रायगढ़। रामलीला मैदान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चक्रधर समारोह में रायपुर की प्रसिद्ध लोक गायिका मेघा बोस ताम्रकार ने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की विविध विधाओं की मनमोहक प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी सुमधुर आवाज और प्रभावी प्रस्तुति ने कार्यक्रम में लोक संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी।
मेघा बोस ताम्रकार ने गुरु चंदना सेन एवं कृष्ण कुमार पाटिल के सानिध्य में संगीत की साधना की है। महज 6 वर्ष की आयु से ही संगीत के क्षेत्र में सक्रिय मेघा कथक नृत्य में भी विशारद हैं। उन्होंने राज्योत्सव, राजभवन, फिल्म फेस्टिवल्स एवं पावस प्रसंग सहित अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दी हैं। दूसरे दिन उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत की विविध विधाओं को अपनी विशिष्ट गायन शैली में प्रस्तुत किया। लोक धुनों और पारंपरिक संगीत की मिठास से सजी उनकी प्रस्तुति पर दर्शकों ने उत्साहपूर्वक तालियां बजाकर कलाकार का उत्साहवर्धन किया।
नृत्यांगना अनुष्का सुल्तानिया ने मोहा मन

प्रतिष्ठित चक्रधर समारोह के दूसरे दिन रायपुर की बाल कथक नृत्यांगना अनुष्का सुल्तानिया ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति, लयबद्ध पदचाप और आकर्षक नृत्याभिव्यक्ति से दर्शकों का मन मोह लिया। कम उम्र से ही कथक की साधना कर रहीं अनुष्का ने अपनी प्रतिभा के बल पर कला जगत में विशेष पहचान बनाई है। उन्हें अब तक शास्त्रीय नृत्य एवं कला के क्षेत्र में कई प्रतिष्ठित पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इनमें नाट्य नर्तक अवार्ड, राधा रानी अवार्ड, पुरी नाट्य धरोहर सम्मान, श्रीहरि निकेतन सम्मान और कुशवाल महोत्सव सम्मान प्रमुख हैं। चक्रधर समारोह के ऐतिहासिक मंच पर अनुष्का की मनमोहक कथक प्रस्तुति को कला प्रेमियों और उपस्थित दर्शकों ने करतल ध्वनि से सराहा।
गीतिका चक्रधर ने कथक की भाव-भंगिमाओं से बांधा समां

41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह-2026 की संगीत संध्या में युवा कथक कलाकार गीतिका चक्रधर ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। शास्त्रीय नृत्य की भाव-भंगिमाओं, लय और ताल का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हुए गीतिका ने चक्रधर समारोह के मंच पर अपनी कला का शानदार प्रदर्शन किया।
गीतिका चक्रधर ने महज 10 वर्ष की उम्र में अपनी गुरु डॉ. संगीता कापसे से शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा का सफर शुरू किया। अटूट लगन, अनुशासन और कथक के प्रति गहरे समर्पण के साथ उन्होंने इस विधा में अपनी पहचान बनाई है। हरिद्वार, ओडिशा, बनारस, अयोध्या, महाराष्ट्र, गोंदिया सहित अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वह अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं। गीतिका ने ताल धमार में ‘शिव चतुरंग’ की प्रस्तुति दी। इसके पश्चात ताल तीनताल में कृष्ण पर आधारित ठुमरी ‘छोड़ो-छोड़ो’ को भावपूर्ण कथक शैली में प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में कथक की नजाकत, भाव और लयकारी का सुंदर संगम देखने को मिला। दर्शकों ने तालियों की गडग़ड़ाहट से युवा कलाकार का उत्साहवर्धन किया।
निशित के तबले और मुदस्सिर की सारंगी ने छेड़ी सुरों की खूबसूरत धुन

रायगढ़. चक्रधर समारोह की शाम तबले की थाप और सारंगी के सुरों से और भी खास हो गई। मंच पर निशित गंगानी ने तबले पर अपनी उंगलियों का हुनर दिखाया, वहीं मुदस्सिर खान ने सारंगी के भावपूर्ण सुरों से साथ दिया। दोनों के वादन में सुर, ताल और लय का सुंदर मेल सुनने को मिला। प्रस्तुति के दौरान दर्शक संगीत में खोए नजर आए और तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।
निशित गंगानी ने महज तीन वर्ष की उम्र में तबला सीखना शुरू किया था। कम उम्र में ही उन्होंने मंच पर प्रस्तुति देना शुरू कर दिया और देश के कई बड़े कला मंचों पर अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं। जयपुर घराने से जुड़े निशित ने अपने गुरु पंडित फतेह सिंह गंगानी के मार्गदर्शन में तबले की साधना की। उनकी प्रतिभा को भारत सरकार की ओर से भी सम्मान मिल चुका है।
वहीं मुदस्सिर खान ने सारंगी के सुरों से प्रस्तुति में भाव भर दिए। वे सारंगी वादन की समृद्ध परंपरा से जुड़े हैं और इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी सारंगी से निकले मधुर सुरों ने निशित के तबले की थाप के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनाया, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया।
पंडवानी में जीवंत हुआ द्रौपदी चीरहरण का मार्मिक प्रसंग

