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रायगढ़

राष्ट्र प्रेम का अलख जगा कर आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना करने वाले महान संत पूज्य अघोरेश्वर

पूज्य अघोरेश्वर ने सामाजिक कुरूतियो को मिटाकर मानव कल्याण के लिए समर्पित किया जीवन

lochan Gupta
Last updated: September 10, 2024 12:08 am
By lochan Gupta
September 10, 2024
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11 Min Read

आज जयंती पर विशेष

रायगढ़। समय काल के अनुरूप महान आत्माए धरती मे अवतरित होती है और उनका जीवन राष्ट्र उत्थान एवम मानव कल्याण हेतु समर्पित होता है। पूज्य अघोरेश्वर का भी धरती में अवतरण इसी प्रक्रिया की एक अहम कड़ी मानी जाती है। कुरीतियों अज्ञानता के चक्रव्यूह में फंसी मानव जाति अपना अनमोल जीवन व्यर्थ में गंवा देती है। मानव जाति को इस काकश घेरे से निकालने के लिए ईश्वरीय शक्तियां ही महापुरूषों के रूप में धरती में अवतरित होती रही है। विधि विधान के शाश्वत नियमो का संदेश देकर ऐसे महापुरुषो के संदेश युगों युगों तक मानव जाति के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका का निर्वहन करते है। महापुरुषों के बताए मार्ग के अनुशरण मात्र से समाज के सामने भ्रम की स्थिति उत्पन्न नही होती। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान देश में संकट के बादल मंडरा रहे थे सभी तरफ अज्ञानता का अंधकार मौजूद था। शोषण की प्रवृत्ति हावी हो रही थी। भारत लंबे समय से गुलामी की जंजीरो से मुक्त होने के लिये संघर्षरत था वर्षा के अभाव ने अन्न दाताओं के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा कर दी थी।अन्न के अभाव की वजह से जनता के आमने जीवन यापन कठिन हो रहा था। विपत्ति के ऐसे ही संक्रमण काल में वि.स. 1994 के भाद्र पक्ष शुक्ल पक्ष सप्तम 12 सितंबर 1937 को बिहार प्रांत के आरा स्टेशन से 6 मील की दूरी पर स्थित गुंडी ग्राम में एक प्रतिष्ठित क्षत्रिय वंश के भारद्वाज गोत्र मे स्वानाम धन्य श्री बैजनाथ सिंह एवं श्रीमति लखराजी देवी के पुत्र के रूप में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम भगवान सिंह रखा गया, जो आगे अघोरश्वर भगवान राम के नाम से विख्यात हुए अघोरेश्वर भगवान राम जी की रुचि परंपरागत अध्यन हेतु विद्यालय जाने में नहीं रही। वे बचपन में भी बाल सखाओं के साथ भजन-कीर्तन अधिक पसंद करते थे। अपने गृह ग्राम मे ही शिव मंदिर बनाकर साधना करने वाले अघोरेश्वर ने परिवार जनों के वापस घर आने का आग्रह ठुकरा दिया। परिवार जनों का बारंबार घर वापसी का आग्रह उनकी साधना में बाधक बन रहा था इसलिए 9 वर्ष की अल्पायु मे ही गृह ग्राम छोडऩे का कठोर निर्णय लिया। उनके तीर्थाटन की यात्रा शुरू हुई। इस क्रम में वे जगन्नाथपुरी और गया पहुंचे उसके बाद बाबा विश्वनाथ के दर्शन हेतु वाराणसी पहुंचे जहां स्वयं माता अन्नपूर्णा ने एक वृद्धा के रूप में अघोरेश्वर को दर्शन दिया और उनसे स्नेह वश पूछा बेटा कहां जाने की इच्छा है? अघोरेश्वर के द्वारा बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन की इच्छा प्रकट करने पर वृद्ध माता ने पहले गंगा स्नान कराया और श्री विश्वनाथ जी का पूजन करवाया, तत्पश्चात वे वृद्धा माता के साथ अन्नपूर्णा मंदिर की ओर