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NavinKadam > छत्तीसगढ़ > फिल्म मेकिंग के लिए छत्तीसगढ़ के एस अंशु धुरंधर को यूक्रेन में मिलेगा अंतरराष्ट्रीय सम्मान
छत्तीसगढ़

फिल्म मेकिंग के लिए छत्तीसगढ़ के एस अंशु धुरंधर को यूक्रेन में मिलेगा अंतरराष्ट्रीय सम्मान

lochan Gupta
Last updated: May 12, 2026 11:58 pm
By lochan Gupta May 12, 2026
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7 Min Read

खरोरा। छत्तीसगढ़ की लोकगाथाओं, भूले-बिसरे जननायकों और सामाजिक इतिहास को कैमरे के माध्यम से जीवंत करने वाले युवा फिल्म निर्देशक एस अंशु धुरंधर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। उन्हें यूक्रेन में आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित आई.सी.जे. अवॉर्ड 2026 के लिए चयनित किया गया है। यह सम्मान इंटरनेशन कल्चर जर्नल के अंतर्गत आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदान किया जाएगा। फिल्म और कला जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यह उपलब्धि केवल एक निर्देशक की व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, इतिहास और वहां के जननायकों की कहानियों के वैश्विक पहचान तक पहुंचने का महत्वपूर्ण अवसर है।
फेस्टिवल आयोजकों के अनुसार, इस वर्ष विश्वभर से लगभग 2,500 से अधिक फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री परियोजनाओं की समीक्षा की गई। इनमें एस अंशु धुरंधर द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री ‘छत्तीसगढ़ के भीम चिंताराम’ ने अपनी शोधपूर्ण प्रस्तुति, भावनात्मक गहराई और तकनीकी गुणवत्ता के कारण निर्णायक मंडल का विशेष ध्यान आकर्षित किया। जूरी सदस्यों का कहना है कि यह फिल्म केवल किसी व्यक्ति विशेष की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, श्रम, समाज सेवा और मानवीय मूल्यों की ऐसी प्रस्तुति है जो सीमाओं और भाषाओं से परे जाकर दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है। निर्णायक मंडल ने विशेष रूप से इस बात की सराहना की कि फिल्म में दाऊ चिंताराम के जीवन को अत्यंत संतुलित और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म उन्हें केवल असाधारण शारीरिक क्षमता वाले व्यक्ति के रूप में नहीं दिखाती, बल्कि समाज सेवा, शिक्षा, धार्मिक संरक्षण और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े ऐसे जननायक के रूप में सामने लाती है, जिन्होंने अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित किया। जूरी के अनुसार, फिल्म में जिस गंभीरता और आत्मीयता के साथ उनके जीवन को प्रस्तुत किया गया है, वह इसे सामान्य डॉक्यूमेंट्री फिल्मों से अलग पहचान प्रदान करता है।
डॉक्यूमेंट्री को 13 अध्यायों में विभाजित किया गया है, जिनमें चिंताराम के जीवन के विभिन्न पहलुओं को क्रमबद्ध ढंग से दिखाया गया है। फिल्म उनके बचपन, संघर्षपूर्ण जीवन, सामाजिक नेतृत्व, मजदूरों और गरीबों के प्रति समर्पण, शिक्षा के क्षेत्र में योगदान, धार्मिक कार्यों तथा तुरतुरिया मंदिर के जीर्णोद्धार जैसे विषयों को विस्तार से प्रस्तुत करती है। फिल्म यह भी दर्शाती है कि किस प्रकार ग्रामीण परिवेश में जन्मा एक व्यक्ति अपने कर्म और सेवा के बल पर जनमानस के बीच ‘छत्तीसगढ़ के भीम’ के रूप में स्थापित हुआ। फेस्टिवल जूरी ने फिल्म की रिसर्च और स्टोरीटेलिंग को इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक बताया है। आयोजकों के अनुसार, बड़ी संख्या में लिए गए साक्षात्कारों को जिस गंभीरता और संतुलन के साथ संपादित कर प्रस्तुत किया गया है, वह निर्देशक एस अंशु धुरंधर की परिपक्व सिनेमाई समझ को दर्शाता है। फिल्म में ग्रामीणों, मजदूरों, समाज के वरिष्ठ लोगों, शोधकर्ताओं तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर से जुड़े व्यक्तियों के विचार शामिल किए गए हैं। यही विविधता इस प्रस्तुति को केवल जीवनी आधारित फिल्म नहीं रहने देती, बल्कि इसे सामाजिक और ऐतिहासिक दस्तावेज का स्वरूप प्रदान करती है।
