नारायणपुर। स्नान पूर्णिमा के पावन अवसर पर सोमवार को ऐतिहासिक श्री जगन्नाथ मंदिर दोकड़ा धाम में भक्ति, आस्था और सनातन परंपरा का अनुपम संगम देखने को मिला। सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया था। आसपास के गांवों के अलावा जशपुर जिले एवं पड़ोसी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दोकड़ा धाम पहुंचे। पूरा मंदिर परिसर ‘जय जगन्नाथ’ के जयघोष, शंखध्वनि, घंटानाद और हरिनाम संकीर्तन से गुंजायमान रहा।
निर्धारित मुहूर्त में वैदिक ब्राह्मणों द्वारा विधि-विधान और मंत्रोच्चार के बीच भगवान श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र एवं माता सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के सुगंधित जल से महारण स्नान (महाभिषेक) कराया गया। कलशों में गंगाजल सहित विभिन्न पवित्र तीर्थों का जल, चंदन, केसर, इत्र, पुष्प एवं सुगंधित द्रव्यों का मिश्रण तैयार किया गया था। वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच जैसे ही महाप्रभु का अभिषेक प्रारंभ हुआ, श्रद्धालु ‘हरि बोल’ और ‘जय जगन्नाथ’ के उद्घोष से झूम उठे। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
महाभिषेक के उपरांत भगवान श्री जगन्नाथ को परंपरा के अनुसार दिव्य गजानन (हाथी) वेश धारण कराया गया। भगवान का यह दुर्लभ एवं आकर्षक स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। गजानन वेश में सजे महाप्रभु के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में घंटों तक श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी रही। श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य एवं विश्व कल्याण की कामना की।
इस अवसर पर भगवान को पारंपरिक रूप से 56 प्रकार के व्यंजनों का महाभोग अर्पित किया गया। पूजा-अर्चना एवं भोग के पश्चात महाआरती हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इसके बाद भक्तों के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। महाप्रसाद ग्रहण करने के लिए भी श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
15 दिनों तक नहीं होंगे प्रत्यक्ष दर्शन
स्नान पूर्णिमा के साथ ही अब भगवान श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र एवं माता सुभद्रा 15 दिनों के अनसर काल में प्रवेश कर गए हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार 108 कलशों के जल से स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और विश्राम करते हैं। इस अवधि में मंदिर के गर्भगृह के पट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते। अनसर काल के दौरान महाप्रभु की विशेष सेवा-पूजा (अनसर नीति) संपन्न की जाती है। उन्हें सामान्य भोग अर्पित नहीं किया जाता, बल्कि आयुर्वेदिक परंपरा के अनुसार दशमूल एवं अन्य औषधियों से तैयार विशेष काढ़ा, फलों का रस, शीतल पेय तथा चंदन, कपूर और औषधीय द्रव्यों का शीतल लेप अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इससे महाप्रभु का स्वास्थ्य पुन: स्वस्थ होता है। अनसर काल समाप्त होने के बाद भगवान नवयौवन वेश में भक्तों को दर्शन देंगे। इसके पश्चात परंपरा के अनुसार दोकड़ा धाम में भव्य रथयात्रा महोत्सव का आयोजन होगा, जिसकी तैयारियां भी प्रारंभ हो चुकी हैं।
सुबह से देर शाम तक लगा रहा का तांता
स्नान पूर्णिमा महोत्सव को लेकर सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों का आगमन शुरू हो गया था। महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों ने बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में दिनभर भजन-कीर्तन, हरिनाम संकीर्तन एवं धार्मिक कार्यक्रम चलते रहे। श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए मंदिर समिति एवं सेवायतों द्वारा दर्शन, पूजा एवं प्रसाद वितरण की समुचित व्यवस्था की गई थी, जिससे पूरा आयोजन शांतिपूर्ण एवं व्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
मंदिर समिति ने जताया आभार
श्री जगन्नाथ मंदिर समिति ने स्नान पूर्णिमा महोत्सव को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं, सेवायतों, स्वयंसेवकों, दानदाताओं एवं प्रशासनिक सहयोग के लिए सभी का आभार व्यक्त किया। समिति ने कहा कि महाप्रभु की असीम कृपा और श्रद्धालुओं के सहयोग से इस वर्ष भी स्नान पूर्णिमा महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। अब श्रद्धालुओं की निगाहें अनसर काल के बाद होने वाले नवयौवन दर्शन और भव्य रथयात्रा महोत्सव पर टिकी हैं।



