रायगढ़। लोकतंत्र में जब संसदीय निगरानी और संवैधानिक मर्यादाएं सक्रिय होती हैं, तो अन्याय को घुटने टेकने ही पड़ते हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक घटनाक्रम भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) में देखने को मिला, जहाँ प्रशासन को अपने ‘समयपूर्व सेवानिवृत्ति’ के आदेशों को वापस लेकर 23 कर्मचारियों को ससम्मान सेवा में बहाल करना पड़ा। यह मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश के पलटे जाने का नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में मनमानी के खिलाफ संविधान की जीत का प्रतीक है।
घटना की शुरुआत 22 जनवरी 2026 को जारी उन आदेशों से हुई, जिसने 31 वर्षों से अधिक की बेदाग सेवा दे रहे भेल भोपाल के अपर महाप्रबंधक श्री एम. के. भगत और विभिन्न यूनिटों के अन्य अधिकारियों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। जब प्रशासन के दरवाजे बंद दिखे, तो भगत की पत्नी श्रीमती सुनीता भगत ने न्याय की गुहार लगाई। उनकी यह पुकार अनसुनी नहीं रही। राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह और अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण पर संसदीय समिति के अध्यक्ष व सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल और प्रभावी हस्तक्षेप किया।
मामला केवल सांसदों के हस्तक्षेप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुँचा। केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एच. डी. कुमारस्वामी ने व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित किया कि इस प्रकरण की समीक्षा पूरी निष्पक्षता, नीतिगत अनुपालन और संवैधानिक औचित्य के साथ की जाए। इस लड़ाई में सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब संविधान के अनुच्छेद 338्र के तहत स्थापित ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग’ ने मामले का संज्ञान लिया। आयोग द्वारा भेल प्रशासन से जवाब तलब करने और तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगने की त्वरित कार्यवाही ने यह सुनिश्चित कर दिया कि अनुसूचित जनजाति के अधिकारियों के लिए बने सुरक्षा कवच को प्रशासनिक मनमानी से भेदा नहीं जा सकता।
संसदीय नेतृत्व, मंत्रालय की सतर्कता और आयोग की सख्ती का परिणाम सुखद रहा। भेल प्रबंधन ने न केवल श्री एम. के. भगत बल्कि उनके साथ प्रभावित हुए 22 अन्य कर्मचारियों के समयपूर्व सेवानिवृत्ति आदेशों को पूर्ण रूप से वापस ले लिया। प्रशासन ने पुरानी तारीख से ही इन कार्यवाहियों को शून्य घोषित कर दिया, जिससे सभी कर्मचारियों की सेवा निरंतरता बहाल हो गई। श्री भगत के परिवार ने इसे केवल रोजगार की वापसी नहीं, बल्कि ‘न्याय और गरिमा’ की वापसी बताया है। यह घटनाक्रम सिद्ध करता है कि सांसद, संसदीय समितियां और संवैधानिक आयोग यदि सजग रहें, तो वे किसी भी कर्मचारी के आत्म-सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए एक अभेद्य दीवार बन सकते हैं।
संसदीय निगरानी और संवैधानिक कवच की जीत
भेल में 23 कर्मचारियों को मिला न्याय, समयपूर्व सेवानिवृत्ति के आदेश वापस



