जशपुर/नारायणपुर 14 मार्च 2026। जिले का प्रसिद्ध बादलखोल अभ्यारण्य इन दिनों आग की लपटों में सुलगता नजर आ रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि स्टेट हाईवे से गुजरने वाले राहगीरों को भी जंगलों से उठता धुआं साफ दिखाई देने लगा है। नारायणपुर, सेन्द्रिमुंडा और बेने क्षेत्र के जंगलों में लगभग रोज आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी गंभीर स्थिति के बावजूद वन विभाग का अमला लगभग मूकदर्शक बना हुआ है। जंगलों में दिन हो या रात, आग की घटनाएं सामने आ रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी समय रहते उसे रोकने या आग लगाने वालों पर कार्रवाई करते नजर नहीं आते। इससे साफ तौर पर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
दरअसल इन दिनों महुआ का सीजन चल रहा है। महुआ बीनने में आसानी के लिए कुछ असामाजिक तत्व जानबूझकर पेड़ों के नीचे सूखी घास और खरपतवार में आग लगा देते हैं। शुरुआत में यह आग छोटी होती है, लेकिन तेज हवा और सूखे पत्तों के कारण देखते ही देखते पूरे जंगल में फैल जाती है। इससे महुआ के पेड़ों के नीचे उगने वाले छोटे पौधे, वनस्पतियां और कई प्रकार की जैव विविधता जलकर नष्ट हो जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर वन विभाग के रेन्जर, सर्किल दरोगा, नाकेदार, वन रक्षक और फायर वाचर नियमित रूप से जंगलों में सुबह-शाम गश्त करें तो आग लगाने वालों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई जगहों पर वन अमले की गश्त सिर्फ सडक़ों तक ही सीमित रह जाती है। जंगल के अंदर जाकर निगरानी करने की गंभीरता दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि असामाजिक तत्व बेखौफ होकर जंगलों में आग लगाने का काम कर रहे हैं। उन्हें इस बात का डर ही नहीं रह गया है कि कोई कार्रवाई होगी। परिणामस्वरूप हर साल महुआ सीजन में बड़ी मात्रा में वन संपदा जलकर राख हो जाती है और जंगल का घनत्व लगातार कम होता जा रहा है। विभागीय व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक कई जगहों पर एक ही नाका को दो से तीन बिट का चार्ज दे दिया गया है। ऐसे में एक नाकेदार के लिए इतने बड़े इलाके की निगरानी करना बेहद मुश्किल हो जाता है। जब एक साथ कई जगह आग लग जाती है तो सीमित कर्मचारियों के कारण उस पर समय रहते काबू पाना संभव नहीं हो पाता।
हालांकि कई बार वन कर्मचारी खुद भी यह कहते सुने जाते हैं कि “एक आदमी आखिर कितनी जगह देखे?” लेकिन सवाल यह भी है कि अगर व्यवस्था में इतनी बड़ी खामियां हैं तो उच्च अधिकारियों ने अब तक इसे सुधारने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए? जंगलों में लगने वाली आग से सिर्फ पेड़ों के नीचे की घास ही नहीं जलती, बल्कि कई छोटे पौधे और वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास भी नष्ट हो जाता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रही तो बादलखोल अभ्यारण्य की जैव विविधता और हरियाली पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
वन विभाग की ओर से समय-समय पर ग्रामीणों से जंगलों में आग नहीं लगाने की अपील जरूर की जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बहुत कम दिखाई देता है। असामाजिक तत्व हर साल महुआ सीजन में आग लगाने की घटनाओं को अंजाम देते हैं और विभागीय लापरवाही के कारण उनका मनोबल और बढ़ता जा रहा है।
सवाल जो खड़े हो रहे हैं
जब रोज जंगलों में आग लग रही है तो रेन्जर, दरोगा और नाकेदार की गश्त आखिर कहां हो रही है? अगर स्टेट हाईवे से धुआं दिखाई दे रहा है तो वन विभाग को इसकी खबर क्यों नहीं लगती? जंगलों में आग लगाने वालों पर अब तक कितनी कार्रवाई हुई?एक नाका को दो-तीन बिट का चार्ज देकर आखिर उच्च अधिकारी क्या साबित करना चाहते हैं? क्या वन विभाग के लिए जंगलों की सुरक्षा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई है?
अब जरूरत इस बात की है कि वन विभाग के उच्च अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लें, जंगलों में सघन गश्त सुनिश्चित करें और आग लगाने वालों पर सख्त कार्रवाई करें। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो महुआ बीनने की आड़ में बादलखोल अभ्यारण्य की हरियाली धीरे-धीरे राख में तब्दील होती चली जाएगी। जब इस संबंध में बादलखोल अभ्यारण्य के उप निदेशक से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनका फोन नहीं लग सका। वहीं अभ्यारण्य के अधीक्षक से बात करने पर उन्होंने खुद को मीटिंग में होने की बात कही और कुछ ही क्षण बाद फोन करने की बात कही गई। इससे मामले को लेकर स्थानीय विभाग के जिम्मेदारों की गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं।स्टेट हाईवे से दिख रहा धुआं, जंगलों में धधकती लपटें।
स्टेट हाईवे से दिख रहा धुआं, जंगलों में धधकती लपटें
नारायणपुर, सेन्द्रिमुंडा और बेने के जंगलों में लगातार आग



