पत्थलगांव। आदिवासी विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े पत्थलगांव के सुखरापारा स्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में प्रभारी प्राचार्य की व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। विद्यालय में व्याख्याता (एलबी) के पद पर पदस्थ चंद्रमणि यादव को प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर राजनीतिक और शिक्षा जगत में चर्चा तेज हो गई है।
चर्चा यह भी है कि आखिर एक अन्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पदस्थ व्याख्याता को 400 से अधिक आवासीय विद्यार्थियों वाले एकलव्य विद्यालय की इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी किस आधार पर सौंपी गई? हालांकि, इस नियुक्ति के पीछे राजनीतिक प्रभाव होने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन व्यवस्था को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं। बतौली की घटना के बाद भी नहीं बदली व्यवस्था? गौरतलब है कि सरगुजा जिले के बतौली स्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में छात्राओं द्वारा विद्यालय की समस्याओं को लेकर करीब 20 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्टर के समक्ष अपनी बात रखने का मामला सामने आया था। इसके बाद मुख्यमंत्री ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच के निर्देश दिए थे और एकलव्य विद्यालयों में किसी भी प्रकार की ढिलाई पर सख्त कार्रवाई की बात कही थी।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या बतौली की घटना से दूसरे एकलव्य विद्यालयों की व्यवस्थाओं ने कोई सबक नहीं लिया? प्राचार्य की कुर्सी या दोहरी जिम्मेदारी का खेल? चंद्रमणि यादव की मूल पदस्थापना शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय शेखर में व्याख्याता (एलबी) के पद पर बताई जा रही है। वहीं उन्हें सुखरापारा एकलव्य विद्यालय का प्रभारी प्राचार्य बनाया गया है। एकलव्य विद्यालय में विद्यार्थियों की पढ़ाई के साथ-साथ छात्रावास व्यवस्था, अनुशासन, कर्मचारियों की मॉनिटरिंग, प्रशासनिक कार्य और वित्तीय जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं। ऐसे में एक शिक्षक को दूसरे विद्यालय से हटाकर प्रभारी प्राचार्य का दायित्व दिए जाने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। एक जगह पढ़ाएं या दूसरी जगह प्रशासन संभालें? सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि चंद्रमणि यादव की मूल पदस्थापना शेखर स्कूल में है, तो वहां की शैक्षणिक व्यवस्था कैसे प्रभावित होती है? दूसरी ओर, एकलव्य विद्यालय जैसे आवासीय संस्थान में पूर्णकालिक प्राचार्य की आवश्यकता को विभाग किस नजरिए से देख रहा है?
दोनों संस्थानों की जिम्मेदारी एक व्यक्ति के कंधों पर डालना क्या प्रशासनिक रूप से उचित व्यवस्था है? पालक और स्थानीय लोग अब इसी सवाल का जवाब मांग रहे हैं। स्थायी प्राचार्य की जगह प्रभारी व्यवस्था क्यों? एकलव्य विद्यालय आदिवासी विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण आवासीय शिक्षण संस्थान हैं। ऐसे में लंबे समय तक प्रभारी व्यवस्था पर विद्यालय चलाने को लेकर पालकों में भी चिंता बताई जा रही है। पालकों की मांग है कि जिला प्रशासन और आदिवासी विकास विभाग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करे और यदि नियमों के विपरीत व्यवस्था पाई जाती है तो उसे तत्काल दुरुस्त किया जाए। साथ ही विद्यालय में पूर्णकालिक एवं सक्षम प्राचार्य की पदस्थापना की जाए। अब सवाल विभाग से जब एकलव्य विद्यालयों में लापरवाही पर सख्ती के निर्देश हैं, तो सुखरापारा में प्रभारी व्यवस्था कब तक चलेगी? क्या विभाग के पास पूर्णकालिक प्राचार्य की व्यवस्था नहीं है, या फिर प्रभारी व्यवस्था के पीछे कोई और वजह है? इन सवालों के जवाब अब आदिवासी विकास विभाग और जिला प्रशासन को देने होंगे।
राजनीतिक पकड़ का कमाल? व्याख्याता चंद्रमणि बने एकलव्य के प्रभारी प्राचार्य!
400 से ज्यादा आवासीय विद्यार्थियों की जिम्मेदारी, मूल पदस्थापना शेखर स्कूल में, दोहरी जिम्मेदारी पर उठे सवाल



