धरमजयगढ़। ग्राम पंचायत उदउदा में मल्टीएक्टिविटी शेड/गोठान निर्माण कार्य से संबंधित सामग्री खरीदी और भुगतान का मामला अब प्रशासनिक शिकायत से निकलकर न्यायालय तक पहुंचने की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। उपलब्ध बिल-वाउचरों के आधार पर संभावित दोहरे भुगतान, सामग्री की वास्तविक आपूर्ति, जीएसटी बिलों की वैधता और संबंधित फर्मों के भौतिक सत्यापन की मांग को लेकर शिकायत की गई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज होने के बाद उसी दिन ‘स्पेशल क्लोजर’ दर्ज कर मामले को नस्तीबद्ध कर दिया गया, जबकि न तो मौके पर जांच हुई और न ही संबंधित दस्तावेजों एवं फर्मों का सत्यापन कराया गया।
मामले की शुरुआत ग्राम पंचायत उदउदा के मल्टीएक्टिविटी शेड/गोठान निर्माण कार्य से जुड़े उपलब्ध बिल-वाउचरों से हुई। दस्तावेजों के अनुसार जुलाई 2023 में एक ही फर्म के दो अलग-अलग बिलों के माध्यम से रुपए 1,98,217 और रुपए 1,98,875 के भुगतान दर्शाए गए हैं। इन बिलों में रेत, दरवाजा-खिडक़ी, छड़, चैनल गेट, पाइप, 20 एमएम, ईंट, 40 एमएम, सीमेंट और तार जैसी सामग्री का उल्लेख है। इसके अलावा अगस्त 2023 में एक अन्य फर्म के बिल के माध्यम से रुपए 1,50,164 का भुगतान प्रोफाइल शीट एवं दरवाजा-खिडक़ी के नाम पर दर्शाया गया है। तीनों भुगतानों की कुल राशि रुपए 5,47,256 है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि इन भुगतानों की वास्तविकता केवल बिल देखने से स्पष्ट नहीं हो सकती। इसके लिए स्वीकृत एस्टीमेट में निर्धारित सामग्री की मात्रा, बिलों में दर्शाई गई मात्रा, स्टॉक पंजी में दर्ज सामग्री, माप पुस्तिका में दर्ज कार्य, भुगतान अभिलेख और मौके पर किए गए वास्तविक निर्माण कार्य का आपस में मिलान आवश्यक है। विशेष रूप से समान अथवा मिलती-जुलती सामग्री के लिए अलग-अलग बिलों से भुगतान दर्शाए जाने के कारण सामग्री की वास्तविक खपत और भुगतान की मात्रा का सत्यापन जरूरी बताया गया है।
मामले में संबंधित फर्मों के जीएसटी बिलों की वैधता की जांच की मांग भी की गई थी। शिकायत में जीएसटीआईएन, फर्म का विधिक नाम, व्यापारिक नाम, पंजीयन की स्थिति, पंजीकरण की प्रभावी तिथि और पंजीकृत व्यवसाय स्थल का संबंधित अभिलेखों से सत्यापन कराने की मांग की गई। साथ ही प्रत्येक बिल की संख्या, दिनांक, सामग्री, मात्रा, कर योग्य राशि, कर राशि और कुल भुगतान का परीक्षण तथा जहां लागू हो वहां ई-इनवॉयस और आईआरएन का सत्यापन कराने की मांग रखी गई।
इसके साथ ही संबंधित फर्मों के भौतिक सत्यापन की मांग की गई थी। यह पता लगाने की आवश्यकता बताई गई कि संबंधित अवधि में फर्में वास्तव में संचालित थीं या नहीं, उनके पंजीकृत पते पर व्यवसाय मौजूद था या नहीं, निर्माण सामग्री का वास्तविक कारोबार होता था या नहीं तथा ग्राम पंचायत को दर्शाई गई सामग्री वास्तव में उन्हीं फर्मों द्वारा उपलब्ध कराई गई थी या नहीं। गोदाम, स्टॉक, खरीद-बिक्री अभिलेख, मूल बिल और परिवहन दस्तावेजों की जांच की मांग भी की गई थी।
रेत की आपूर्ति को लेकर भी शिकायत में अलग से सत्यापन की मांग रखी गई थी। बिलों में दर्शाई गई रेत की रॉयल्टी पर्ची, परिवहन अनुमति अथवा ई-परमिट, रेत के स्रोत या खदान का विवरण तथा संबंधित खनिज अभिलेखों से मात्रा और परिवहन का मिलान कराने की मांग की गई थी।
