रायपुर। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की कथित शराब घोटाले में गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी। कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई ‘टुकड़ों में’ नहीं की जा सकती। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि वह अगले साल जनवरी के पहले सप्ताह में मामले की सुनवाई करेगी। चैतन्य बघेल को प्रवर्तन निदेशालय ्रने 18 जुलाई 2025 को कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया था। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को सही ठहराने वाले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 17 अक्टूबर के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसके अलावा उन्होंने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 50 समेत कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान चैतन्य बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा कि जांच एजेंसियां मनमाने ढंग से गिरफ्तारी कर रही हैं और जांच लगातार जारी रखती हैं। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति को रिहा किए जाने के बाद दूसरा वारंट जारी कर दिया जाता है और अब ‘ओपन-एंडेड’ वारंट का चलन हो गया है। उन्होंने मांग की कि किसी भी तरह के दंडात्मक कदम न उठाए जाएं।
वहीं, ईडी की ओर से पेश अधिवक्ता जोहेब हुसैन ने कोर्ट को बताया कि चैतन्य बघेल की जमानत याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हो चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने कहा कि जब आरोपी न्यायिक हिरासत में है, तो दंडात्मक कार्रवाई का सवाल ही नहीं उठता और वह एक अन्य मामले में अग्रिम जमानत की मांग कर रहा है। पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि मामले की समग्र सुनवाई आवश्यक है और इसे चरणबद्ध तरीके से नहीं सुना जा सकता। बता दें है कि सीबीआई और ईडी सहित केंद्रीय जांच एजेंसियां महादेव सट्टेबाजी ऐप, चावल मिलों से जुड़े मामलों तथा कथित कोयला, शराब और डीएमएफ घोटालों की जांच कर रही हैं, जो कथित तौर पर भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हुए थे। इससे पहले 4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में राहत के लिए सीधे शीर्ष अदालत का रुख करने की प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई थी और भूपेश बघेल और उनके बेटे से कहा था कि वे केंद्रीय एजेंसियों की जांच वाले मामलों में पहले हाईकोर्ट जाएं।
चैतन्य बघेल की याचिका पर सुनवाई टली
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केस की सुनवाई टुकड़ों में नहीं की जा सकती



