एक ऐसा भी था थाना प्रभारी निरीक्षक-अमित शुक्ला
भूला रहे है तुमको की तनिक दुख कम हो,
इस ईश्वर की क्रुरता पर भय कम हो,
कल तक तुम खाकी वाले थे,
व्यवहार वाले थे, रौबदार थे,
अधिकारी तुम कर्मठ ईमानदार थे,
आज तो तुम स्वयं में ही ईश्वर हो,
हिन्दू और ब्राह्मण का बोध थे तुम,
कहीं सरल कहीं अडिग,कहीं-कहीं कठोर थे तुम,
तुमने ही बताया था कि कर्तव्य और व्यवहार को जीते कैसे है,
पर तुम हारे क्यों जिंदगी से ये भी प्रश्न है,
हां लडी लड़ाई तुमने कानूनों की पेचों से,
जंग फिर क्यों हार गए अपने अपनों से,
कुछ कह रहे ये तुम्हारे दुखों का अंत है,
पर तुम्हारे असंख्य चाहने वालों का ये दुख अनंत है,
तुम भी शांत लेटे सोच रहे होगे सबको,
जीवन के हर पल को,
बेटियों-परिवार की चिंता में आंखें बंद है,
शायद शोर आज मातम है,
तुम याद थे,याद हो,और याद रहोगे
सदा सच्चाई की इन गलियों में,
क्यों न आज तुम विलीन हो जाओ पंचतत्वों में,
तुम अमित थे,अमित हो,और अमित रहोगे,
चाहे तुम दुनिया से रुखसत हो,
तुमने सबको आज अनाथ किया है,
सभी के मन को उदास किया है,
तुम तो चले गए इस जहां से मगर,
हम याद करते रहेंगे तुम्हे ताउम्र डगर डगर,
अब कहीं थाने में,कुछ खाने में,खेलने खिलाने में,
के कुछ भी सुलझाने तुम न होगे,
पर हम भुला न पाएंगे तुमको कभी,
ये कमी ताउम्र ही खलती रहेगी
क्योंकि तुम तो बस तुम हो,तुम तो बस तुम हो..
तुझको तेरे बाद जमाना ढूंढ रहा है
शुक्ला सर नहीं अमित-भैया