रायगढ़। चक्रधर समारोह के मंच पर मंगलवार की शाम छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककला पंडवानी की शानदार प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। रेलवे सुरक्षा बल, राजनांदगांव में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत श्रीमती तरुणा साहू ने महाभारत के मार्मिक प्रसंग ‘द्रौपदी चीरहरण’ को पंडवानी के माध्यम से जीवंत कर दिया। सुर, ताल और भाव के साथ उन्होंने इस प्रसंग को इस तरह प्रस्तुत किया कि दर्शक भाव-विभोर हो गए।
तरुणा साहू का पंडवानी से जुड़ाव वर्ष 1994 से है। जवाहर नवोदय विद्यालय में अध्ययन के दौरान उन्हें पंडवानी की महान कलाकार पद्म विभूषण तीजन बाई के सान्निध्य में पंडवानी सीखने का अवसर मिला। गुरु तीजन बाई के साथ उन्होंने दिल्ली, भोपाल, उज्जैन के कालिदास समारोह सहित देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी। उनकी कला-साधना को वर्ष 2005 में लोक एवं पारंपरिक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिली। वर्ष 2024 में अयोध्या महोत्सव में पंडवानी प्रस्तुति के साथ उन्हें आइकॉनिक ऑनरेरी डॉक्टरेट अवॉर्ड और शक्ति सम्मान-2024 से भी सम्मानित किया गया।
कला के साथ तरुणा साहू अपनी वर्दी की जिम्मेदारी भी पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। बच्चों के रेस्क्यू, सुरक्षा और जनजागरूकता अभियानों में भी उनका सक्रिय योगदान रहा है। एक ओर वे पंडवानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोककला को आगे बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर वर्दी के जरिए समाज की सेवा और सुरक्षा का दायित्व निभा रही हैं। मंच पर ‘द्रौपदी चीरहरण’ की प्रस्तुति के दौरान दर्शक महाभारत के इस मार्मिक प्रसंग से जुड़े नजर आए। प्रस्तुति के अंत में दर्शकों ने तालियों के साथ कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। इस प्रस्तुति में बैंजो पर श्री हर्ष मेश्राम (स्वास्थ्य विभाग) और हारमोनियम पर श्री टीकाराम गेंदले (शिक्षा विभाग) ने संगत दी।
कुचीपुड़ी के भाव और लय से सजा समारोह

चक्रधर समारोह की शाम कुचीपुड़ी के रंग में सजी। प्रसिद्ध कुचीपुड़ी नृत्यांगना टी. लक्ष्मी रेड्डी ने ‘दुर्गा तरंगम’ और ‘यक्षगानम’ की प्रस्तुति से दर्शकों को अपनी कला से जोड़ा। नृत्य की लय, भाव और अभिनय के साथ उन्होंने दोनों प्रस्तुतियों को खूबसूरती से मंच पर उतारा। ‘दुर्गा तरंगम’ में मां दुर्गा की शक्ति और भक्ति को भाव-भंगिमाओं के जरिए प्रस्तुत किया गया। चेहरे के भावों और नृत्य मुद्राओं में देवी के अलग-अलग रूप दिखाई दिए। वहीं ‘यक्षगानम’ में अभिनय और नृत्य का सुंदर मेल देखने को मिला। कदमों की गति के साथ बदलते भाव प्रस्तुति को खास बनाते रहे। टी. लक्ष्मी रेड्डी के लिए कुचीपुड़ी केवल नृत्य नहीं, बल्कि साधना और भक्ति है। वे पिछले दो दशकों से अधिक समय से पद्मश्री जयरामा राव के मार्गदर्शन में इस कला की साधना कर रही हैं। उनकी प्रस्तुति में वर्षों की इसी साधना और अनुभव की झलक दिखाई दी। टी. लक्ष्मी रेड्डी देश-विदेश में 2000 से अधिक प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। उन्होंने पेरु, कोस्टा रिका, कनाडा, मलेशिया और भूटान सहित कई देशों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति दी है। राष्ट्रपति भवन में ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों के सामने प्रस्तुति देना भी उनके कला सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। उनकी कला साधना को कई सम्मान मिल चुके हैं। वे दिल्ली के समर्पण स्कूल के जरूरतमंद बच्चों को नि:शुल्क कुचीपुड़ी का प्रशिक्षण देती हैं।



