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NavinKadam > रायगढ़ > माटी से गढ़ी नई पहचान, मालती कुंभकार बनीं ‘लखपति दीदी’
रायगढ़

माटी से गढ़ी नई पहचान, मालती कुंभकार बनीं ‘लखपति दीदी’

बिहान, माटी कला बोर्ड और हस्तशिल्प योजनाओं से जुडक़र बदली जिंदगी, अब राज्यभर के मेलों में चमक रही कला, परंपरागत चाक से शुरू हुआ सफर अब इलेक्ट्रॉनिक चाक और आधुनिक डिजाइनों तक पहुंचा, शासन की योजनाओं ने दिए अवसर को उड़ान

lochan Gupta
Last updated: May 13, 2026 11:51 pm
By lochan Gupta May 13, 2026
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5 Min Read

रायगढ़,। कहते हैं कि मेहनत और हुनर को सही मंच मिल जाए तो जिंदगी की तस्वीर बदलते देर नहीं लगती। रायगढ़ जिले के वनांचल क्षेत्र तमनार विकासखंड के ग्राम बांसपाली की रहने वाली मालती कुंभकार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिन्होंने मिट्टी की साधारण कला को अपनी पहचान, सम्मान और आजीविका का मजबूत माध्यम बना लिया। आज मालती न केवल अपने गांव और क्षेत्र में बल्कि प्रदेशभर में ‘माटी कला’ की पहचान बन चुकी हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देश पर चल रहे प्रदेशव्यापी ‘सुशासन तिहार’ के दौरान कुंजेमूरा में समाधान शिविर में मालती कुंभकार ने मंच से अपनी सफलता की कहानी साझा की, जिसे सुनकर उपस्थित लोग भावुक भी हुए और प्रेरित भी। मालती कुंभकार ने बताया कि पहले वह परंपरागत चाक के माध्यम से दीया, हांडी और मिट्टी की अन्य घरेलू सामग्री तैयार करती थीं। सीमित संसाधनों और पारंपरिक तरीके के कारण वह बढ़ती मांग को पूरा नहीं कर पाती थीं। आर्थिक स्थिति भी सामान्य थी और बाजार तक पहुंच सीमित थी।


इसी दौरान उन्होंने अपने ‘एकता महिला स्व-सहायता समूह’ को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के बिहान कार्यक्रम से जोड़ा। इसके बाद उनके जीवन में बदलाव की नई शुरुआत हुई। उन्होंने माटी कला बोर्ड और हस्तशिल्प बोर्ड से भी जुडक़र अपनी संस्था का पंजीयन कराया। शासन की योजनाओं से उन्हें प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और आधुनिक संसाधन मिले। मालती बताती हैं कि माटी कला बोर्ड से उन्हें इलेक्ट्रॉनिक चाक उपलब्ध कराया गया, जिससे उनके काम की गुणवत्ता और गति दोनों में बड़ा सुधार आया। आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण मिलने के बाद उनकी कला में नया निखार आया। अब वह केवल पारंपरिक दीये और हांडी ही नहीं, बल्कि मिट्टी से बने आकर्षक कलश, गणेश एवं अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, गुल्लक, सजावटी पॉट, मिट्टी के कुकर, कढ़ाई, पानी की बोतल, कप, प्लेट, जग और विशेष मांग के अनुरूप विभिन्न कलात्मक सामग्री भी तैयार करती हैं। दीपावली, तीज-त्योहार, मड़ई मेला, शादी-विवाह, धार्मिक अनुष्ठान और विभिन्न आयोजनों में उनके हाथों से बनी मिट्टी की सामग्री की भारी मांग रहती है। पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन और आकर्षक स्वरूप देने के कारण उनके उत्पाद लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं। मालती ने बताया कि अपनी आजीविका को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने विभिन्न योजनाओं के माध्यम से 30 हजार रुपए, एक लाख रुपए और 80 हजार रुपए तक का ऋण भी लिया, जिसका उपयोग उन्होंने अपने कार्य विस्तार और संसाधन बढ़ाने में किया। आज उनका कार्य केवल गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यस्तरीय आयोजनों तक पहुंच चुका है।
शासन की पहल पर आयोजित सरस मेला, स्वदेशी मेला, हस्तशिल्प मेला और अन्य उत्सवों में उन्हें भाग लेने का अवसर मिलता है। रायपुर, भिलाई, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा, बिलासपुर, अंबिकापुर, जगदलपुर, कोरिया, कोरबा और रायगढ़ सहित प्रदेश के लगभग सभी जिलों में वह अपनी कला की प्रदर्शनी और विक्रय के लिए जा चुकी हैं। कई आयोजनों में उन्हें सीधे बोर्ड और आयोजन समितियों से आमंत्रण भी प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि इन मेलों में भाग लेने के दौरान आने-जाने, भोजन और ठहरने की पूरी व्यवस्था शासन द्वारा की जाती है, जिससे ग्रामीण कलाकारों को आगे बढऩे का अवसर मिलता है और उनकी कला को नया बाजार भी मिलता है। मालती कहती हैं कि पहले उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि गांव की मिट्टी से जुड़ी कला उन्हें इतनी बड़ी पहचान दिलाएगी। आज वह व्यक्तिगत रूप से और अपने समूह के साथ ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचान बना चुकी हैं। उनके समूह की अन्य महिलाएं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
उन्होंने कहा कि इन योजनाओं से जुडऩे के बाद केवल आय ही नहीं बढ़ी, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा है। अब वे प्रदेश के अलग-अलग जिलों में जाकर नए लोगों से मिलती हैं, नए अनुभव प्राप्त करती हैं और अपनी कला को और बेहतर बनाने का अवसर पाती हैं। मालती की इस सफलता में उनके पति आनंद कुंभकार का भी महत्वपूर्ण योगदान है। वे हर कदम पर उनका सहयोग करते हैं और आजीविका के कार्यों में बराबर सहभागी बने हुए हैं। मालती कुंभकार की कहानी यह साबित करती है कि यदि हुनर को सही दिशा, प्रशिक्षण और शासन की योजनाओं का सहयोग मिले, तो गांव की साधारण महिला भी अपनी मेहनत से नई मिसाल कायम कर सकती है। मिट्टी से शुरू हुआ यह सफर आज आत्मनिर्भरता, सम्मान और महिला सशक्तिकरण की प्रेरक कहानी बन चुका है।

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