नारायणपुर। बरसात के मौसम में खेती-किसानी की शुरुआत से पहले जशपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में सदियों से चली आ रही ‘कादो लेटा’ की अनूठी लोक परंपरा मंगलवार को बोडोकछार और रायकेरा पंचायत में पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई गई। खेतों में धान की रोपाई शुरू करने से पहले किसानों ने प्रकृति, जल, धरती और ग्राम देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए सामूहिक पूजा-अर्चना की।
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा पूर्वजों के समय से चली आ रही है। दोनों पंचायतों का एक ही बैगा (ग्राम पुजारी) वर्षों से इस पूजा का विधान संपन्न कराता है। इस बार भी गांव के बैगा गजेंद्र राम ने पूरे वैदिक एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा संपन्न कराई।
सुबह से ही बोडोकछार, रायकेरा और रामसागर गांव की महिलाएं अपने-अपने घरों से पूजा का लोटा लेकर बैलजोरा नदी पहुंचीं। यहां बैगा ने जल, धरती और प्रकृति की पूजा कराई। इसके बाद महिलाएं नदी से पवित्र जल भरकर लगभग दो किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए हनुमान मंदिर रायकेरा और गोंड बस्ती स्थित हनुमान मंदिर पहुंचीं, जहां पीपल वृक्ष का जलाभिषेक कर भगवान हनुमान की पूजा-अर्चना की गई।
पूजा के बाद पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला। महिलाएं और ग्रामीण मांदर, ढोल-नगाड़ों की गूंज पर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए झूम उठे। रंग-बिरंगी वेशभूषा में महिलाओं ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया, जिससे पूरा वातावरण लोक संस्कृति के रंग में रंग गया। इसके बाद दोनों पंचायतों के ग्रामीण सामूहिक रूप से गांव के सरना स्थल पहुंचे। यहां बैगा गजेंद्र राम ने सरना महादेव की विशेष पूजा-अर्चना कर गांव की सुख-समृद्धि, अच्छी वर्षा और भरपूर फसल की कामना की। परंपरा के अनुसार पूजा स्थल पर मुर्गे की बलि भी दी गई, जिसे ग्रामीण अपने पूर्वजों की आस्था और परंपरा का हिस्सा मानते हैं। पूजा के समापन पर सभी श्रद्धालुओं के बीच खीर का प्रसाद वितरित किया गया। ग्रामीणों ने बताया कि कादो लेटा का मुख्य उद्देश्य रोपा खेती की शुरुआत से पहले धरती माता, जल स्रोतों और ग्राम देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना है, ताकि पूरे वर्ष अच्छी वर्षा हो, फसल लहलहाए और गांव में सुख-समृद्धि बनी रहे। मान्यता है कि इस पूजा के बाद ही किसान खेतों में धान की रोपाई शुरू करते हैं।
ग्रामीण संस्कृति की अमूल्य धरोहर है ‘कादो लेटा’
जिले के कई ग्रामीण इलाकों में बरसात के मौसम के साथ मनाया जाने वाला कादो लेटा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। इस अवसर पर गांव के लोग एक साथ जुटकर लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, सामूहिक पूजा और प्रसाद वितरण के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं। आधुनिक कृषि तकनीकों के दौर में भी यह परंपरा ग्रामीण समाज की पहचान बनी हुई है। कादो लेटा नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति, पूर्वजों की परंपराओं, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन के मूल्यों से जोडऩे का कार्य कर रही है। यही वजह है कि हर वर्ष बरसात में रोपाई के आगमन के साथ ग्रामीण पूरे उत्साह और आस्था से इस अनूठी परंपरा का निर्वहन करते हैं।



