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NavinKadam > रायगढ़ > रायगढ़ की राष्ट्रीय पहचान बना रहा लैलूंगा का जैविक जंवाफूल, बेंगलुरु से कारगिल तक पहुंच रहा सुगंधित चावल ‘केलो’
रायगढ़

रायगढ़ की राष्ट्रीय पहचान बना रहा लैलूंगा का जैविक जंवाफूल, बेंगलुरु से कारगिल तक पहुंच रहा सुगंधित चावल ‘केलो’

प्रशासन के सहयोग से 700 एकड़ से 2000 एकड़ तक विस्तार का लक्ष्य, जैविक खेती से स्वास्थ्य के साथ बेहतर आय सुनिश्चित

lochan Gupta
Last updated: April 4, 2026 11:13 pm
By lochan Gupta April 4, 2026
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5 Min Read

रायगढ़। जिले के लैलूंगा क्षेत्र का ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल आज अपनी विशिष्ट सुगंध, स्वाद और उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण एक अलग पहचान स्थापित कर चुका है। पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली यह धान की किस्म अब किसानों के लिए आय का मजबूत माध्यम बन रही है। प्रशासन और कृषि विभाग के सहयोग से इस उत्पाद को व्यवस्थित रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे यह स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। किसानों द्वारा अपनाई जा रही जैविक पद्धति और बेहतर विपणन व्यवस्था के कारण इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
जंवाफूल धान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है, जो लैलूंगा क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु में ही पूर्ण रूप से विकसित हो पाती है। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां-दिन में पर्याप्त गर्मी और रात में हल्की ठंडककृइस धान की गुणवत्ता को विशेष बनाती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में उत्पादित चावल का स्वाद और खुशबू अलग पहचान रखता है और उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग निरंतर बढ़ रही है। ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल की मांग अब छत्तीसगढ़ से बाहर भी तेजी से बढ़ रही है। बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे क्षेत्रों में इसकी अच्छी मांग है। वर्तमान में इसका बाजार मूल्य लगभग 150 रुपये प्रति किलो है, जिससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है। वहीं बीज भी किसानों को 70 रुपए प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे अधिक किसान इस फसल की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
लैलूंगा के किसान चंद्रशेखर पटेल बताते हैं कि उनके परिवार में लंबे समय से जंवाफूल चावल की खेती की जा रही है, लेकिन अब इसकी मांग और पहचान में काफी वृद्धि हुई है। इस वर्ष उन्होंने 4 एकड़ में इसकी खेती की, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 30,000 रुपए की लागत आई। वे बताते हैं कि उन्हें प्रति एकड़ 1 लाख रूपये से अधिक की आय प्राप्त हो रही है। उनका कहना है कि इस फसल से उन्हें स्थिर और संतोषजनक आय मिल रही है, जिससे वे भविष्य में इसकी खेती का रकबा और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। उनके उत्पाद की मांग राज्य के बाहर भी बढ़ रही है, जिससे उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध हो रहा है। ग्राम खैरबहार के किसान भवानी पंडा बताते हैं कि वे वर्ष 2015 से खेती कर रहे हैं और धीरे-धीरे जंवाफूल चावल की खेती की ओर बढ़े हैं। वे पूरी तरह जैविक पद्धति से खेती करते हैं, जिसमें रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता। हरी खाद का उपयोग कर वे खेत की उर्वरता बनाए रखते हैं। भवानी पंडा बताते हैं कि जंवाफूल चावल की खेती से उन्हें पारंपरिक धान की तुलना में अधिक लाभ मिल रहा है। वर्तमान में वे 2 एकड़ में इसकी खेती कर रहे हैं और आने वाले समय में इसे 20 एकड़ तक बढ़ाने का लक्ष्य रखे हुए हैं। जंवाफूल चावल की खेती पूरी तरह जैविक पद्धति से की जा रही है, जिससे इसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनी रहती है। रासायनिक मुक्त उत्पादन के कारण यह चावल स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। यही वजह है कि उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और किसानों को इसका बेहतर मूल्य मिल रहा है।
प्रशासन और कृषि विभाग द्वारा इस फसल को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही किसान समूहों और एफपीओ के माध्यम से उत्पादन और विपणन को संगठित किया जा रहा है। पिछले वर्ष जहां लगभग 700 एकड़ में इसकी खेती की गई थी, वहीं इस वर्ष इसे बढ़ाकर 2000 एकड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे अधिक से अधिक किसान इस लाभकारी फसल से जुड़ सकें। ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल अब लैलूंगा की एक मजबूत पहचान बन चुका है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि क्षेत्र को एक नई पहचान भी दिला रहा है। पारंपरिक खेती, जैविक पद्धति और प्रशासनिक सहयोग के समन्वय से यह पहल किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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