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NavinKadam > रायपुर > छग को जल्द मिलेगा स्थायी डीजीपी, प्रभारी अरुणदेव गौतम रेस में सबसे आगे
रायपुर

छग को जल्द मिलेगा स्थायी डीजीपी, प्रभारी अरुणदेव गौतम रेस में सबसे आगे

lochan Gupta
Last updated: April 6, 2026 11:54 pm
By lochan Gupta April 6, 2026
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6 Min Read

रायपुर। छत्तीसगढ़ में जल्द ही पूर्णकालिक पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति हो सकती है। रेस में प्रभारी डीजीपी/आईपीएस अरुणदेव गौतम और आईपीएस हिमांशु गुप्ता के नाम शामिल है। हालांकि, अरुण देव गौतम का पलड़ा भारी है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के नोटिस की समय-सीमा खत्म हो चुकी है। दरअसल, यूपीएससी ने राज्य सरकार से पूछा था कि अब तक पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति क्यों नहीं की गई। ऐसे में सरकार अब जल्द फैसला ले सकती है।
यूपीएससी ने 3 जुलाई 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब मांगा था, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि किसी भी राज्य में ‘प्रभारी’ डीजीपी की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद राज्य में अब तक स्थायी नियुक्ति नहीं हो सकी थी। गौरतलब है कि 13 मई 2025 को यूपीएससी ने 2 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों अरुण देव गौतम (1992 बैच) और हिमांशु गुप्ता (1994 बैच) का पैनल राज्य सरकार को भेजा था। सामान्यत: 3 नामों का पैनल भेजा जाता है, लेकिन इस बार विकल्प सीमित होने के कारण 2 ही नाम शामिल किए गए।
छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा के 4 फरवरी 2025 को रिटायर होने के बाद सरकार ने अरुण देव गौतम को प्रभारी डीजीपी बनाया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार’ मामले में स्पष्ट निर्देश हैं कि ष्ठत्रक्क की नियुक्ति नियमित और तय प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। 5 फरवरी 2026 को ‘टी. धंगोपल राव बनाम यूपीएससी’ मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा था कि, नियुक्ति में देरी होने पर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
अरुण देव गौतम मूलत: उत्तरप्रदेश के कानपुर के रहने वाले हैं। एमए, एमफिल की डिग्री लेने के बाद यूपीएससी क्रैक कर आईपीएस बने। उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक, भारतीय पुलिस पदक और संयुक्त राष्ट्र पुलिस पदक भी मिल चुका है। उनका जन्म 2 जुलाई 1967 को कानपुर के पास स्थित उनके गांव अभयपुर में हुआ है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा अपने गांव के ही सरकारी स्कूल से की। फिर दसवीं और बारहवीं उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज इलाहाबाद से पूरी की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आर्ट लेकर बीए किया। राजनीति शास्त्र में एमए किया। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय कानून में एमफिल की डिग्री हासिल की। अरुण देव गौतम यूपीएससी पास कर 1992 बैच के आईपीएस बने। 12 अक्टूबर 1992 को उन्होंने आईपीएस की सर्विस जॉइन की। उन्हें पहले मध्यप्रदेश कैडर एलॉट हुआ था। प्रशिक्षु आईपीएस के तौर पर उनकी जबलपुर में पोस्टिंग हुई। फिर वे बिलासपुर जिले में सीएसपी बने।
बिलासपुर के बाद एसडीओपी कवर्धा बने। कवर्धा के बाद एडिशनल एसपी भोपाल बने। मध्य प्रदेश पुलिस की 23वीं बटालियन के कमांडेंट भी रहे। एसपी के रूप में पहला जिला उन्हें भोपाल का मिला। साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने पर अरुण देव गौतम ने छत्तीसगढ़ कैडर चुन लिया। छत्तीसगढ़ में वे कोरिया, रायगढ़, जशपुर,राजनंदगांव, सरगुजा और बिलासपुर जिले के एसपी रहे। डीआईजी बनने के बाद वे पुलिस हेडक्वाटर, सीआईडी, वित्त और योजना, प्रशासन और मुख्यमंत्री सुरक्षा के महत्वपूर्ण विभागों में पदस्थ रहे। चुनौती पूर्ण जिलों में अरुण देव गौतम को भेजा जाता था। साल 2009 में राजनांदगांव में नक्सली हमले में 29 पुलिसकर्मियों और पुलिस अधीक्षक के शहीद होने के बाद अरुण देव गौतम को वहां का एसपी बनकर भेजा गया।
आईजी के पद पर प्रमोशन होने के बाद छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स के प्रभार में रहे। फिर बिलासपुर रेंज के आईजी बने। अरुण देव बिलासपुर जिले के एसपी भी रह चुके थे। झीरम नक्सली हमले में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौत के बाद अरुण देव गौतम को बस्तर आईजी बना कर भेजा गया। 25 मई 2013 को झीरम कांड हुआ था। इसके कुछ ही माह बाद नवंबर-दिसंबर को विधानसभा चुनाव हुए। तब सफलतापूर्वक चुनाव करवाने में अरुण देव गौतम की भूमिका रही और वोटिंग प्रतिशत में भी काफी इजाफा हुआ।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का 2006 का फैसला राज्य डीजीपी नियुक्तियों के लिए मार्गदर्शक ढांचे के रूप में काम करना जारी रखता है। न्यायालय ने आदेश दिया कि राज्य सरकारें संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) सूचीबद्ध 3 सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में से अपने ष्ठत्रक्क का चयन करें। चयनित अधिकारी को अपनी सेवानिवृत्ति तिथि की परवाह किए बिना कम से कम दो साल का कार्यकाल पूरा करना होगा। डीजीपी बनने के लिए 30 साल की सेवा जरूरी है। इससे पहले स्पेशल केस में भारत सरकार डीजीपी बनाने की अनुमति दे सकती है। छोटे राज्यों में आईपीएस का कैडर छोटा होता है, इसको देखते हुए भारत सरकार ने डीजीपी के लिए 30 साल की सर्विस की जगह 25 साल कर दिया है। मगर बड़े राज्यों के लिए नहीं।

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