बरमकेला। शासन की योजनाएं कागजों पर तो चमकती हैं, लेकिन धरातल पर उनकी हकीकत कितनी डरावनी है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ग्राम पंचायत बिलाईगढ़ ‘अ’ के सरकारी मिडिल स्कूल में देखा जा सकता है। यहाँ बच्चों के मध्याह्न भोजन के लिए बनाया गया किचन शेड भवन निर्माण के बाद से ही अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। विडंबना यह है कि लाखों खर्च होने के बाद भी आज तक इस भवन का विधिवत उद्घाटन तक नहीं हो सका और अब यह उपयोग से पहले ही जर्जर होकर खंडहर में तब्दील हो रहा है। 60 हजार की लागत, पर मिला सिर्फ ‘मलबा’
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2017-18 में शिक्षा मद से रू. 60,000 की लागत से इस किचन शेड का निर्माण किया गया था। आरोप है कि कम बजट का बहाना बनाकर निर्माण कार्य में भारी अनियमितता बरती गई। भवन का आकार छोटा रखा गया और छत की ढलाई करने के बजाय उस पर स्तरहीन सीमेंट की चादरें डाल दी गईं। गुणवत्ता से इस खिलवाड़ का नतीजा यह हुआ कि भवन की खिड़कियां, दरवाजे और लोहे की छड़ें उपयोग से पहले ही खराब होकर गल चुकी हैं।
घर की रसोई में पक रहा स्कूल का ‘मिड-डे मील’
भवन के अनुपयोगी होने का सबसे बड़ा खामियाजा ‘भुवनेश्वरी महिला स्व-सहायता समूह’ की रसोइयों को भुगतना पड़ रहा है। स्कूल में जगह न होने के कारण उन्हें मजबूरन अपने घरों से भोजन बनाकर लाना पड़ता है। रसोइयों का कहना है कि एक ओर भवन की सुविधा नहीं है, तो दूसरी ओर बढ़ती महंगाई के बीच कुकिंग कास्ट की राशि (प्राइमरी हेतु रू. 6.78 और मिडिल हेतु रू.10.70) ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ऊपर से भुगतान में होने वाली 3-4 महीनों की देरी ने महिलाओं की कमर तोड़ दी है।
सरपंच ने भी माना- ‘घटिया निर्माण’ है बर्बादी की वजह
इस पूरे मामले में बिलाईगढ़ ‘अ’ के सरपंच ने भी अपनी बेबसी जाहिर की है। उन्होंने स्वीकार किया कि स्तरहीन चादरों और घटिया निर्माण सामग्री के कारण भवन इस लायक ही नहीं बचा कि उसका उपयोग किया जा सके। अब पुराने भवन की मरम्मत के बजाय प्रशासन द्वारा नए भवन के निर्माण हेतु प्रस्ताव बनाने की बात कही जा रही है, जो सीधे तौर पर सरकारी धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार की स्वीकारोक्ति है। सवाल- क्या रू. 60,000 की वह राशि केवल कागजी खानापूर्ति के लिए थी? बिना उपयोग के भवन का जर्जर होना क्या उन अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाता जिन्होंने इसके निर्माण की निगरानी की थी?



