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NavinKadam > पंखाजूर > शिक्षा के मंदिर बदहाल, झोपड़ी में पढऩे को मजबूर बच्चे,कागजों में विकास, हकीकत में जर्जर स्कूलों में शिक्षा
पंखाजूर

शिक्षा के मंदिर बदहाल, झोपड़ी में पढऩे को मजबूर बच्चे,कागजों में विकास, हकीकत में जर्जर स्कूलों में शिक्षा

स्कूल नहीं, हादसे का इंतजार जर्जर भवनों में चल रही कक्षाएं, नए शिक्षा सत्र में भी नहीं बदली तस्वीर और नौनिहाल जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर

lochan Gupta
Last updated: June 18, 2026 11:42 pm
By lochan Gupta June 18, 2026
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3 Min Read

पखांजुर से हरण बिस्वास की रिपोर्ट। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ प्रदेशभर के स्कूलों में बच्चों की चहल-पहल लौट आई है, लेकिन कोयलीबेड़ा विकासखंड के कई स्कूलों की बदहाल स्थिति शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यहां दर्जनों स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चे सुविधाओं के अभाव और जर्जर भवनों के बीच पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
जानकारी के अनुसार विकासखंड में 15 स्कूल पूरी तरह अति जर्जर अवस्था में हैं, जबकि 91 स्कूलों को तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है। इसके बावजूद नए सत्र की शुरुआत कर दी गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्कूल भवनों की स्थिति में कोई सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।
सबसे चिंताजनक स्थिति कलरकूटनी माध्यमिक शाला की है। यहां का स्कूल भवन पिछले 10 वर्षों से जर्जर पड़ा हुआ है। हालात ऐसे हैं कि भवन में बच्चों को बैठाना भी जोखिम भरा माना जा रहा है। मजबूरी में पिछले 5 वर्षों से ग्रामीणों के सहयोग से बनाई गई एक अस्थायी झोपड़ी में बच्चों की पढ़ाई संचालित की जा रही है। बरसात और गर्मी के मौसम में इस झोपड़ीनुमा व्यवस्था में शिक्षा ग्रहण करना विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।वही चितरंजन नगर,विबेक नगर,जैसे अनेको स्कूलों की स्तिथि चिंताजनक बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार प्रशासन और शिक्षा विभाग को स्कूल भवन निर्माण एवं मरम्मत की मांग से अवगत कराया गया, लेकिन आज तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। वहीं अभिभावकों में भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। बड़ा सवाल यह है कि जब नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है, तब भी जर्जर स्कूल भवनों की समस्या का समाधान क्यों नहीं हो पाया? क्या बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना केवल कागजों तक सीमित है? शिक्षा के मंदिर खुद बदहाली का शिकार हैं और नौनिहाल जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ऐसे में अब सभी की निगाहें प्रशासन और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं कि आखिर इन जर्जर स्कूलों की सुध कब ली जाएगी।

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