गये, वहां दर्शन पूजन के पश्चात वृद्ध माता ने कहा यहां के कुछ दूरी पर परमहंस साधुओं का आश्रम है, वही चले जाओ, तुम्हारा अभिष्ट सिद्ध होगा, इतना कहकर माता अंर्तध्यान हो गयी उनके निर्देशानुसार ही वे क्रीम कुण्ड स्थल पहुंचे जुलाई 1951 से किनाराम स्थल मे अघोर पंथ से दीक्षित होकर कठोर साधना मे लीन हो गये। पीडि़त मानव की सेवा के लिए पूज्य अघोरेश्वर ने 24 वर्ष की आयु में 29 सिंतम्बर 1961 को श्री सर्वेश्वरी समूह के स्थापना की नींव रखी। पीडि़त मानव सेवा के लिए बनाई गई इस संस्था के जरिये उस दौर में असाध्य माने जाने वाले कुष्ठ रोग का निदान कर वैश्विक ख्याति अर्जित की। सर्वेश्वरी संस्था की 130 शाखाएं देश विदेश में फैली हुई है। एक दौर ऐसा भी था जब कृष्ठ रोग से पीडि़त मरीजों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता था। उनके सामने तिल तिल कर मरने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रह जाता था।अघोरेश्वर ने कुष्ठ रोग से पीडि़तों एवम ऐसे बहिष्कृतो को गले से लगाया और अपने हाथो से स्वयं कृष्ठ रोगियों का इलाज किया। पीडि़तों की यह अदभुत मानव सेवा ग्रीनिज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज की गई। समूह को गतिशील बनाये रखने एवं आने वाली पीढ़ी को विरासत में सेवा का संस्कार हस्तांतरित करने के लिए अघोर पंथ के लिए अघोरेश्वर ने उन्नीस सूत्रीय सिद्धान्त सुनिश्चित किये। भगवान राम जी के शिष्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के कर कमलों से स्थापित अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा डभरा शिवरीनारायण अंबिकापुर सहित अन्य राज्य बिहार यूपी के समस्त आश्रमो की बुनियाद इन्ही 19 सूत्रीय उद्देश्यों पर टिकी हुई है। भगवान राम से उनके लौकिक गुरु महाराज श्री राजेश्वर राम जी ने क्रीम कुंड के महंत पद पर आसीन होने को कहा लेकिन राष्ट्र सेवा के व्रत पालन करने की उद्देश्य से अघोरेश्वर ने विनम्रता पूर्वक पद का अनुरोध अस्वीकार कर दिया। समाधी से पहले अघोरेश्वर ने अपने समस्त संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने एवं कार्यक्रमों के सुव्यवस्थित संचालन हेतु अपने चार प्रमुख शिष्यों को अलग-अलग क्षेत्रों के लिए उत्तराधिकारी घोषित कर उनका अभिषेक किया। 29 नवम्बर 1992 में उन्होंने समाधि लेते हुए अघोर पंथ का ऐसा सुगम मार्ग प्रशस्त कर दिया जिसका अनुकरण उनके उत्तराधिकारी शिष्य बाबा प्रियदर्शी राम जी कर रहे है। देश विदेश में फैले अघोरेश्वर के अनुयाईयों में जात पात अमीरी गरीबी ऊँच नीच का भेद नही है। अघोरश्वर का अवतरण मानव समाज को जीने का सहज मार्ग बताने के लिए हुआ था। वे आजीवन गरीबो शोषितों पीडि़तों असहायों दलितों कुष्ठ रोगियों की सेवा में जुटे रहे। अघोराचार्य महाराज श्री कीनाराम जी ने इस पंथ को समाज से जोडऩे की नीव ही रखी लेकिन अघोर पंथ के विचारों को समाज तक पहुँचाने लिए विचारधारा का पुल बनाने का महान कार्य पूज्य अघोरेश्वर ने किया। अपने जीवन सफर में अघोरेश्वर भगवान राम ने नेपाल अफगानिस्तान ईराक ईरान सऊदी अरब मैक्सिको अमेरिका की यात्राएं की। हर यात्रा का उद्देश्य अघोर पंथ के वैचारिक हथियार से मानव जीवन से जुड़ी आडम्बरो की जड़ो को काटना ही रहा। औघड़ शब्द मनुष्य के लिए भय का कारण न बने इसके निदान