रायगढ़। वास्तव में रायगढ़ की भूमि बड़ी पुण्यवती है। यहां आरंभ से ही संतों का वास रहा है। रायगढ़ की वसुधा के भाग्य जगे और सन् 1928 में यहां पधारे संत नरहरि दास जी, इनका जन्म महाराष्ट्र के नासिक के पास किसी गांव में हुआ था। ये अपने माता पिता की तीसरी संतान थे। इनसे पूर्व हुई दो संतान का निधन हो चुका था। दो संतान के निधन से इनकी माता अत्यंत दुखी थी वे अत्यंत शोकातुर हुई और संकल्प लिया कि यदि उनकी अगली संतान को ईश्वर जीवन दान दे तो वे उन्हें साधु बना देंगी। ईश्वर की कृपा हुई और तीसरी संतान के रूप में जन्म लिया एक दिव्य संत प्रतिभा ने। जब ये 13 या 14 वर्ष के रहे होंगे तभी माता ने शिष्यत्व दिला कर वहां छोड़ दिया। स्वामी जी आश्रम में रहते हुए आने वाले सभी संतों की मनोयोग से सेवा करते , आश्रम में ये भोजन आदि बनाने की भी सेवा करते तथा और भी जो कुछ कार्य होता उसे बड़े प्रेम से किया करते। संतो का उपदेश ,वेद उपनिषदों का अध्ययन ,प्रवचन आदि भी श्रवण करते थे। बाल ह्दय निष्कपट, निश्चल, कोरा कागज था। बहुत शीघ्र संतों के वचन इनके ह्दय पटल पर अंकित हो गए और तब आप के मन में भाव उठा कि जब सन्यास ही धारण करना है तो कुछ आगे की यात्रा करनी चाहिए। इसी बीच पिताजी का स्वर्गवास हो चुका था। ये जिस आश्रम में रहते थे। वहां के प्रमुख महन्त से विदा ली और माता जी को साथ लेकर वहां से रवाना हो गए। कला के तो ये पुजारी थे ही, साथ ही इनकी बुद्धि भी बड़ी ही कुशल और उत्तम थी। वेद-वेदांत उपनिषदों और सनातन परंपरा के महान ग्रंथों का गहरा अध्ययन था। विद्वत संत में विद्या के रूप में साक्षात् सरस्वती ही इनके कंठ पर विराजमान थी। हाथों में भी बड़ी कुशल कारीगरी थी। ये अपने हाथों से भगवान के नयनाभिराम मूर्तियां, मुकुट, आभूषण, तथा वस्त्र आदि बनाया करते तथा मंदिर में विराजमान ठाकुर जी की मूर्ति का श्रृंगार किया करते। आश्रम से विदा होकर इन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की। जगन्नाथ धाम में छ वर्ष पर्यन्त रहकर विद्या अध्ययन करते हुए उनमें वैदिक ज्ञान की प्रतिभा ने जन्म लिया और वे एक विशेष व्यक्तित्व के स्वामी हुए। अब प्रारब्ध ने इन्हें वहां से लौटने की प्रेरणा दी। इन्हें पता नहीं कि कहां जाना है? सफर करते हुए रायगढ़ स्टेशन पर गाड़ी रूकी यहां की धरती ने उन्हें पुकारा और ये यहीं उतर गए। अनजान जगह पर कहां जाए? यहां की धरती पर इनका अन्न, जल पूरा हुआ था अत: ये नदी के किनारे एक कुटिया में माता जी के साथ रहने लगे। परंतु कहते हैं जब सूर्योदय होता है तो प्रकाश के लिये कोई प्रयास नहीं करना पड़ता वह तो स्वत: व्याप्त होता है। धीरे-धीरे पहचान बढऩे लगी और रायगढ़ के राजा तक भी इनकी बात पहुंची। पंडित श्री जसराम शर्मा और परमानंद शर्मा से इनकी मुलाकात हुई। प्रथम तो ये राजा के मंदिर में पुजारी