डॉ. शैलजा सक्सेना
प्रवासी साहित्यकार, कैनेडा
परिचय- टोरोंटो , कैनेडा की प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार डॉ. शैलजा सक्सेना का व्यक्तित्व बहुआयामी है । वे कविता , कहानी , अनुवाद आदि का महत्वपूर्ण लेखन कर हिन्दी भाषा साहित्य के वैश्विक विकास में योगदान कर रही हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए., एम.फिल. और पी.एच.डी. कर आपने, पूर्व में दिल्ली के जानकी देवी कॉलेज कुशलता पूर्वक अध्यापन कार्य किया है । ‘क्या तुमको भी ऐसा लगा?’ (काव्य संग्रह), ‘अष्टाक्षर’ (सह-संकलन) ,लेबनॉन की एक रात’ (कहानी संग्रह), हाशिये उलांघती औरत: प्रवासी’, ‘इतर ‘ आदि महत्त्वपूर्ण कहानियाँ आपने लिखी है । जो विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं । कनाडा में हिंदी रंगमंच के लिए आप विख्यात हैं । मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ , ‘सरस्वती पुरस्कार’ आदि से आपको सम्मानित किया जा चुका है ।
समीक्षक – मीनकेतन प्रधान
हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्व . कमल किशोर गोयनका द्वारा पूर्व में संकल्पित प्रवासी साहित्य के तीन खंडों में से एक खंड ’प्रवासी कथेतर साहित्य’ के संपादन का दायित्व कैनेडा की वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार डॉ.शैलजा सक्सेना को सौंपा जाना गौरव की बात है । संदर्भित आलेख में लेखिका बताती हैं कि प्रकशन का स्वप्न साकार होने की स्थिति में है। इससे विश्व हिन्दी साहित्य के वैशिष्ट्य की अभिवृद्धि होगी।
शैलजा सक्सेना के लेख का यह संदर्भित अंश उक्त प्रकाश्य ग्रंथ की भूमिका का मुख्य भाग है। इस आलेख में उन्होंने मुख्यतः प्रवासी सहित्य की अवधारणा, उसकी विकास यात्रा, विशेषता, काल निर्धारण आदि पहलुओं पर सूक्ष्म रूप से दृष्टिपात करते हुए ‘प्रवासी जीवन ,’प्रवासी साहित्यकार’ , ‘अप्रवासी मानसिकता ,प्रवासी सोच जैसे तथ्यों को बुद्धिमत्ता पूर्वक विश्लेषित किया है ।सन् 1990-2000 के मध्य से भारत में प्रवासी साहित्य के प्रति विकसित दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कोरोनाकालीन परिदृश्य( 2020) में प्रवासी साहित्य के विस्तार और वैशिष्ट्य को उन्होंने युक्तिसंगत ढंग से उजागर किया है। कोरोना काल ( जिसे मैं ‘करु काल’ कहता हूँ ) को प्रवासी साहित्य का उत्कर्ष युग कहना सर्वथा उपयुक्त और ग्राह्य है।आलेख में तीन आयामों के साथ विवेचित प्रवासी साहित्य की भाषा, शिल्प , विदेश के परिवेश, जीवन शैली, द्वंद्व (द्वैत)का मनोविज्ञान, भारतीय सांस्कृतिक बोध, भारतीय अस्मिता, राष्ट्रीय भावना , अतीतकालीन स्मृति चित्र(नॉस्टेलिजिया ) ,भाव विह्वलता , प्रवास भूमि का सामाजिक- सांस्कृतिक जीवन , कारपोरेट सेक्टर की सेवा में नियोजित अनुभव इत्यादि प्रसंगों को बखूबी समाविष्ट किया गया है । लेखिका एक तरह से ‘इसे वसुधैव कुटुंबकम्’ का साकार रूप मानती हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनका यह कथन भीतर तक बहुत गहरे में छू जाता है कि – ‘प्रवासी रचनाकारों का समुदाय भी भारत के विद्वानों और विचारकों से जुड़ कर ’घर वापसी’ जैसा संतोष अनुभव कर रहा है।’
कोरोना काल में ( 2020-2021) इंटरनेट और अन्य माध्यमों से प्रवासी साहित्य और साहित्यकारों से जो तादात्म्य स्थापित हुआ वह निरंतर गतिशील है ।यह प्रसन्नता जनक है । वैश्विक महामारी की दृष्टि से वह काल ( लगभग दो वर्षों का ) भयावह और विषादपूर्ण था।इसका दूसरा पहलू यह कि लॉकडाउन आदि कारणों से इसी काल खंड में देशांतर के हिन्दी साहित्यकारों को ऑनलाइन माध्यमों से साहित्यिक आयोजनों/ विमर्शों से जोड़ा जाने लगा। इससे इनके भावात्मक सरोकार सघन हुए। यह परंपरा बरक़रार है। विज्ञान और तकनीकी विकास के इस दौर में कई मायनों में यह सर्वथा उपयुक्त भी है ।