रायगढ़। शहर के इंदिरा नगर क्षेत्र में प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ की अमृत गंगा में रविवार को श्रद्धा और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। स्थानीय निवासी श्रीमती सावित्री एवं मधुसूदन सिंह ठाकुर के परिवार द्वारा आयोजित इस सात दिवसीय ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन कृष्ण जन्मोत्सव का प्रसंग सुनाया गया। जैसे ही भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य हुआ, पूरा कथा पंडाल ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के उद्घोष से गूँज उठा।
श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की बेला में आचार्य चंदन कृष्ण जी महाराज ने उस अलौकिक क्षण का वर्णन किया, जब द्वापर युग में अधर्म का नाश करने के लिए स्वयं नारायण ने अवतार लिया। भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और आधी रात के उस सन्नाटे में, मथुरा के कारागार की बेडियाँ अपने आप खुल गईं।चंदन कृष्ण जी महाराज ने बताया कि भगवान का जन्म किसी साधारण बालक की तरह नहीं, बल्कि चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हुआ था। देवकी और वसुदेव ने प्रभु की स्तुति की, जिसके बाद प्रभु ने एक नन्हे बालक का रूप लिया।यमुना पार और गोकुल गमन कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हुए कथा वाचक चंदन कृष्ण ने कहा कि ‘संकट के समय ईश्वर स्वयं मार्ग बनाते हैं’। वसुदेव जी ने जैसे ही कान्हा को टोकरी में रखकर सिर पर उठाया, कारागार के पहरेदार निद्रा में लीन हो गए। उफनती यमुना ने प्रभु के चरण स्पर्श किए और शेषनाग ने घनघोर वर्षा में भगवान पर छत्र छाया की। गोकुल पहुँचकर वसुदेव जी ने बालक को यशोदा मैया की गोद में रखा और वहां जन्मी ‘योगमाया’ को लेकर वापस मथुरा आ गए। नंद के आनंद भयो अगले दिन जब गोकुल में पता चला कि नंद बाबा के घर लाला हुआ है, तो पूरे ब्रज में आनंद की लहर दौड़ गई। आचार्य जी ने इस प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नंदोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन का आनंद है। नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की। हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की। इन जयकारों के बीच श्रद्धालुओं ने झूमकर नृत्य किया और बधाइयां बांटीं। बाल लीलाओं का आध्यात्मिक रहस्य महाराज जी ने कृष्ण की विभिन्न लीलाओं के पीछे छिपे गूढ़ अर्थों को समझाया पूतना वध यह केवल एक राक्षसी का अंत नहीं था, बल्कि अविद्या (अज्ञानता) का अंत था। भगवान ने पूतना को भी माता की गति प्रदान की।
पंडित चंदन कृष्ण महाराज ने मार्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान को भूख माखन की नहीं, बल्कि भक्तों के प्रेम की थी। भक्तों का हृदय ‘मक्खन’ की तरह कोमल होना चाहिए, तभी ईश्वर उसे स्वीकार करते हैं।मिट्टी खाने के बहाने जब यशोदा मैया ने कान्हा का मुख खुलवाया, तो उन्हें चराचर ब्रह्मांड, सूर्य, चंद्रमा और स्वयं के दर्शन हुए। यह इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर हमारे भीतर ही व्याप्त है।प्रकृति प्रेम का संदेश कथा में गोवर्धन पर्वत की पूजा का प्रसंग सुनाते हुएपंडित चंदन कृष्ण महाराज ने बताया गया कि भगवान ने इंद्र का मान-मर्दन कर प्रकृति की पूजा का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि हमें जल, जंगल, जमीन और गायों की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि यही हमारी वास्तविक संपदा है।
इंदिरा नगर के इस भव्य आयोजन में सावित्री एवं मधुसूदन सिंह ठाकुर के परिवार सहित समस्त क्षेत्रवासी भक्ति के रस में डूबे नजर आए। आचार्य चंदन कृष्ण जी की ओजस्वी वाणी ने श्रोताओं को साक्षात द्वापर युग की अनुभूतियाँ करा दीं। कथा के अंत में भव्य आरती और प्रसाद का वितरण किया गया।
‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयकारों से गुंजायमान हुआ इंदिरा नगर
रायगढ़ में श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन हर्षोल्लास के साथ मनाया गया कृष्ण जन्मोत्सव



