खरसिया। नगर की पवित्र पावन भूमि पर बहु झोलरीवाले गर्ग परिवार के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर पूज्य आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामी जी महाराज ने व्यासपीठ से भक्ति, माँ की महिमा और सत्संग के महत्व पर ओजस्वी विचारों की अमृत वर्षा की। कथा के दौरान आचार्य श्री ने माँ के स्थान को सर्वोच्च बताते हुए कहा कि माँ की सेवा ही ईश्वर कृपा का द्वार खोलती है। जिस घर में माँ सुखी रहती है, वह घर स्वर्ग समान हो जाता है। भक्ति और भक्तों के प्रकार आचार्य जी ने भजन के चार प्रकारों का वर्णन करते हुए निष्काम भक्ति को सर्वोपरि बताया आशा लोभ से की गई भक्ति अधिक समय नहीं टिकती। एक कामना पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है और पूर्ति न होने पर मन में नास्तिकता आने लगती है। भय भयवश ईश्वर की शरण में जाना।
कर्तव्य भक्ति को अपना धर्म और दायित्व मानकर करना। केवल निष्कपट प्रेम के लिए की जाने वाली भक्ति सर्वश्रेष्ठ है, जिस पर प्रभु की विशेष कृपा बरसती है। साथ ही, उन्होंने गीता के अनुसार चार प्रकार के भक्तों—ज्ञानी, आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी का उल्लेख करते हुए बताया कि धन या संसार की कामना छोडक़र की गई निष्काम भक्ति ही जीव का वास्तविक कल्याण करती है। ?सत्संग और श्रेष्ठ राजा का चरित्र – राजा के धर्म पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि राजा का चरित्र श्रेष्ठ, समभावी और सदाचारी होना चाहिए। दुराचारी राजा के राज्य में अकाल और प्राकृतिक प्रकोप से प्रजा दु:खी रहती है। सत्संग की महिमा बताते हुए महाराज जी ने कहा कि सत्संग से बुद्धि की अज्ञानता दूर होती है और व्यक्ति पाप कर्मों से बचता है। जिस घर में श्रीमद्भागवत, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता विराजती हैं, वहाँ साक्षात् भगवान का वास होता है।
भगवान श्री कृष्ण का दिव्य जन्मोत्सव झूमे श्रद्धालु
कथा में मनु-प्रियव्रत, भगवान के 24 अवतार, जड़ भरत, ऋषभदेव जी, नरक वर्णन और वामनावतार की दिव्य कथाओं का वाचन हुआ। कथा के उत्तरार्ध में जैसे ही भगवान श्री कृष्ण के दिव्य जन्मोत्सव का प्रसंग आया, पूरा पांडाल नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। आओ आओ मेरे नंदलाल आ जाओ और तेरे चरण कमल में श्याम लिपट जाऊं रज बन के जैसे भावपूर्ण भजनों पर आकर्षक झांकियों के साथ श्रोता मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगे।



