सारंगढ़। जंगलों के घने इलाके में बसा ग्राम भकुर्रा आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी विकास की मुख्यधारा से कटकर अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा है। सडक़, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यहां के ग्रामीण नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक दावों के बावजूद गांव की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। ग्राम भकुर्रा जपं बरमकेला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर जंगल के भीतर स्थित है, चारों ओर जंगल से घिरे इस गांव तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सडक़ का अभाव है। गांव की गलियां कच्ची और पथरीली हैं, जहां बारिश में कीचड़ और गर्मी में धूल का साम्राज्य रहता है। हालात इतने खराब हैं कि एम्बुलेंस और आपातकालीन वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते, जिससे बीमार, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। गांव में कुल 135 की आबादी निवासरत है, जिनमें अधिकांश लोग आदिवासी समुदाय से हैं। साक्षरता दर लगभग 86 त्न बताई जाती है, लेकिन इसके बावजूद रोजगार के अवसर न के बराबर हैं। ग्रामीणों का मुख्य जीविकोपार्जन खेती और वनोपज पर निर्भर है। गांव के किसानों का कहना है कि – हाथी, जंगली सूअर सहित अन्य वन्य जीव खेतों में घुसकर फसलों को लगा तार नुकसान पहुंचा रहे हैं, फसल नष्ट होने स किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है और आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2011-12 में गांव तक पहुंच मार्ग निर्माण के लिए 60 लाख रुपये की स्वीकृति मिली थी, लेकिन आज तक कार्य अधूरा पड़ा है। कुछ हिस्सों में ही कच्चा रास्ता बनाया गया, जो बदहाल अवस्था में है। करीब तीन किमी की दूरी आज भी ग्रामीणों के लिए किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं है।
ग्राम भकुर्रा में हैंडपंप की भारी कमी है। महिलाओं को कई किलोमीटर दूर तालाब या अन्य असुरक्षित जल स्रोतों से पानी लाना पड़ता है। गर्मी के दिनों में हालात और भी विकट हो जाते हैं। स्वास्थ्य सुविधा शून्य स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर गांव में कोई उप-स्वास्थ्य केंद्र या नियमित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। मामूली बीमारी में भी ग्रामीणों को दूर-दराज के कस्बों का रुख करना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि – उन्होंने कई बार जन प्रतिनिधियों व अधिकारियों को समस्याओं से अवगत कराया, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हुआ। भूमि पूजन, घोषणाएं तो होती रहीं, पर काम आज तक धरातल पर नहीं उतर सका ? चुनाव के समय नेता गांव पहुंचते हैं, लेकिन बाद में कोई सुध लेने नहीं आता।
ग्राम भकुर्रा की यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि ग्रामीण विकास के सरकारी दावों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। ग्रामीणों ने मांग की है कि – तत्काल पक्की सडक़ निर्माण, पेय जल की स्थायी व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जाए, जंगली जानवरों से फसल सुरक्षा के ठोस इंतजाम किए जाएं ताकि – ग्राम भकुर्रा के लोगों को भी सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन मिल सके। यदि शीघ्र ठोस पहल नहीं की गई, तो ग्राम भकुर्रा की यह पीड़ा आने वाले समय में और विकराल रूप ले सकती है।
आजादी के 79 वर्ष बाद भी बदहाली का दंश झेलता ग्राम भकुर्रा



