खरसिया। कैलाश शर्मा। पवित्र श्रावण मास और कामदा एकादशी के दुर्लभ धार्मिक संयोग पर संस्कारधानी खरसिया की पुण्यधरा एक अभूतपूर्व सांस्कृतिक क्षण की साक्षी बनी।
अवसर था मारवाड़ी युवा मंच जागृति शाखा द्वारा आयोजित ऐतिहासिक बाल कांवड़ यात्रा का। नन्हें-मुन्ने बच्चों की निश्छल भक्ति, उनके चेहरों की चपलता और सनातन धर्म के प्रति अटूट निष्ठा ने पूरे खरसिया नगर को शिवमय कर दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक जलयात्रा नहीं, बल्कि भावी पीढ़ी में भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के सिंचन का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा।
जलाभिषेक और महाआरती के साथ यात्रा का समापन
नगर के प्रमुख मार्गों से संकीर्तन करते हुए बाल शिवभक्तों का यह जत्था मछली तालाब स्थित प्राचीन शिव मंदिर पहुँचा। यहाँ शास्त्रीय विधि-विधान के साथ बच्चों ने कांवड़ में लाए गए पवित्र जल से भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। इसके उपरांत वातावरण में गूंजती महाआरती की मधुर ध्वनियों के बीच संपूर्ण आयोजन का समापन हुआ। आयोजन की रूपरेखा एवं बाल-कल्याण व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए मारवाड़ी युवा मंच जागृति शाखा की महिला सदस्यों ने बताया हमारा उद्देश्य बच्चों को धर्म के बोझ से नहीं, बल्कि उसकी मिठास और गौरव से परिचित कराना था। सनातन धर्म के प्रति जागरुक करने और और हिंदू धर्म के संस्कारों से जोडऩा है। यात्रा के समापन पर आरती के पश्चात सभी बच्चों के लिए सात्विक फलाहार व नाश्ते का प्रबंध किया गया था। साथ ही, उनके शैक्षणिक प्रोत्साहन के लिए स्कूल उपयोगी सामग्री उपहार स्वरूप प्रदान की गई। उपहार पाकर बच्चों के चेहरों पर खिली मुस्कान ही इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता है।
नन्हें कांधों पर आस्था का भार, गूंजे ‘बोल बम’ के जयकारे
सिद्ध श्री हनुमान मंदिर गंज बाज़ार के पावन प्रांगण से जब इस यात्रा का शुभारंभ हुआ, तो संपूर्ण वातावरण ‘हर-हर महादेव’ और ‘बोल बम’ के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। आयोजन की सबसे सुंदर विशेषता यह रही कि 4 से 12 वर्ष के इन नन्हें कांवडिय़ों ने अपनी छोटी-छोटी कांवड़ स्वयं अपने कांधों पर उठाई हुई थी। अनुशासित पंक्तियों में कदमताल करते बाल भक्तों के उत्साह को देखने के लिए मार्गों के दोनों ओर नगरवासियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। बच्चों की सहज उत्सुकता और अटूट भक्ति भाव शहर में कौतूहल और अपार श्रद्धा का केंद्र बना रहा।
सनातन संस्कृति और कांवड़ परंपरा की सार्थकता
वैदिक परंपरा में कांवड़ यात्रा केवल कायिक तपस्या का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह समर्पण, नियमबद्धता और ईश्वरीय सत्ता के प्रति निष्काम भाव का जागरण है। बाल्यावस्था में ही जब बालक बालिका को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा जाता है, तो वे न केवल धार्मिक अनुष्ठानों को समझते हैं, बल्कि उनमें सेवाभाव, धैर्य और सामाजिक समरसता जैसे मानवीय मूल्यों का स्वाभाविक विकास होता है।
जन-मानस में सराहना, जागृति शाखा का हुआ अभिनंदन
नन्हें-मुन्ने बालकों द्वारा सनातन धर्म की पताका को इस प्रकार गर्व से लहराते देख प्रबुद्ध नागरिकों एवं प्रबुद्ध मंचों ने जागृति शाखा की इस पहल की भूरि-भूरि प्रशंसा की। खरसिया के प्रबुद्ध जनों का मानना है कि आधुनिकता के दौर में बच्चों को अपनी जड़ों और संस्कारों से जोड़े रखने का यह प्रयास अत्यंत प्रशंसनीय और अनुकरणीय है।



