रायगढ़। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए गरीबों तक राहत पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाने वाला आपूर्ति तंत्र एक बार फिर कटघरे में खड़ा है। घरघोड़ा क्षेत्र में उचित मूल्य दुकानों से वितरित किए जा रहे चावल की गुणवत्ता को लेकर जिस तरह का जनाक्रोश सामने आया है, उसने न सिर्फ नागरिक आपूर्ति निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की साख को भी झकझोर दिया है।
हितग्राहियों का आरोप है कि उन्हें जो चावल दिया जा रहा है, वह मानकों के अनुरूप नहीं है, बल्कि उसमें ‘खंडा’ यानी टूटे दानों की भरमार है। कई उपभोक्ताओं ने इसे खुले तौर पर ‘पशु आहार से भी बदतर’ बताते हुए नाराजगी जताई है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर नगर के वार्डों तक एक ही शिकायत गूंज रही है ‘क्या यही गरीबों के लिए तय गुणवत्ता है?’
राशन दुकानों पर पहुंचे लोगों का कहना है कि चावल की गुणवत्ता इतनी खराब है कि उससे भोजन बनाना मुश्किल हो रहा है। कई परिवारों ने इसे लेने से इंकार तक कर दिया, तो कुछ ने मजबूरी में उठाया, लेकिन आक्रोश भीतर ही भीतर सुलग रहा है। सवाल सीधा हैकृअगर यह चावल आम बाजार में बेचा जाए, तो क्या कोई खरीदेगा? इस पूरे मामले ने नागरिक आपूर्ति निगम और खाद्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। यदि वितरण से पहले गुणवत्ता की जांच वास्तव में की गई होती, तो इतनी बड़ी मात्रा में घटिया चावल दुकानों तक कैसे पहुंच गया? या फिर जांच महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है?
सूत्रों की मानें तो भंडारण से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया में कई स्तरों पर लापरवाही की आशंका जताई जा रही है। अंदरखाने यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कहीं यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत का मामला तो नहीं है, जिसके चलते निम्न स्तर का चावल बिना रोकटोक हितग्राहियों तक पहुंच गया।
चौंकाने वाली बात यह है कि मामला तूल पकडऩे के बावजूद विभागीय स्तर पर अब तक कोई ठोस और आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह चुप्पी अपने आप में कई सवाल खड़े कर रही हैकृक्या जिम्मेदार अधिकारी स्थिति की गंभीरता को नजरअंदाज कर रहे हैं, या फिर जवाबदेही से बचने की कोशिश हो रही है? स्थानीय नागरिकों ने मीडिया के माध्यम से प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में गरीबों के हक के साथ इस तरह का खिलवाड़ दोहराया न जा सके। गरीब की थाली में परोसे जा रहे इस ‘खंडा खेल’ ने व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस जनाक्रोश को गंभीरता से लेते हुए कब तक सुधारात्मक कदम उठाता है।
गरीब की थाली में ‘खंडा’ चावल का खेल!
घटिया चावल पर भडक़ा जनाक्रोश, आपूर्ति तंत्र पर उठे गंभीर सवाल