लेखिका ‘प्रवासी’ शब्द की अवधारणा और प्रवृत्तियों में स्पष्टतः विभेद कर इतिहास के पृष्ठों को पलट कर देखती हैं । वक्त के साथ अब भारतीय आलोचकों की सोच में काफी सकारात्मक परिवर्तन भी होने लगे हैं। प्रवासी साहित्य अब हिन्दी का एक विशिष्ट भाग है। भारत के विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में समाहित होने के साथ ही तेज़ी से इस पर शोध कार्य हो रहे हैं। यह भी अत्यंत स्वाभाविक है कि विदेशों में वास करने के कारण साहित्यकारों को भारत जैसा परिवेश नहीं मिल पाता।वहां की जीवन शैली भी भिन्न होती है ।लगभग सभी प्रवासी साहित्यकार इंजिनियर, चिकित्सक , गणितज्ञ या आई टी क्षेत्र से हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य की चेतना को भारत में पाठ्यक्रम से अधिक अपनी अभिरूचि अथवा मनोवृत्ति के कारण आत्मसात् किया है।इसलिए हिन्दी का वैशिष्ट्य उनके व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं बन सका, बन भी नहीं सकता ( वर्तमान में कुछ शिक्षक, लेखक आदि को अपवाद स्वरूप छोड़कर)। ऑनलाइन सुविधाओं और ग्लोबलाइज़ेशन के इस तकनीकी दौर में दुनिया की दूरी वैचारिक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से पट रही है। इस लिहाज़ से प्रवासी साहित्य , भारत के साहित्य की मुख्य धारा में अपनी मूलभूत विशेषताओं सहित अभिन्न रूप से समाहित हो रहा है। इस संदर्भ में एक बात का जिक्र करना अयुक्त न होगा कि ब्रिटेन के प्रवासी हिन्दी कथाकार तेजेंद्र शर्मा जी को ‘प्रवासी’ शब्द खटकता है। वे कार्यक्रमों में अक्सर लिखित – प्रकाशित रूप से ( पुरवाई पत्रिका) अपने वक्तव्यों में प्रवासी शब्द के स्थान पर ‘भारतेतर’ साहित्य के प्रयोग पर ज़ोर डालते हैं। उनका तर्क सही भी है। इसका मुख्य कारण ‘ प्रवासी’ शब्द की अवधारणा (पारिभाषिक) में संकीर्णता के भाव को दर्शाया जाना है। यह शब्द ‘ प्रवासी’ अब हिन्दी में प्रचलित हो चुका है। इसी नाम से सभी जानते – समझते हैं।अनेकों विश्व विद्यालयों में पी-एच. डी. की डिग्री अवार्ड हो चुकी है। होता यह है कि जो शब्द चल पड़ा ,तो चल पड़ा, पीछे पलट कर देखने की फुरसत किसे है? जैसे हिन्दी में ‘ छायावाद’, ‘प्रयोगवाद’ आदि। वैसे किसी भी शब्द के अर्थ का औदार्य उसके साहित्य- वैशिष्ट्य से विज्ञापित होता है, प्रचलित अवधारणाओं से नहीं। इसलिए यह कोई बहुत चिंताजनक नहीं है । तथापि यदि ‘भारतेतर’ शब्द की प्रयुक्ति प्रचलित हो कर स्थापित हो जाए तो कोई हर्ज की बात नहीं । इस शब्द की मूल व्यंजना में ‘प्रवासी’ शब्द की अपेक्षा अधिक व्याप्ति और गुरुता तो है ।लेखिका शैलजा जी ने अपने संदर्भित आलेख में ‘प्रवासी’ शब्द पर सटीक विवेचन प्रस्तुत किया है। इसके अलावा उन्होंने त्रिनिदाद के कीर्तिशेष प्रवासी साहित्यकार हरिशंकर आदेश जी( जन्म 7अगस्त 1936 , निधन -27 दिसंबर 2020) की काव्य पंक्तियों का उल्लेख कर प्रवासी ( भारतेतर ) हिन्दी समुदाय के महत्त्व को रेखांकित किया है-
“हमको कहो न /अवसरवादी,/ हम भी भारत की संतान।/
x x x x/ जितनी आस्था हम रखते हैं, / रखे न पूरा हिंदुस्तान॥”
(कविता -‘भारत की पाती’ से )
यहाँ यह उल्लेख करना बहुत अप्रासंगिक नहीं होगा कि पिछले दिनों एक अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में कीर्तिशेष हरिशंकर आदेश जी की पुत्रवधू डॉ. कादम्बरी आदेश ने आयोजक के आग्रह को स्वीकार करते हुए उनकी कविता का पाठ किया था, उद्देश्य यह था कि प्रवासी साहित्य पर सकारात्मक सोच रखने वाले रचनाकारों को याद रखा जाए , यह एक पुनीत कर्तव्य है ।
आलेख के अगले क्रम में ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ के काल विभाजन पर युक्तिसंगत विचार किया गया है – (1) पीड़ा काल (गिरमिटिया साहित्य) (1960 से पूर्व ) (2) ग्लानि काल-(1960 से 1985 ) (3) उन्मेष काल (1985 ले 2011) (4) संपर्क काल(2011से वर्तमान में)