के लिए अघोरश्वर ने देश काल की परिस्थिति को देखते हुए समाज के सामने ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया जिससे बहुत ही निरथर्क भ्रांतियां दूर हो गई। अघोर परंपरा को रूढि़वादी बेडिय़ों से मुक्त कराने के साथ आधुनिक प्रगतिशील स्वरूप देने का श्रेय बीसवीं सदी के संतों में अघोरश्वर भगवान राम को जाता है। उन्होंने समाज के मन मे औघड़ के प्रति भय की जगह श्रद्धा का बीजारोपण कर दिया। विधि के विधान को आत्मसात करने वाले भगवान राम ने नशाखोरी को समाज की जड़ो को खोखला करने का कारण बताया। जीवन भर वे कर्मकांड की परिपाटी की बजाय व्यवहारिक ज्ञान को प्राथमिकता देते रहे। अनेक संतो महात्माओं ने पांडित्य प्रवचन के जरिये सामाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया लेकिन अघोरश्वर ने अध्यात्म और दर्शन के गूढ़ तत्वों को व्यवहारिक व तर्क युक्ति संगत बनाकर आम जनमानस के सामने कुछ इस तरिके से रखा कि समाज इन बातों को सहजता से समझते हुए इस ज्ञान को अपने व्यवहारिक जीवन मे उतार सके। उन्होंने समाज को बताया कि कैसे आवश्कता से अधिक संग्रह दुख का कारण बन जाता है। शादी विवाह में लेन देन दहेज को खरीदी बिक्री बताते हुए कहा कि दहेज की बुनियाद पर खड़े रिश्तो के महल भले ही बाहर से भव्य हो लेकिन अंदर से खोखले होते है। आत्मा को ही परमात्मा का अंश बताते हुए शरीर को आत्मा के लिए मन्दिर बताया। उनके बताए मार्ग का अनुकरण आज मानव समाज के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा रहा। जन्म के साथ ही मृत्यु की सच्चाई को सदैव स्मरण रखने का संदेश देते हुए अघोरेश्वर ने कहा नश्वर जीवन एक दिन राख में तब्दील हो जाएगा इससे पहले मनुष्य को परिवार समाज देश के लिए समर्पित भाव से ऐसे श्रेष्ठ कर्म करना चाहिए जिससे राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका तय हो सके।
राष्ट्र निर्माण में मददगार भूमिका निभा रहा अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा
पूज्य अघोरेश्वर ने सिद्धांतो की श्रृंखला बना दी लेकिन उनके शिष्य बाबा प्रियदर्शी राम जी ने इन्ही उद्देश्यों को लेकर जो बीजारोपण किया वह आज वट वृक्ष बनकर आध्यात्मिक छाया उपलब्ध करा रहा है। मानव मात्र की छोटी छोटी इकाई को एक मजबूत ईंट में तब्दील कर बनोरा राष्ट्र निर्माण में मददगार भूमिका का निर्वहन कर रहा है। पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी के आशीर्वचन समाजिक बदलाव का जरिया बन रहे उनकी प्रेरणा पाकर अघोर पंथी एक सैनिक की भूमिका में देश के अंदर समाज परिवार में अपनी भूमिका का शालीनता पूर्वक निर्वहन कर रहे है।
अघोरेश्वर अवतरण पर विभिन्न आयोजन
बनोरा व्यवस्थापक मंडल को ओर से दी गई जानकारी के अनुसार प्रात: 8 बजे पूज्य बाबा जी द्वारा श्री गुरु चरण पादुका पूजन उसके बाद 8.30 बजे सामूहिक आरती के बाद प्रात: 8.40 से 9.30 बजे तक सामूहिक गुरु गीता के पाठ के बाद 9.30 बजे से 11.30 बजे तक सामूहिक हवन का आयोजन होगा। इसी समयावधि में प्रात: 10 बजे से अपरान्ह 4 बजे तक भजन कीर्तन एवम मध्यान्ह 12 बजे से शाम 4 बजे तक सामूहिक प्रसाद का वितरण होगा। शाम 4.30 बजे से पूज्य पाद बाबा प्रियदर्शी राम जी के श्री मुख से आशीर्वचन होगा।

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