक लोग अलग-अलग चूल्हा जलाकर खाना पकाने नजर आते हैं। ऐसे में अगर अस्पताल परिसर के अंदर में एक जगह मिल जाता तो काफी राहत मिलती। वहीं एक अन्य महिला ने बताई कि हम लोग गांव के रहने वाले हैं, इससे उनके पास इतने पैसे नहीं होते कि होटल से खरीद कर खा सके। इससे जब अस्पताल आते हैं तो पूरी राशन सामान लेकर पहुंचते हैं, ताकि भोजन पकाकर खा सके।