यद्यपि यह वर्गीकरण आधुनिक कालीन साहित्यिक विकास के संदर्भ में है। विशेष रूप से प्रवास में रहने वाले भारत से गये विभिन्न क्षेत्रों के साहित्यकारों को दृष्टिगत रखते हुए यह निर्धारण किया गया है । गिरमिटिया साहित्य के पूर्व प्रामाणिक रूप से किसी साहित्य की उपलब्धता शोध का विषय है । यद्यपि इसकी संभावना विरल है । विदेश से भारत आने वाले विद्वानों ने भारतीय साहित्य का अनुवाद अन्य भाषाओं में अवश्य किया है ( कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक आदि)।बाद में अनेक कृतियों का अनुवाद हुआ है । काल विभाजन का पहला और दूसरा नामकरण तद्युगीन साहित्यिक प्रवृत्ति की दृष्टि से संगत प्रतीत नहीं होता।यद्यपि इसकी परिस्थितियों और प्रवृत्तियों पर लेखिका ने विद्वतापूर्ण विश्लेषण किया है।पीड़ा और ग्लानि भाववाचक संज्ञा विशेषण हैं जिसे प्रवृति, विशेषता या घटना आधारित होना चाहिए। ‘पीड़ा’ के स्थान पर ‘त्रास’ ( संत्रास या अन्य ) तथा ‘ग्लानि’ के स्थान पर ‘ संक्रमण’ (मध्य या अन्य ) ।यह बात अलग है कि यहाँ प्रवासी साहित्य का वर्गीकरण किया गया है, नामकरण नहीं। इसके बाद गद्य और पद्य साहित्य की भी अलग-अलग धाराएँ हो सकती हैं।
डॉ. शैलजा जी ने काल विभाजन का अपना दृष्टिकोण रखा है।इसकी साहित्यिक विशेषताओं और प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डालते हुए उन्होंने स्थापित हिन्दी प्रवासी साहित्यकारों का उल्लेख किया है ।जैसे – अभिमन्यु अनंत, तोताराम सनाढ्य।इनके अलावा अन्य काल खंडों के भी कई महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। हालाँकि यह लेख मूल भाग का अंश है। हो सकता है ग्रंथ में विस्तृत और समग्ररूपेण तथ्य अवधारित किये गये हों।
हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल , राहुल सांकृत्यायन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र प्रभृति विद्वानों की इतिहास दृष्टि को यहाँ संदर्भित किया जा सकता है। वैसे लगभग एक काल सीमा में होने के कारण इन्हें काल खंड कहा जा सकता है ( गिरमिटिया काल को छोड़कर)।प्रवृत्तिगत विशेषताओं के आधार पर काल विभाजन और नामकरण हिन्दी के गद्य – पद्य क्षेत्र में आधुनिक काल के अन्तर्गत किया गया है ।
फ़िलहाल इतना तो निश्चित हो चुका है कि प्रवासी साहित्य अब हिन्दी साहित्य की मूल धारा का अविभाज्य और शक्तिशाली अंग है । लगभग पिछले दशक से इस पर खूब लिखा जा रहा है। डॉ. दीपक पांडेय और डॉ. नूतन पाण्डेय द्वारा सम्पादित ग्रंथों( प्रवासी साहित्य – भाग 1, 20 साहित्यकार तथा भाग – 2 में 16 साहित्यकार समाहित हैं । कुल 36 साहित्यकारों के जीवन वृत्त और प्रदेय को रेखांकित करते 666 पृष्ठीय इस ( दोनों भाग) ग्रंथ के समर्पण का यह वाक्यांश अवलोकनीय है-“ भारत के बाहर साहित्य सृजन में रत सभी हिन्दी साधकों को समर्पित।” इस वाक्य से सम्पादक द्वय के उदात्त मनोभाव झलकते हैं । अन्य भी कई पुस्तकें उल्लेखनीय हैं । भारत के साहित्यकार और उनके मैत्रेय उपक्रम से इस विषयवस्तु के विमर्श और मतभेदों का समाहार अवश्यंभावी है । डॉ. शैलजा सक्सेना जैसे विद्वानों के उत्कृष्ट और समर्थ विवेचन- सृजन का इस दृष्टि से विशेष महत्त्व है। यह अच्छा संकेत है। इस दिशा में यह आलेख – ‘प्रवासी कथेतर साहित्य’ से चिंतन की नयी दिशाएँ उभरेंगी। शोध की दृष्टि से भी नये मानक स्थापित होंगे।
वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार शैलजा सक्सेना का उक्त आलेख ( ग्रंथ का समग्र मूल भाग) भावी प्रवासी साहित्य का मार्ग प्रशस्त करेगा।ऐसा विश्वास है। प्रकाश्य ग्रंथ के तीनों खंडों की प्रतीक्षा रहेगी।इससे हिन्दी की साहित्य – उदधि तरंगायित होगी।
मीनकेतन प्रधान
पूर्व प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष – हिन्दी,
किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, रायगढ़ (छ.ग.)