फिल्म के तकनीकी पक्ष को भी निर्णायकों ने अत्यंत प्रभावशाली माना है। दृश्य संयोजन, नैरेशन, पृष्ठभूमि संगीत, ध्वनि डिजाइन और भावनात्मक प्रस्तुति को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बताया गया। विशेष रूप से फिल्म के अंतिम हिस्से में कवि एवं गायक मीर अली मीर द्वारा प्रस्तुत गीत की काफी सराहना की गई। जूरी के अनुसार, यह गीत फिल्म की भावनात्मक आत्मा बनकर उभरता है और दर्शकों को अंत तक कहानी से गहराई से जोड़े रखता है। इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण वज्र विजऩ स्टूडियो के बैनर तले किया गया है। निर्देशन, रिसर्च और नैरेशन का कार्य स्वयं एस अंशु धुरंधर ने किया, कैमरा संचालन प्रमोद गिलहरे, मुकुल वर्मा ने फिटनेस इंस्ट्रक्टर एवं संपादन कार्य अरविंद वर्मा ने किया है।
फेस्टिवल टीम के अनुसार, फिल्म का प्रदर्शन 14 मई 2026 को उद्घाटन समारोह में किया जाएगा। इसके साथ ही फिल्म को रेड कार्पेट प्रस्तुति के लिए भी चुना गया है। यह आयोजन यूक्रेन के ऐतिहासिक स्थल उज्होरोड काशल में आयोजित होगा, जिसे वहां की प्रमुख सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है। आयोजकों ने यह भी जानकारी दी है कि फिल्म को ‘सिनेमा इन स्कूल’ कार्यक्रम के अंतर्गत यूक्रेन के लगभग 100 विद्यालयों में प्रदर्शित किया जाएगा। इनमें संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों के स्कूल भी शामिल हैं, जहां विद्यार्थियों को सिनेमा के माध्यम से प्रेरित करने और सामाजिक विषयों से जोडऩे का प्रयास किया जाएगा। आयोजकों का मानना है कि यह फिल्म केवल अतीत की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि नई पीढ़ी को समाज सेवा, श्रम, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के महत्व को समझने की प्रेरणा भी देती है।
एस अंशु धुरंधर की यह उपलब्धि एक दिन में हासिल हुई सफलता नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे वर्षों के संघर्ष, निरंतर सीखने और रचनात्मक समर्पण का परिणाम बताया जा रहा है। कम आयु से ही लेखन और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े धुरंधर ने लगभग 9 वर्ष की आयु में लेखन की शुरुआत की थी, जबकि 16 वर्ष की आयु में उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश किया। शुरुआती दौर में उन्होंने अभिनय, कैमरा, संपादन और फिल्म निर्माण की तकनीकों को सीखने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। अब तक उनके कार्यों को भारत के 10 राज्यों सहित अमेरिका, यूक्रेन, जमैका, श्रीलंका और नेपाल में 25 से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। फिल्म और कला जगत से जुड़े लोगों के अनुसार, एस अंशु धुरंधर की यह उपलब्धि इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय इतिहास और लोककथाओं पर आधारित सिनेमा भी वैश्विक मंच पर गहरी पहचान बना सकता है। उनका मानना है कि ऐसी फिल्में केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि समाज की स्मृतियों, संघर्षों और प्रेरणाओं को आने वाली पीढिय़ों तक जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य भी करती हैं।

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