बनकर पूजा किया करते फिर बाद में सिटी कोतवाली के पास प्राचीन श्री दीनेश्वर महादेव मंदिर में पूजा अर्चना करने लगे। स्वामी नरहरिदास बाबाजी ने इस शिवालय को बड़ा रूप देकर यहां पर शिव जी की पंचानन मूर्ति, शिव परिवार और इनके ही सम्मुख रुद्र प्रसन्नचित्त हनुमानजी की बाल मूर्ति अपने हाथों से निर्मित कर स्थापित की। किलकित मुद्रा में दक्षिणगामी बाल हनुमान की ये मूर्ति अविभाजित मध्यप्रदेश में पहली मूर्ति थी। संत स्वामी नरहरिदासजी इसी श्री दीनेश्वर महादेव मंदिर में आश्रम बना कर अपनी माताजी काशी देवी जी के साथ रहते थे। माताजी भी वेद वेदांग की भक्ति पूर्ण परंपरा में अनुशासित और समर्पित रहीं। माताजी और स्वामी जी दोनों ही शिवालय में आने वाली महिलाओं,पुरुषों व बच्चों को धार्मिक सनातन परंपरा, वेद-उपनिषद, गीता भागवत आदि ग्रंथों की नैतिक मूल्यों की शिक्षा बड़ी सादगी से और प्रचार से दूर रहकर दिया करते थे। स्वामी जी सभी से कुछ ऐसी बातें किया करते, जिनका प्रभाव सब के ऊपर बहुत होने लगा और धीरे धीरे वे महिलाएं, भक्त बनकर उनके पास बैठ कर सत्संग करने लगी। राम नाम के ये विशेष प्रेमी थे। राम के अनन्य उपासक होने से हर समय सीताराम सीताराम जपा करते तथा आने वालों को भी सीताराम कह के संबोधन किया करते इसी कारण इनका नाम ही सीताराम महाराज प्रचलित हुआ । शहर के प्रतिष्ठित घरानों की महिलाएं प्रतिदिन सत्संग तथा विद्या प्राप्ति के लिये आने लगी आज से करीब 80 साल पूर्व की निरक्षर महिला या केवल पहली या दूसरी कक्षा तक ही पढ़ी महिलाओं को इन्होंने अपनी बुध्दि की युक्ति से पहले पढऩा सिखाया। बाद में यह बढ़ते हुए, गीता अध्ययन, विचार सागर ,वृत्ति प्रभाकर , ब्रह्मसूत्र, वेद उपनिषद आदि वेदांत ग्रंथ का ज्ञान कराने में प्रवृत्त हुये और उन्हें पढऩे-पढ़ाने में पारंगत बना दिया। केवल महिला ही नहीं , नियमित आने वाले पुरुषों, बच्चों के पीछे भी इन्होंने बहुत प्रयास किया तथा उन्हें अक्षर ज्ञान कराया। गीता के श्लोक स्मरण करवाए। वेदांत विषयों की अपने हाथ से चित्रावली बना कर उन्हें समझाया। इसका परिणाम ये निकला कि वे महिलाएं स्वयं पढ़ कर औरों को पढ़ाने योग्य हो गई। स्वामी जी ने अनेक ग्रंथों पर अपनी टीका भाष्य भी अपने हाथों से लिखी। सन 1965 में स्वामी जी की माताजी काशी देवीजी लगभग 100 वर्ष से ज्यादा की उम्र में ब्रम्हलीन हो गई लेकिन इसके बाद भी स्वामी जी की ब्रह्म मीमांसा अध्ययन, अध्यापन, भक्ति की यह यात्रा निरन्तर निर्बाध चलती रही। स्वामी नरहरिदास बाबाजी ने बड़ी कुशलता से समय का उपयोग किया। इनका परिश्रम और ज्ञान का प्रभाव ही था। जिसके कारण छोटे बच्चे भी इनकी सन्निधि में आने लगे और गीता के श्लोक उपनिषदों के मंत्र तथा और भी कहानियों माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने लगे। स्वामी जी का पूरा समय ज्ञान, सेवा और सत्संग में ही व्यतीत होता था। तथा बचा समय अपनी हस्त कला और मूर्तिकला को भी दिया करते थे। स्वामी जी परम संतोषी थे।
