रायगढ़। पैलेस रोड निवासी और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय में हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक सौरभ सराफ़ ने हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़) से पी-एच.डी. (डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी) शोध कार्य पूर्ण किया। विगत 15 मई 2026 को आयोजित मौखिक परीक्षा (वायवा) में देश के सुप्रसिद्ध विषय विशेषज्ञ एवं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो. प्रभाकर सिंह ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। उन्होंने सौरभ सराफ़ के शोध प्रबंध की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इसे उच्च स्तरीय शोध दस्तावेज़ बताया और डॉक्टर की उपाधि प्रदान करने की अंतिम अनुशंसा की। यह शोध कार्य डॉ. अर्चना झा, प्राचार्य, श्री शंकराचार्य महाविद्यालय, जुनवानी, भिलाई के निर्देशन एवं डॉ. अभिनेष सुराना, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष -हिन्दी, शासकीय वी.वाई.टी. पीजी कॉलेज, दुर्ग के सह-निर्देशन में संपन्न हुआ है।
शोध का विषय और ‘नव-मूल्यांकन
डॉ. सौरभ सराफ़ के शोध का शीर्षक तमस में वर्णित विभाजन की मानवीय त्रासदी का नव मूल्यांकन है। उनका यह शोध पारंपरिक साहित्यिक समीक्षाओं से भिन्न है। इसमें भीष्म साहनी के कालजयी उपन्यास ‘तमस’ के बहाने इस बात का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है कि 1947 के भारत विभाजन की जो सांप्रदायिक और अमानवीय पीड़ा थी, वह आज के युग में किस प्रकार नए-नए भयंकर रूपों में समाज के सामने आ रही है। इस शोध को प्रामाणिक बनाने के लिए डॉ. सौरभ ने व्यापक स्तर पर देशव्यापी अध्ययन किया। उन्होंने कलकत्ता की ऐतिहासिक नेशनल लाइब्रेरी और कलकत्ता विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी से 1946-47 के दुर्लभ समाचार पत्रों व दस्तावेजों का संकलन किया। साथ ही, दिल्ली की प्रतिष्ठित ‘तीन मूर्ति लाइब्रेरी’ से ऐतिहासिक दस्तावेजों को खंगाला। पिछले सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज’ की कार्यात्मक समिति के सदस्य के रूप में जुड़े होने के कारण उन्हें कई विभाजन पीडि़तों के प्रत्यक्ष साक्षात्कार से गहराई से जुडऩे का अवसर मिला था, जिसने इस साहित्यिक शोध को एक प्रामाणिक व ऐतिहासिक दस्तावेज़ का रूप दे दिया।
इस महत्वपूर्ण शोध का मुख्य परिणाम और निष्कर्ष यह स्थापित करता है कि विभाजन केवल एक ऐतिहासिक या भौगोलिक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक सामूहिक मानसिक आघात है, जिसके प्रभाव आज भी समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण के रूप में देखे जा सकते हैं। यह शोध यह भावी वैचारिक योगदान देता है कि दंगे और सामाजिक वर्ग-भेद अक्सर आम जनता की स्वाभाविक मर्जी नहीं बल्कि राजनैतिक कूटनीति का हिस्सा होते हैं। नफरत की राजनीति के इस मूल चरित्र को उजागर करके यह शोध वर्तमान युवा पीढ़ी को जागरूक करने और भविष्य में ऐसी मानवीय त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोकने में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा ताकि एक अधिक समावेशी, सहिष्णु और बंधुत्व-आधारित समाज का निर्माण किया जा सके।
सौरभ सराफ को मिली पी-एच.डी. की उपाधि
भारत विभाजन के उपन्यासों पर किया शोध