शिकायतकर्ता ने निर्माण कार्य से संबंधित माप पुस्तिका, स्वीकृत एस्टीमेट, तकनीकी एवं प्रशासकीय स्वीकृति, सभी बिल-वाउचर, भुगतान पंजी, कैशबुक, बैंक भुगतान विवरण, स्टॉक पंजी, मस्टर रोल, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र, मूल्यांकन अभिलेख और पूर्व निरीक्षण रिपोर्ट की जांच तथा इन अभिलेखों की सत्यापित प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग भी की थी।
जांच से पहले ही शिकायत बंद करने का दावा
मामले में नया मोड़ तब आया जब शिकायतकर्ता ने इन्हीं बिंदुओं को लेकर सीएम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायतकर्ता का दावा है कि शिकायत दर्ज होने के उसी दिन उसे ‘स्पेशल क्लोजर’ के माध्यम से बंद कर दिया गया और मामले को नस्तीबद्ध कर दिया गया। उनका कहना है कि इस दौरान न तो मौके पर जाकर निर्माण कार्य का सत्यापन किया गया, न बिलों और स्टॉक पंजी का मिलान कराया गया और न ही संबंधित फर्मों के भौतिक सत्यापन की कार्रवाई हुई।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि किसी शिकायत को जांच के बाद निराधार पाया जाता है तो उसके पीछे की जांच प्रक्रिया और निष्कर्ष सामने आने चाहिए, लेकिन यहां उनके अनुसार बिना जांच और बिना स्पष्ट कारण बताए शिकायत को समाप्त कर दिया गया। उनका आरोप है कि उन्हें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि शिकायत को बंद करने का आधार क्या था और किस स्तर पर मामले की जांच की गई।
अब न्यायालय की शरण लेने की तैयारी
सीएम पोर्टल पर शिकायत बंद होने के बाद शिकायतकर्ता ने अब न्यायालय की शरण लेने की बात कही है। उनका कहना है कि उन्हें न्यायालय पर पूरा भरोसा है और अब वे पूरे मामले को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। उनका कहना है कि न्यायालय में यह भी सामने आना चाहिए कि जब शिकायत में बिलों, भुगतान, जीएसटी विवरण, सामग्री आपूर्ति और संबंधित फर्मों के भौतिक सत्यापन की स्पष्ट मांग की गई थी, तो बिना किसी प्रत्यक्ष जांच के शिकायत को बंद करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया।
मामला न्यायालय तक पहुंचने की स्थिति में सीएम पोर्टल पर दर्ज शिकायत, उसके निराकरण की तारीख, ‘स्पेशल क्लोजर’ की टिप्पणी, शिकायत बंद करने का आधार, संबंधित अधिकारियों की टिप्पणियां तथा यदि कोई जांच की गई हो तो उसके दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
फिलहाल इस पूरे मामले में वास्तविक स्थिति निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। यदि बिलों और भुगतान अभिलेखों का मौके पर किए गए निर्माण, स्टॉक पंजी, माप पुस्तिका और स्वीकृत एस्टीमेट से मिलान कराया जाता है, तो यह स्पष्ट हो सकता है कि रुपए 5,47,256 के दर्शाए गए भुगतानों के पीछे वास्तविक सामग्री आपूर्ति और उपयोग कितना हुआ। वहीं यदि किसी प्रकार की अनियमितता नहीं पाई जाती है तो जांच के निष्कर्ष शिकायत से जुड़े संदेहों को भी दूर कर सकते हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए वित्तीय और दस्तावेजी सत्यापन के मुद्दों पर वास्तविक जांच होती है या मामला ‘स्पेशल क्लोजर’ के साथ ही समाप्त माना जाता है। शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि वे अब न्यायालय में मामले को ले जाएंगे, जहां उनके अनुसार संबंधित जिम्मेदार पक्षों को यह स्पष्ट करना होगा कि शिकायत को किस आधार पर और बिना विस्तृत जांच के बंद किया गया।



