रायगढ़। आज चौत्र शुक्ल द्वितीया का वह पावन पल था, जब रायगढ़ की हर गली, हर सडक़ और हर कोना श्जय झूलेलाल… जय झूलेलाल… आयो लाल… झूलेलालश् के जयघोष से गूंज उठा। सिंधी समाज की भव्य शोभायात्रा ने पूरे शहर को भक्ति की लहरों में डुबो दिया। साईं झूलेलाल और संत कंवर राम की दिव्य झांकियां देखते ही आंखें नम हो गईं, हृदय भावुकता से भर उठे और ऐसा लगा मानो सदियों पुरानी आस्था आज फिर से सजीव होकर सडक़ों पर नाच रही हो। हवा में भजन-कीर्तन की धुनें, ड्रम-नगाड़ों की थाप और पानी के कलशों से अर्घ्य देते श्रद्धालुओं की भीडक़ृयह दृश्य सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि आस्था की जीत, इतिहास की गूंज और भावनाओं का अनुपम सागर था।
यह महोत्सव महज एक नववर्ष का उत्सव नहीं, बल्कि सिंधी समाज की सदियों पुरानी पीड़ा, संघर्ष की अमर गाथा और अटूट सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। चेट्रीचंड्र (चेटी चंड) सिंधी नववर्ष का पहला दिन है, जो चौत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाया जाता है। सिंधी भाषा में श्चेट्रीश् चौत्र से और चंड्रश् चंद्रमा से जुड़ा हैकृयानी चौत्र का चंद्र दर्शन। लेकिन इसकी गहराई 1075-1076 वर्ष पुरानी (लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी) है।
करीब 1075-1076 साल पहले सिंध प्रांत के ठट्टा नगर में मिरखशाह नामक क्रूर शासक ने हिंदुओं पर जुल्म की सारी हदें पार कर दी थीं। जबरन धर्मांतरण, अत्याचार और उत्पीडऩ की चिंगारियां हर तरफ फैली हुई थीं। परेशान सिंधी हिंदू सिंधु नदी के किनारे इक_ा हुए। 40 दिनों तक भूखे-प्यासे, आंसुओं से स्नान करते हुए उन्होंने वरुण देव की आराधना की। उनकी करुण पुकार ने स्वर्ग को भी हिला दिया। वरुण देव ने मछली के रूप में अवतार लिया और फिर दिव्य बालक झूलेलाल (उदेरोलाल) के रूप में जन्म लिया। झूलेलाल ने न सिर्फ सिंधी समाज को मिरखशाह के अत्याचार से मुक्ति दिलाई, बल्कि शांति, सद्भाव, एकता और प्रेम का संदेश दिया। वे जल के देवता वरुण के अवतार माने जाते हैंकृसिंधु नदी की तरह जीवनदायिनी, अथाह और संरक्षक। यही वजह है कि आज भी हर सिंधी भाई-बहन झूलेलाल को अपना इष्टदेव और संरक्षक संत मानता है।
1947 के विभाजन के बाद सिंध से विस्थापित होकर भी यह समाज अपनी जड़ों को कभी नहीं भूला। आज भी चेट्रीचंड्र पर वे उसी पुरानी पीड़ा को याद करते हुए अपनी आस्था को और मजबूत करते हैं। संत कंवर राम जैसे महान संतों की शिक्षाएंकृसद्भाव, सेवा और प्रेमकृआज भी इस समाज की रीढ़ हैं।
आज रायगढ़ में यह सब कुछ जीवंत हो उठा। शोभायात्रा सिंधी कॉलोनी पक्की खोली स्थित झूलेलाल मंदिर से शुरू हुई। सजी हुई झांकियां, फूलों से सजा पालना, रंग-बिरंगे झंडे, महिलाओं के गले में मालाएं और बच्चों के चेहरे पर उत्साहकृसब कुछ देखकर हृदय भर आया। यात्रा चक्रधर नगर चौक, सिग्नल चौक होते हुए कच्ची खोली से गुजरी और न्यू मारिंड्राइव पहुंचकर साईं झूलेलाल और बहराणा साहिब की भव्य आरती हुई। अंत में बहराणा साहिब का विसर्जन कर यात्रा का समापन किया गया। हजारों सिंधी भाई-बहनों की भारी भीड़ ने पूरे रास्ते को भक्ति से सराबोर कर दिया।
महिलाएं आयोलाल… झूलेलाल गाते हुए नाच रही थीं, बच्चे उत्साह से जयकारे लगा रहे थे, बुजुर्ग आंसू पोछते हुए कह रहे थे, ष्हम सिंध से आए, लेकिन झूलेलाल ने हमें कभी अकेला नहीं छोड़ा। आज भी उनकी कृपा से हम एक हैं।ष् युवा पीढ़ी ढोल की थाप पर झूम रही थी। कई श्रद्धालु पानी के कलश लेकर झूलेलाल को अर्घ्य दे रहे थेकृक्योंकि वे जल के स्वामी हैं, जीवन के स्रोत हैं। पूरा रायगढ़ इस उत्सव में शामिल हो गया था। गैर-सिंधी भाई-बहन भी झांकियों को देखने के लिए सडक़ों पर खड़े थे और भावुक होकर तालियां बजा रहे थे।
यह शोभायात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थीकृयह भावनाओं का अनंत सागर थी, इतिहास की अमर गाथा थी और आने वाली पीढिय़ों को अपनी जड़ों से जोडऩे का संदेश थी। चेट्रीचंड्र महोत्सव सिंधी समाज को याद दिलाता है कि चाहे कितना भी विस्थापन हो, कितनी भी पीड़ा हो, आस्था और संस्कृति कभी नहीं मिटती।
रायगढ़ की सडक़ों पर आज जो दृश्य उभरा, वह सिर्फ एक यात्रा नहींकृवह आस्था की जीत थी, संघर्ष की याद थी और भावुकता का वह अनमोल पल था जो कभी भुलाया नहीं जा सकता
रायगढ़ में छाया भक्ति का सैलाब!, जय झूलेलाल के उद्घोष से सिंधी भाई बहनो नें एकता दिखाई चेट्रीचंड्र महोत्सव में