यदि कोई भी अन्न, वस्त्र ,औषधीय या और कुछ और देता तो वे उसे योग्य या जो व्यक्ति जिस वस्तु का अधिकारी होता, उसे बांट दिया करते। स्वामी कहते थे कि एक हाथ से लेकर दूसरे हाथ से दे दो। त्वदीय वस्तु गोविंदम् तुभ्यमेव समर्पये, सारी वस्तु परमात्मा की है। धीरे धीरे यह स्थान स्वामी नरहरिदास जी आश्रम के रूप में भी जाना जाने लगा। मंदिर में 1940 और 1950 के दशक से ही गुरूपूर्णिमा श्री कृष्ण जन्माष्टमी, राम जन्मोत्सव, हनुमत जन्मोत्सव जैसे बड़े त्यौहार आने वाले भक्तों के सहयोग से भक्तिपूर्ण ढंग से मनाना शुरू किया गया जो कि आज पर्यंत तक जारी है। पंडित जगन्नाथ शर्मा व उनका परिवार स्वामी जी और मंदिर की सेवा अर्चना में शुरू से लगा रहा। वास्तविक व्यक्तित्व के धनी श्री स्वामी नरहरिदास बाबाजी ने ख्याति लाभ की। ज्ञान का बीज बोया और अनेक जीवों का कल्याण किया। प्रारब्ध तो ज्ञानी अज्ञानी सभी का साथ चलता है। एक प्रारब्ध बिस्तर पर ले आता है तो दूसरा प्रारब्ध इतनी सेवा कराता है जो शायद किसी सद्गृहस्थ की सत्पुत्रों के द्वारा भी न हो। वैसे तो परिचित मिलने वाले सभी सेवा करते थे परंतु इनकी प्रमुख शिष्या श्रीमती गोबिंदी जी ने जिस तरह लगन और प्रेम से सेवा की शायद ऐसी सेवा करने वाला भी कोई नहीं हो सकता। आंधी बरसात कुछ भी टल सकता है परंतु इनकी सेवा का समय और नियम कभी नहीं टला। बिस्तर में रहते हुए भी उनकी मुखाकृति कभी उदास या मलीन नही हुई। आने वाले सभी भक्तों से सदा मुस्कुराते हुए मिला करते तथा सीताराम सीताराम कहा करते। स्वामी जी का शरीर जीर्ण होने लगा लेकिन अनेकों वर्ष शैय्या पर होने के बावजूद ब्रम्ह के प्रति जिज्ञासा का समाधान मंदिर में तीन समय का सत्संग, गीता वेद पुराण रामायण सब कुछ निरंतर चलता ही रहा। 2 जनवरी 1989 को सफला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्वामी जी राम नाम सुमिरन करते हुए अपने भौतिक शरीर को त्याग कर ब्रम्हलीन हो गए। स्वामी जी की अंतिम यात्रा जिसमें हजारों की तादाद में उनके शिष्यगण अनुयायी और शहरवासी शामिल हुए, वो दीनेश्वर महादेव मंदिर में ही पूर्ण हुई। उनके परम शिष्य पंडित मधुश्याम शर्मा ने उनकी अंतिम संस्कार की परंपरा पूरी की और श्री दीनेश्वर महादेव मंदिर के पिछले हिस्से के बगीचे में स्वामी जी समाधि बनाई गई। आज स्वामी जी को अपना नश्वर शरीर छोड़े 36 साल से अधिक हो गए हैं लेकिन उनके दिए संस्कार और सनातन परंपरा आज भी उनके शिष्यगणों व अनुयायियों विद्यमान है। मंदिर में आज भी नित्य सत्संग, सामुहिक स्तुति और समाधि की नित्य पूजा जारी है।
रायगढ़ की प्राचीन धरा पर संत स्वामी नरहरि दास जी महाराज
पुण्य तिथि पर विशेष संस्मरण



