नारायणपुर/जशपुर। प्रदेश की धरती रहस्यमयी मंदिरों, प्राचीन गुफाओं और लोक आस्थाओं से परिपूर्ण मानी जाती है। इन्हीं में से एक अनमोल धरोहर है नारायणपुर पंचायत के अंतर्गत चिटकवाइन–बोड़ालाता गांव की सीमा पर स्थित सांवा पहरिया का यह रहस्यमयी गुफा, जो आज श्रद्धालुओं, प्रकृति प्रेमियों और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनती जा रही है। बादलखोल अभ्यारण्य और सामान्य वन क्षेत्र के मध्य स्थित यह गुफा न केवल प्राकृतिक दृष्टि से मनोरम है, बल्कि अपने भीतर गहन धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी समेटे हुए है।
यज्ञ स्थल और अनुष्ठानों का महत्व
गुफा के समीप स्थानीय ग्रामीणों ने घांस से निर्मित यज्ञ स्थल का निर्माण किया है, जिसमें हवन कुंड बनाए गए हैं। यहां, कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न कराए जाते हैं। यह यज्ञ स्थल ग्रामीण समाज को धार्मिक रूप से एकजुट करने का कार्य भी करता है।
गुफा का भौगोलिक और प्राकृतिक महत्व
यह गुफा बादलखोल अभ्यारण्य के नजदीक ओर नारायणपुर सर्किल से सटा सांवा पहरिया पहाड़ पर स्थित है, जहां चारों ओर घना जंगल, पहाडिय़ों की श्रृंखला और पक्षियों की चहचहाहट इस स्थान को अत्यंत शांत, पवित्र और दिव्य वातावरण प्रदान करती है। गुफा के भीतर प्रवेश करते ही ठंडक और नमी का एहसास होता है, जो प्राकृतिक रूप से बने इस स्थल की विशिष्ट पहचान है। ग्रामीणों के बताए अनुसार अंदर घुप्प अंधेरा रहता है, जिससे यहां का वातावरण और भी रहस्यमयी बन जाता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यही अंधकार और शांति इस स्थान को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। ग्रामीणों ने बताया कि इस गुफा के अंदर एक विशाल कुंड स्थित है, जो तालाब के आकार की तरह है। ग्रामीणों के अनुसार, यह कुंड कभी सूखता नहीं और वर्ष भर इसमें जल भरा रहता है। यही कुंड इस गुफा के रहस्य को और गहरा बनाता है।
अखंड कीर्तन और धार्मिक आयोजनों की परंपरा
यहां प्रतिवर्ष माघ माह में अखंड कीर्तन ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का आयोजन किया जाता है। इस दौरान पूरा क्षेत्र भक्ति, संगीत और श्रद्धा के वातावरण में डूब जाता है। आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इसके अतिरिक्त समय-समय पर, हवन, पूजा-पाठ और भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र
गुफा के भीतर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा शिवलिंग और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गई है। वर्षों से यहां नियमित पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। प्रतिदिन सुबह-शाम दीप प्रज्वलित कर पूजा अर्चना की जाती है। विशेष रूप से प्रत्येक सोमवार को जलाभिषेक किया जाता है, जिसमें आसपास के गांवों के श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। मंगलवार को भी विशेष पूजा होती है, जिसे क्षेत्र में अत्यंत फलदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस गुफा में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। कई लोगों का कहना है कि यहां पूजा करने के बाद उन्हें मानसिक शांति, पारिवारिक सुख प्राप्त होती है।
मान्यता और लोक विश्वास
इस गुफा से जुड़ी कई किवदंतियां पीढिय़ों से चली आ रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्राचीन काल में भगवान शिव और माता पार्वती हाथी पर सवार होकर इस क्षेत्र में भ्रमण करते थे। इसी कारण इस स्थान को शिव-पार्वती का निवास स्थल माना जाता है। यही लोक विश्वास इस गुफा को सामान्य धार्मिक स्थल से अलग और विशेष बनाता है।
विकास की आवश्यकता और ग्रामीणों की मांग
स्थानीय ग्रामीण चंदे की राशि से इस स्थल का धीरे-धीरे विकास कर रहे हैं। इसी चंदे से स्थायी यज्ञशाला का निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया, जो धन के कमी के कारण अधूरा पड़ा है। यहां सामुदायिक भवन, बिजली व्यवस्था, पेयजल सुविधा, शौचालय और सडक़ जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। जो इस स्थल पर बनना बहुत जरूरी है। ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की अनदेखी के कारण यह स्थल आज भी सुविधाओं से वंचित है। उनकी मांग है कि शासन-प्रशासन इस पवित्र और ऐतिहासिक स्थल को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करे, ताकि क्षेत्र के लोगों को रोजगार के अवसर भी मिल सकें और श्रद्धालुओं को सुविधा भी।
संरक्षण और भविष्य की पीढिय़ों के लिए धरोहर
चिटकवाइन–बोड़ालाता की यह सांवा पहरिया गुफा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि इसका समुचित संरक्षण और संवर्धन किया जाए, तो यह स्थान आने वाली पीढिय़ों के लिए आस्था, रहस्य और इतिहास की अमूल्य धरोहर बन सकता है। यह गुफा आज भी मौन रहकर अपनी कथा स्वयं कहती है—बस जरूरत है इसे सुनने, समझने और संजोने की।
इतिहास से जुड़ा क्षेत्र
ग्रामीणों के अनुसार, यह क्षेत्र कभी राजा-रजवाड़ों का शिकारगाह हुआ करता था। इस गुफा से कुछ दूरी पर नारायणपुर में डोम राजा का गढ़ स्थित था, जिसके अवशेष आज भी आरा पहाड़ में देखे जा सकते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यहां की पहाडिय़ां और जंगल सदियों से अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी रहे हैं।
पर्यटन की अपार संभावनाएं
गुफा के सामने स्थित पहाड़ी पर चढक़र बादलखोल अभ्यारण्य का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यह दृश्य पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। यदि इस स्थान का समुचित विकास किया जाए, तो यह धार्मिक पर्यटन और प्रकृति पर्यटन दोनों के लिए एक आदर्श स्थल बन सकता है।
घने जंगलों और पहाडिय़ों में छिपा सांवा पहरिया की गुफा
श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बना, जंहा प्रकृति स्वयं करती है देवताओं का स्वागत, आस्था, रहस्य और इतिहास का अद्भुत संगम: चिटकवाइन-बोड़ालाता की गुफा बनी नारायणपुर क्षेत्र की पहचान



