मोहन नायक/ बरमकेला। हिंदू धर्म में सावन मास भगवान शिव की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। सावन के सोमवार को शिवालयों में जलाभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। ऐसी ही आस्था, इतिहास और पुरातात्विक विरासत को अपने भीतर समेटे हुए है बरमकेला विकासखंड के सरिया क्षेत्र के समीप स्थित पुजेरीपाली का प्राचीन केवटीन देउल शिव मंदिर। छठवीं शताब्दी के इस पुरातन शिवालय को लेकर स्थानीय जनमानस में अनेक रोचक किंवदंतियां प्रचलित हैं। मान्यता है कि यहां स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है और मंदिर का निर्माण स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था।

यहाँ के पुजारी अभिमन्यु गिरी द्वारा दी गईं जानकारी एवं जिला पुरातत्व समिति के सदस्य रहे पत्रकार मोहन नायक द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार, इस मंदिर से जुड़ी जनश्रुति पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में करने का संकल्प लिया था और शर्त थी कि किसी व्यक्ति के जागने से पहले मंदिर का निर्माण पूरा हो जाना चाहिए। मंदिर निर्माण अंतिम चरण में था, तभी ब्रह्म मुहूर्त में केवट समाज की एक महिला उठकर ढेंकी चलाने लगी। ढेंकी की आवाज विश्वकर्मा तक पहुंची और लोगों के जाग जाने का आभास होते ही उन्होंने मंदिर का निर्माण अधूरा छोड़ दिया।
जनश्रुति के अनुसार इसी वजह से मंदिर के कलश, स्तंभ सहित कुछ हिस्से आज भी अधूरे दिखाई देते हैं। केवट समाज की महिला से जुड़ी इस कथा के कारण मंदिर को केवटीन देउल के नाम से जाना जाने लगा। स्थानीय लोगों की आस्था में इस मंदिर का विशेष स्थान है।
पाताल से जुड़ा होने की मान्यता
केवटीन देउल को लेकर एक और रोचक मान्यता प्रचलित है। श्रद्धालु इसे पाताल से जुड़ा हुआ मानते हैं। यहां शिवलिंग पर जलाभिषेक के दौरान जल भराव करने की परंपरा भी रही है, लेकिन मान्यता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल कभी भर नहीं पाया। मंदिर के पुजारी अभिमन्यु भी इस परंपरा और मान्यता का उल्लेख करते हैं। यही रहस्य और आस्था इस प्राचीन शिवालय को श्रद्धालुओं के लिए और भी आकर्षण का केंद्र बनाती है।
अद्भुत स्थापत्य कला का नमूना
धार्मिक आस्था के साथ-साथ केवटीन देउल अपने स्थापत्य और पुरातात्विक महत्व के कारण भी विशिष्ट है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर में चौकोर गर्भगृह, अंतराल और मुख-मंडप है। वर्तमान मुख-मंडप आधुनिक निर्माण माना जाता है, जबकि मूल मंदिर मुख्यत: ईंटों से निर्मित है और इसके द्वार-फ्रेम में विशिष्ट शिल्प दिखाई देता है। मंदिर का विमान पंचरथ योजना पर आधारित है। अधिष्ठान में खुर, कुंभ, कलश, अंतरपट्ट और कपोत जैसी विभिन्न स्थापत्य-सज्जाएं देखने को मिलती हैं। कुंभ के ऊपर चंद्रशाला की आकृतियां तथा कलश पर पत्तियों के अलंकरण मंदिर की कलात्मक विशेषता को दर्शाते हैं। जंघा को दो स्तरों में विभाजित किया गया है और विभिन्न रथों पर चंद्रशाला, आयताकार उभार तथा अन्य अलंकरणों के अवशेष दिखाई देते हैं।
मंदिर का शिखर लाटिना नागर शैली का है, जिसमें छह भूमियां अथवा स्तर दिखाई देते हैं। प्रत्येक भूमि को अमलक द्वारा विभाजित किया गया है। स्थापत्य की ये विशेषताएं इस मंदिर को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की प्राचीन स्थापत्य परंपरा और कला का महत्वपूर्ण साक्ष्य बनाती हैं।
सावन में विशेष महत्व
सावन मास में केवटीन देउल शिव मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। विशेषकर सावन सोमवार को दूर-दराज के गांवों और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां भगवान शिव की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। धार्मिक आस्था के साथ इस मंदिर की प्राचीनता और स्थापत्य विशेषताएं भी लोगों को आकर्षित करती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के अलावा कई बार विदेशी पर्यटक और शोधार्थी भी इस ऐतिहासिक मंदिर को देखने पहुंच चुके हैं। केवटीन देउल आज भी अपनी अधूरी स्थापत्य संरचना, स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी मान्यताओं और सदियों पुरानी लोककथाओं के कारण लोगों के लिए कौतूहल और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। जरूरत है कि इस प्राचीन धरोहर के धार्मिक महत्व के साथ-साथ इसके पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व को भी व्यापक स्तर पर सामने लाया जाए तथा इसके संरक्षण की दिशा में गंभीर पहल हो।



