सारंगढ़-बिलाईगढ़। सारंगढ़ थाने में पदस्थ विवेचना अधिकारी प्रधान आरक्षक केशव प्रसाद देवता की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। मामला एक ऐसे पीडि़त से जुड़ा है, जो न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंचा था, लेकिन आरोप है कि विवेचक की ‘अजीबो-गरीब’ विवेचना के चलते खुद शिकायतकर्ता ही कानूनी कार्रवाई का शिकार बन गया। दोनों पक्षों में लिखित समझौता होने और शिकायत वापस लिए जाने के बावजूद, पीडि़त को ही कोर्ट के चक्कर काटने पर मजबूर करने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है।
विवेचक केशव प्रसाद देवता के सामने हुई थी सुलह, फिर इस्तगासा क्यों?
मामला ग्राम बरतुंगा बरगांठा का है, जहां के निवासी कृष्णकुमार महिलाने (35 वर्ष) ने एक विवाद के बाद सारंगढ़ थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। बाद में, गांव के गणमान्य नागरिकों की मध्यस्थता से विपक्षी पक्ष ने अपनी गलती स्वीकार की और दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से सुलह हो गई। पीडि़त कृष्णकुमार ने शिकायत वापस लेने की पूरी प्रक्रिया विवेचना अधिकारी केशव प्रसाद देवता के समक्ष ही पूरी की थी। इसके बावजूद, प्रधान आरक्षक केशव प्रसाद देवता की ओर से मामले की वास्तविक स्थिति (आपसी सुलह और शिकायत वापसी) को वरिष्ठ अधिकारियों या न्यायालय के समक्ष स्पष्ट रूप से रखने के बजाय, पीडि़त के विरुद्ध ही प्रतिबंधात्मक कार्रवाई का इस्तगासा तैयार कर दिया गया। जब शिकायतकर्ता ने खुद अपनी शिकायत वापस ले ली और दोनों पक्षों के बीच विवाद समाप्त हो चुका था, तो प्रधान आरक्षक केशव प्रसाद देवता ने किस आधार और किस मंशा से पीडि़त को ही आरोपी की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया?
पीडि़त पर 10 हजार की प्रतिभूति का फरमान
प्रधान आरक्षक केशव प्रसाद देवता की विवेचना के आधार पर कार्यपालिक दंडाधिकारी सारंगढ़ (जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़) के न्यायालय द्वारा वर्ष 2026 का समन जारी किया गया है। अनावेदक बनाए गए पीडि़त कृष्णकुमार महिलाने के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 126 एवं 135(3) के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। तथा न्यायालय में उपस्थित होने के लिए 10,000 रुपये (दस हजार रुपये) की जमानत पेश करने का फरमान सुनाया गया है।
जनता का केशव प्रसाद देवता से सवाल
जब पीडि़त ने आपके समक्ष ही शिकायत वापस ले ली थी, तो इस्तगासा तैयार करते समय इस अति-महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख फाइल में क्यों नहीं किया गया? गांव में शांति व्यवस्था बनाए रखने और रंजिश खत्म करने के उद्देश्य से शिकायत वापस लेने वाले ग्रामीण को ही कानूनी पचड़े में ढकेलने के पीछे क्या उद्देश्य था? जो व्यक्ति मदद मांगने थाने आता है, उसी को आरोपी बनाकर समन भिजवा देना, क्या विवेचना अधिकारी की लापरवाही या कार्यशैली पर सवाल खड़े नहीं करता?
वरिष्ठ अधिकारियों से जांच की मांग
इस पूरे प्रकरण के बाद पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों और पीडि़त पक्ष ने जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों से मांग की है कि प्रधान आरक्षक केशव प्रसाद देवता की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराई जाए और मामले में वास्तविक तथ्यों को न्यायालय के समक्ष रखकर पीडि़त ग्रामीण को अनावश्यक कानूनी मानसिक प्रताडऩा से राहत दिलाई जाए।



