जशपुरनगर। छत्तीसगढ़ के शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों को जून 2026 से पेंशन का भुगतान नहीं हो रहा है। लंबे समय से पेंशन पर निर्भर बुजुर्ग सेवानिवृत्त कर्मचारियों के सामने आर्थिक संकट की स्थिति है। पेंशनधारक कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर पेंशन एवं ग्रेच्युटी व्यवस्था पर पुनर्विचार करने तथा लंबित पेंशन का भुगतान कराने की मांग की है।
पेंशनधारकों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में लगाया है। खासकर ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में स्थित महाविद्यालयों में सीमित संसाधनों के बावजूद हजारों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने में शिक्षकों और कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनका कहना है कि सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन कोई अनुग्रह राशि नहीं, बल्कि लंबे सेवाकाल के बाद सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा का आधार है। करीब चार दशक से चली आ रही पेंशन व्यवस्था बंद होने से वृद्ध पेंशनधारकों के सामने दवा, इलाज और रोजमर्रा के खर्चों को लेकर परेशानी बढ़ गई है। हालिया रिपोर्टों में भी अनुदानित महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त शिक्षकों की पेंशन रुकने और लंबित भुगतान को लेकर विरोध दर्ज किया गया है।
1 सितंबर के शासन आदेश से जुड़ा है मामला
ज्ञापन में छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा विभाग के 1 सितंबर 2026 के आदेश क्रमांक श्वस्ञ्जक्च/18649/2026/38-2 का उल्लेख किया गया है। आदेश में शत-प्रतिशत अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों के पेंशनरों को उनके सेवानिवृत्ति के समय लागू वेतनमान के अनुरूप पेंशन एवं उपादान देने संबंधी प्रस्ताव पर मंत्रिपरिषद के निर्णय का उल्लेख है। आदेश के अनुसार नियमों में प्रावधान एवं लोकहित में न होने के कारण विभागीय प्रस्ताव को अमान्य किया गया तथा उच्चतम न्यायालय, नई दिल्ली में लंबित प्रकरणों में उचित विधिक पैरवी किए जाने के लिए विभाग को परामर्श दिया गया है।
8.33 प्रतिशत सीपीएफ अंशदान का भी हवाला
पेंशनधारकों ने 26 अक्टूबर 2010 के शासन निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि पांचवें वेतनमान के आधार पर पेंशन तथा चौथे वेतनमान के आधार पर ग्रेच्युटी की व्यवस्था लागू की गई थी। उनका कहना है कि कर्मचारियों के वेतन से शासन द्वारा निर्धारित 8.33 प्रतिशत सीपीएफ राशि भी नियमित रूप से काटकर विभाग में जमा की जाती रही है। पेंशनधारकों का कहना है कि इतने लंबे समय से लागू व्यवस्था को अचानक समाप्त करने से 65 से 90 वर्ष की आयु के बुजुर्गों के सामने गंभीर आर्थिक एवं सामाजिक समस्या उत्पन्न हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय तक पेंशन जारी रखने की मांग
पेंशनधारकों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि उच्चतम न्यायालय में लंबित प्रकरणों का अंतिम निर्णय आने तक पूर्व से मिल रही पेंशन एवं ग्रेच्युटी की व्यवस्था जारी रखी जाए तथा जून 2026 से लंबित पेंशन का भुगतान किया जाए। उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा विभाग के 1 सितंबर 2026 के आदेश में इस मामले से संबंधित न्यायालयीन प्रकरणों में उचित विधिक पैरवी किए जाने का उल्लेख है। इसी के बाद पेंशन व्यवस्था को लेकर विवाद गहरा गया है। जगदीश पाठक, विष्णुभूषण दुबे, लोकनाथ सिंह, रामदास पटेल और शांति राम सहित अन्य पेंशनधारक कर्मचारियों ने बगीचा में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी मांगें रखीं और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।



