नारायणपुर। प्राकृतिक वैभव और जैव विविधता के लिए मशहूर बादलखोल अभ्यारण्य इन दिनों आग की लपटों में सिसक रहा है। जंगल के भीतर कई स्थानों पर लगातार आग सुलग रही है, लेकिन हालात ऐसे हैं कि मानो इसे बुझाने वाला कोई जिम्मेदार बचा ही नहीं है। जानकारी के मुताबिक, कुछ असामाजिक तत्व महुआ बीनने, शहद निकालने और शिकार के इरादे से जानबूझकर जंगल में आग लगा रहे हैं। यह आग धीरे-धीरे फैलकर विकराल रूप ले रही है और अपने रास्ते में आने वाले छोटे-छोटे पौधों, घास, औषधीय वनस्पतियों और मासूम वन्यजीवों को लीलती जा रही है। कई जीव-जंतु आग की चपेट में आकर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं, लेकिन उनकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं।
ताजा मामला बुटूंगा- साहीडाँड़ मार्ग पर कुटमा नाला और तालाब के बीच दिनदहाड़े आग भडक़ उठी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर वन विभाग के कर्मचारी समय पर मौके पर पहुंचते तो आग को तुरंत काबू में किया जा सकता था, लेकिन जिम्मेदारों की लापरवाही के चलते आग फैलती चली जा रही है और आग बड़े इलाके को अपनी चपेट में लेते जा रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन कर्मचारियों के जिम्मे इस अभ्यारण्य की सुरक्षा है, वही अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़े हुए हैं। संबंधित सर्किल के नाकेदार, दरोगा और फायर वॉचर की लापरवाही अब खुलकर सामने आ रही है। आरोप है कि ये न तो दिन में जंगल में गश्त कर रहे हैं और न ही आग लगने की सूचना पर तत्काल मौके पर पहुंच रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि दिन में लगने वाली आग को भी समय रहते बुझाया नहीं जा पा रहा, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रात के समय जंगल की सुरक्षा किस भरोसे हो रही होगी।
वन विभाग के अधिकारियों, खासकर रेंजर स्तर तक, इस पूरे मामले में उदासीनता साफ नजर आ रही है। लगातार आग की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन न तो निगरानी बढ़ाई जा रही है और न ही दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई दिखाई दे रही है। इससे साफ है कि लापरवाही अब सिस्टम का हिस्सा बन चुकी है। इस आग से सिर्फ पेड़-पौधे ही नहीं जल रहे, बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। छोटे जीव-जंतु, पक्षियों के घोंसले, दुर्लभ वनस्पतियां सब कुछ राख में तब्दील हो रहा है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में इसका असर पूरे क्षेत्र के पर्यावरण संतुलन पर गंभीर रूप से पड़ेगा। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि जंगल में नियमित गश्त शुरू की जाए, आग लगाने वाले असामाजिक तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए और लापरवाह कर्मचारियों को तुरंत हटाया जाए।
फिलहाल, बादलखोल अभ्यारण्य में उठती आग की लपटें सिर्फ जंगल को नहीं जला रहीं, बल्कि जिम्मेदार तंत्र की नाकामी को भी बेनकाब कर रही हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब जागता है, या फिर यूं ही जंगल जलता रहेगा और जिम्मेदार लोग आंखें मूंदे बैठे रहेंगे। इस सम्बंध में सर्किल दरोगा से मोबाइल पर दो बार संपर्क करने का प्रयास किया गया पर उनके द्वारा फोन नही रिसीव किया गया। अधीक्षक ने मीटिंग का हवाला देकर कुछ देरी में बात करने की बात कही गई।
बादलखोल अभ्यारण्य में धधक रही आग, बेबस वन्यजीव और सोता हुआ वन विभाग
सिस्टम की उदासीनता की भेंट चढ़ा बादलखोल



